पहला प्यार – मधु वशिष्ठ

गांव में राम प्रसाद जी की तबियत दिनों दिन बिगड़ती ही जा रही थी। उनके घर में उनके और उनकी बेटी के सिवाय कोई भी नहीं रहता था। डाक्टर मोहन उनका इलाज किया करता था। एमबीबीएस करने के बाद में कुछ समय डॉ मोहन को गांव में ट्रेनिंग के तौर पर कुछ समय के लिए … Read more

गुणों का रंग – गरिमा चौधरी

** “क्या एक सांवली लड़की की डिग्रियां उसके रंग के आगे फीकी पड़ जाती हैं? और क्या लाखों का पैकेज लेने वाला प्राइवेट नौकरी का बेटा सरकारी चपरासी से भी कमतर है? पढ़िए समाज के उस दोहरे मापदंड की कहानी जिसने दो होनहार दिलों को एक ऐसे कटघरे में खड़ा कर दिया जहाँ फैसला गुणों … Read more

विश्वास की डोर – रमा शुक्ला

** “सुहागरात की वो सेज, जो फूलों से सजी थी, उस पर बैठी दुल्हन कांप रही थी—शर्म से नहीं, बल्कि एक डर से। एक ऐसा डर जो उसके अतीत के साये से जुड़ा था। क्या उसका पति उसका हाथ थामेगा या फिर समाज के तानों से डरकर उसे बीच मझधार में छोड़ देगा? जानिये राघव … Read more

“त्याग की आड़ में” – निधि गुप्ता

** क्या एक माँ का संघर्ष उसके बेटे की खुशियों का ‘आजीवन कारावास’ बन सकता है? क्या अतीत के दुखों की दुहाई देकर वर्तमान की खुशियों का गला घोंटना जायज़ है? जानिये सुमन की कहानी, जिसने ‘फर्ज’ और ‘गुलामी’ के बीच की लकीर खींच दी। — “बेटा! तुम मेरी बहू की उम्र की हो, इसलिए … Read more

नीम की कड़वाहट – नेहा पटेल

** एक बेटे को अपनी पत्नी “राक्षस” लगती थी जो उसकी बूढ़ी माँ को घुटनों के दर्द में भी पैदल चलाती थी। लेकिन जब डॉक्टर ने उस पत्नी के ‘जुल्म’ की असली वजह बताई, तो बेटे के पैरों तले से ज़मीन क्यों खिसक गई? विहान की आँखों में खून उतर आया। उसने अपनी माँ को … Read more

“तमाशा और मरहम” – सीमा श्रीवास्तव

:** जिस मोहल्ले की वाह-वाही लूटने के लिए आप अपने घर की इज्जत नीलाम कर रहे हैं, याद रखियेगा, बुढ़ापे में प्यास लगने पर पानी का गिलास वो मोहल्ला नहीं, वही ‘बुरी’ बहू लेकर आएगी। क्या दूसरों की सहानुभूति पाने की लत एक सास को इतना अंधा कर सकती है कि उसे अपनी बहू का … Read more

“बंद मुट्ठी की लाज” – आरती देवी

** क्या अपनी बहू की बुराई करके एक सास अपना मन हल्का करती है, या अपने ही घर की नींव में बारूद भर रही होती है? पढ़िए, कैसे एक सास की जुबान ने उसकी अपनी ही बेटी की खुशियों में आग लगा दी। समीर गुस्से में चिल्लाया, “माँ! मैंने अनिका को हजार बार कहा था … Read more

“वो खामोश मालकिन” – वर्षा मंडल

“सूट-बूट पहनकर बोर्ड मीटिंग में फैसले लेना ही सिर्फ़ आज़ादी नहीं होती, कभी-कभी घर की चारदीवारी में रहकर अपनी शर्तों पर दुनिया चलाना उससे भी बड़ी ताक़त होती है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो नारीवाद (Feminism) की आपकी परिभाषा बदल देगी।” “तुम लोग समझती हो कि साड़ी पहनने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली … Read more

**वह परायी माँ**

**”नजर का इलाज डॉक्टर कर सकता है, लेकिन नजरिए का इलाज तो वक्त की ठोकर ही करती है। जब हम किसी को नफरत के चश्मे से देखते हैं, तो उसकी हर अच्छाई भी हमें साजिश नजर आती है।”** — आर्यन की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसका गला रुंध गया। उसे अपनी हर … Read more

फरेब – रीमा साहू

सुमित्रा देवी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। जिस बेटे को उन्होंने ‘नकारा’ और ‘पत्थर’ समझा था, असल में वही उनकी नींव का पत्थर था। और जिस दामाद को उन्होंने ‘हीरा’ समझा था, वह केवल कांच का टुकड़ा निकला जो वक्त आने पर चुभ गया। कहानी का … Read more

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