गुरू दक्षिणा – डॉ बीना कुण्डलिया

अरे बहु देखना जरा जाकर कामिनी आ गई लगता है,बाहर गाड़ी रूकने की आवाज आई उत्साहित ममता जी ने बहु नंदनी को आवाज लगाई। फिर खुद से ही बड़बड़ाई ये बेटियां भी फंक्शन त्यौहारों में जब तक घर में न आ जाये आँगन में रौनक ही नहीं आती ।  कामिनी रसोईघर में व्यस्त सभी काम … Read more

असली चरित्र

ट्रेन के पहियों की एक लयबद्ध खट-खट और खिड़की से पीछे छूटते हुए पेड़ों के दृश्य मुझे हमेशा सुकून देते थे, लेकिन आज यह सफर मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी दे रहा था। मेरे सामने वाली सीट पर मेरी पत्नी, सुमेधा बैठी थी, और उसकी त्योरियां इस बात का सुबूत थीं कि … Read more

यादगार यात्रा

गोमती एक्सप्रेस आज अपने तय समय से चार घंटे की देरी से चल रही थी। कादंबरी खिड़की से माथा टिकाए बाहर के धुंधले नज़ारों को देख रही थी। ज़िंदगी भी तो इसी बारिश के धुंधले शीशे जैसी हो गई थी, जहाँ बाहर बहुत कुछ था मगर अंदर से सब धुंधला ही नज़र आता था। घर … Read more

तीसरा हिस्सा

शहर के सबसे पॉश इलाके में बना ‘आशीर्वाद’ भवन बाहर से जितना आलीशान और शांत दिखता था, अंदर से उसमें उतनी ही अशांति और कलह मची रहती थी। सेठ रामनारायण जी के देहांत को अभी मुश्किल से दो साल ही बीते थे, लेकिन इस छोटे से अंतराल में ही उस घर की पूरी तस्वीर बदल … Read more

रिश्तों के आसमान

दोपहर की चिलचिलाती धूप में रसोई का काम समेटते हुए कविता के हाथ अचानक ठिठक गए। फोन की स्क्रीन पर स्कूल की प्रिंसिपल का नंबर चमक रहा था। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आई घबराई हुई आवाज ने कविता के पैरों तले से जमीन खिसका दी। “कविता जी, तुरंत सिटी अस्पताल पहुँचिए, आपकी बेटी … Read more

सच्चा दांपत्य जीवन

शाम के करीब चार बज रहे थे। गुलमोहर एन्क्लेव के सेंट्रल पार्क में सुहागिन महिलाओं की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। लाल और गुलाबी जोड़ों में सजी धजी महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनने के लिए इकट्ठा हो रही थीं। इसी सोसाइटी में पिछले महीने ही शिफ्ट हुई राधिका भी अपनी पूजा की थाली लिए … Read more

शान

“नसीब आपने लिखा था उसका, भगवान नहीं!” श्रुति ने भी उसी तेज़ आवाज़ में जवाब दिया। “लेकिन मैं अपना नसीब आपको नहीं लिखने दूंगी। मैं आज अपना इंटरव्यू देकर आ रही हूँ। मुझे नौकरी मिल गई है। कल से मैं अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जिऊंगी। अगर इस घर में मुझे मेरी शर्तों पर, एक … Read more

वो बंधन सिर्फ कच्चे धागों का नहीं है – डॉ आभा माहेश्वरी

रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था। पूरे गाँव में उत्साह का माहौल था। बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजा हुआ था। हर बहन अपने भाई के लिए सबसे सुंदर राखी चुन रही थी। लेकिन गाँव के किनारे रहने वाली बारह वर्ष की अनन्या के चेहरे पर उदासी थी। उसका बड़ा भाई अर्जुन पिछले दो वर्षों से … Read more

पछतावे के चिराग – कायनात परवीन

हरियाली और शांति से घिरा नीलगिरी गाँव यूं तो बहुत शांत था, लेकिन गाँव के सबसे समृद्ध घर में रहने वाले राघवेंद्र जी का स्वभाव इसके बिल्कुल उलट था। राघवेंद्र जी एक मेहनती और सिद्धांतवादी इंसान थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उनका अत्यधिक और अनियंत्रित गुस्सा था। उनकी छोटी सी बात पर आपा खो … Read more

विश्वासघात

“यह… यह क्या बकवास है!” विकास अपनी जगह से उछल पड़ा। “आप ऐसा नहीं कर सकते पिताजी! यह हमारा हक है! हम आपके खून हैं!” शिखा भी चीखने लगी, “जरूर इस रमेश मुनीम ने या किसी और ने आपके कान भरे हैं पिताजी! आप बुढ़ापे में अपना दिमागी संतुलन खो बैठे हैं। हम इसे कोर्ट … Read more

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