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यही जीवन है – अमित किशोर

एक बार की कथा है। महर्षि धौम्य की कुटिया में नव शिष्यों की शिक्षा दीक्षा चल रही थी। महर्षि बड़ी तल्लीनता से जीवन के बहुमूल्य पाठ पढ़ा रहे थें।  तभी उनके प्रिय शिष्यों में से एक आरुणि ने महर्षि धौम्य से प्रश्न किया, ” गुरुदेव, जीवन के बारे में यदा कदा भ्रांतियां सुनने को मिलती हैं।  इन भ्रांतियों का निराकरण जानने की तीव्र इच्छा है आपसे।  कृपया, मार्गदर्शन करें।” 

महर्षि धौम्य ने मंद मंद मुस्कान बिखेरी। और कहा, ” वत्स !! एक कथा सुनाता हूं। आशा ही नहीं, वरन, पूर्ण विश्वास है कि, तुम सब की प्रत्येक शंका का निवारण कर पाऊंगा।” 

सतयुग में एक राजा थें। उनका नाम सुकर्णी था। उनकी चार रानियां थीं। पर, सबके साथ उनका समान व्यवहार, स्नेह और प्रेम नहीं था। 

राजा सुकर्णी को अपनी सबसे छोटी रानी से असीम प्रेम था। इतना कि अपनी सभी रानियों में उसे ही श्रेष्ठ समझते और विशेष ध्यान रखते। 

वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करते थें  पर वो रानी उनके लिए बस दर्शनीय मात्र ही थी। रूपमती और सौंदर्य में अप्रतिम। सदा ही भयभीत रहते कि रानी के अद्भुत और अलौकिक सौंदर्य के कारण उन्हें या उनके राज्य को संकट न झेलना पड़े।

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्यार करते थें। जब भी राजा सुकर्णी को कोई विचार लेना होता, राजकाज में कोई विमर्श करना होता तो वो अपनी दूसरी पत्नी के पास ही जाते और विचार विमर्श कर समस्या का निदान पाते। रानी की बौद्धिक कुशलता अद्वित्य थी। किसी भी समस्या का समाधान पलक झपकते ही कर देती।

परंतु, राजा सुकर्णी अपनी पहली रानी से कतई प्रेम नहीं करते थे। इसके ठीक विपरीत, रानी राजा सुकर्णी से असीम प्रेम करती, सम्मान करती। ये जानते हुए भी, कि, राजा सुकर्णी का व्यवहार उसके प्रति अच्छा नहीं है फिर भी रानी के समर्पण में कहीं रत्ती भर भी कोई कमी नहीं थी।




एक दिन अकस्मात राजा सुकर्णी बहुत बीमार पड़े और उन्हें अपना अंत समय दिखने लगा। उन्होंने हठ का डाली कि जब वो प्राण त्यागे तो कोई एक रानी भी उनके साथ बैकुंठ जाए।  एक एक कर सभी रानियों को बुलावा भेजा। 

सबसे पहले छोटी रानी आई और बोली, ” ऐसा कैसे संभव है, मैं क्या , कोई भी ऐसा नहीं कर सकता।” और वो चली गई।

फिर तीसरी रानी से  भी पूछा तो वह बोली,” जीवन अत्यंत सुखदायक है, आपके जाने के बाद मैं संतोष कर लूंगी। पर, मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी। “

 अब दूसरी रानी की बारी आई। रानी ने कहा, ” क्षमा करें, स्वामी। मैं आपके इस हठ में आपका साथ कतई नहीं दे सकती क्योंकि ऐसा करना न तर्कसंगत है और न वैधानिक। मैं भी सबकी तरह आपके लिए संतोष कर लूंगी।”

राजा सुकर्णी को घोर निराशा हुई। मन बैठ सा गया। पहली रानी को बुलावा तक नहीं भेजा पर पहली रानी स्वयं उपस्थित हुई और कहा, ” स्वामि, मैं आपके साथ बैकुंठ चलने को उत्सुक हूं। जहां जहां आप चलेंगे, आपकी अर्धांगिनी होने के कारण मेरा भी साथ चलना अनिवार्य है और वैधानिक भी। “

अब राजा सुकर्णी को आत्मा ग्लानि का बोध हुआ। क्षुब्द होकर विलाप करने लगे और कहा, ” प्रिये !! मैंने सदा सर्वदा तुम्हारा तिरस्कार ही किया है, फिर भी तुमने पत्निधर्म को ही प्राथमिकता दी। मुझे क्षमा करो, हे देवी।” पश्चाताप के अश्रु बहाते हुए इतना कहकर, राजा सुकर्णी के प्राण ब्रह्मलीन हो गए।

महर्षि धौम्य ने आरुणि से पूछा, ” वत्स !! इस कथा से क्या सीखा तुमने ?”




आरुणि ने उत्तर दिया, ” गुरुवर, कथा का आशय भी स्पष्ट करें।”

महर्षि धौम्य ने आगे कहा, ” वत्स, कथा का आशय अत्यंत स्पष्ट है। किंचित शंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

देखो, मानव जीवन भी चार तथ्यों पर आधारित है। स्मरण करो, कथा एक बार पुनः। तुम्हे ज्ञात होगा। चौथी रानी और पत्नी जो है वो हमारा शरीर है, वत्स। हम चाहें जितना सजा लें संवार लें पर जब हम मृत्य को प्राप्त करेंगे तो यह हमारा साथ छोड़ देगा। तीसरी पत्नी और रानी  है हमारा एकत्रित कोष है, हमारा सामाजिक परिवेश है। जब हम मृत्यु को प्राप्त करेंगे, तब ये स्वत अन्यत्र चली जायेगी। दूसरी पत्नी और रानी  है हमारे सगे संबंधी, हमारा परिवार ।चाहे  वो सभी हमारे निकट ही क्यों न हो पर कभी भी हमारे मोक्ष में सहायक नहीं हो सकते। विवाद प्रलाप की धुरी के बीच ही घूमते रहते हैं।

अब मैं सबसे महत्वपूर्ण बात बताता हूं, तुम्हें। पहली पत्नी और रानी  हमारी आत्मा है, जो सांसारिक मोह माया में सदा उपेक्षित रहती है। हम उसका यथोचित सम्मान नहीं कर पाते।  जीवन की आधारशिला इसी आत्मा में छिपी हुई है, वत्स। जीवन को यदि सार्थक करना है तो आत्मा का उचित सत्कार करो और उसकी कभी अवहेलना न करो।”

आरुणि ने महर्षि धौम्य को साष्टांग प्रणाम किया और कहा, ” धन्य हो गया आज मैं, गुरु श्रेष्ठ। जीवन की ये अद्भुत परिभाषा और विवेचना इस जगत में आपके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता। आपका मेरा बारंबार नमन स्वीकार करें।” 

स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित

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कहानी : प्रथम 

अमित किशोर

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