खोखली मर्यादाएं

रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “बाबूजी, क्या अब भी आप भाभी को उसी चौखट पर बांधे रखना चाहते हैं जहाँ से कभी कोई नहीं गुज़रेगा? अगर यही सब हमारी बहन के साथ हुआ होता… अगर आपके दामाद ने हमारी बहन को ऐसे छोड़ दिया होता, तो क्या तब भी आप यही कहते कि ‘मर्द … Read more

स्वाभिमान मेरा भी। – मधु वशिष्ठ

  पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। मुझे माल्यार्पण किया जा रहा था और बहुत सुंदर फ्रेम्ड सर्टिफिकेट से सम्मानित भी किया जा रहा था। और ऐसा हो भी क्यों ना आज मेरा सेवा निवृत्ति का दिन था।           पति और बच्चों के साथ जब मैंने घर वापस आने पर स्वयं को मिले हुए सारे उपहार … Read more

रिश्तों की उलझी डोर और एक मीठी पहल

 “देख बेटा, विशाखा अभी नादान है। नई-नई इस घर में आई है। तू उसकी जेठानी है, बड़ी बहन जैसी है। अगर वो कोई काम अच्छा करे, तो उसकी तारीफ कर दिया कर। मीठे बोल बोलने में हमारे पैसे तो खर्च नहीं होते, लेकिन सामने वाले का दिल जरूर जीत लिया जाता है। अगर तू उसकी … Read more

वजूद की लड़ाई

 रीमा  वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी गलती क्या है? क्या उसका विधवा होना उसका अपराध है? या उसका किसी के आगे हाथ न फैलाकर खुद कमाना उसका गुनाह है? क्यों पुरुष वर्ग उसे बस एक इस्तेमाल की वस्तु समझता है, और जब अपनी पत्नी के सामने … Read more

स्नेह के बदलते सांचे

कौशल्या देवी आज सुबह से ही अजीब सी खीझ से भरी हुई थीं। रसोई के बर्तन ऐसे खटक रहे थे जैसे वे भी उनकी झुंझलाहट में सुर मिला रहे हों। उनके कदमों की आहट और बड़बड़ाहट पूरे घर में गूंज रही थी। कभी वह दाल के डिब्बे को जोर से रखतीं तो कभी फ्रिज का … Read more

छलावे की बुनियाद

 रघुनाथ जी ने बिना किसी भाव के कहा, “मेरी बेटी कल रात मर गई है। मैं आज उसका श्राद्ध कर रहा हूँ। आज के बाद इस घर में उसका नाम नहीं लिया जाएगा।” एक पिता का दिल टूटकर बिखर चुका था। उन्होंने जीते-जी अपनी बेटी का पिंडदान कर दिया। इधर, ट्रेन में सफर करते हुए … Read more

माटी का कर्ज और स्वाभिमान

“क्या? तुम पागल हो गए हो समीर?” शिखा लगभग चीख पड़ी। “तुम उन लोगों के लिए अपना घर छोड़ोगे?” “हाँ शिखा,” समीर की आवाज में अब एक अजीब सा दर्द था। “क्योंकि बात मेरे वजूद की है, मेरी जड़ों की है। मैं आज जो भी हूँ, जिस घर में तुम ये किटी पार्टियां करती हो, … Read more

दिवाली का वो अनोखा उजियारा

सुधीर जी ने पास बैठी उस बीस साल की लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “ये मेरी बेटी श्रेया है। पिछले चार सालों से इसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। दुनिया इसके लिए सिर्फ एक अंधेरा कमरा बन गई थी। लेकिन… आठ महीने पहले, इसे किसी फरिश्ते की आंखें मिलीं। … Read more

सम्मान मेरा भी – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

नगर के सबसे भव्य सभागार में वार्षिक नागरिक सम्मान समारोह आयोजित था। रंग-बिरंगी रोशनियाँ, फूलों की सजी कतारें और मंच पर सजे सम्मान-चिह्न इस बात के साक्षी थे कि आज समाज के विशिष्ट लोगों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाना था। उद्योगपति, चिकित्सक, शिक्षाविद्, समाजसेवी और अधिकारी—सब अपनी-अपनी उपलब्धियों के साथ मंच पर … Read more

इज्जत

लाल सुर्ख जोड़े में सजी राधिका आईने के सामने बैठी थी। आज उसका रूप निखर कर आ रहा था, लेकिन यह चमक सिर्फ महंगे लहंगे या पुश्तैनी गहनों की नहीं थी। यह चमक उस सुकून और विजय की थी जिसे पाने के लिए उसने एक लंबा, मानसिक और भावनात्मक सफर तय किया था। बाहर आंगन … Read more

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