सच्ची आस्था का मार्ग

रमाकांत ने एक सरसरी निगाह उस वृद्धा पर डाली और फिर झुंझलाते हुए बोले, “अरे देवकी, तुम भी कहाँ इन सब के चक्कर में पड़ रही हो। ये तीर्थ स्थान है, यहाँ ऐसे हज़ारों लोग रोज़ आते हैं। हमारा संकल्प टूट जाएगा। चलो जल्दी, हमें बहुत देर हो रही है।” रमाकांत ने देवकी को फिर … Read more

विश्वासघाती – बालेश्वर गुप्ता

चले गये ना,कहते थे जीवन भर साथ निभाऊंगा। तुम्हारे इतने भर कहने मात्र से सब घरबार,सब रिश्ते नाते छोड़ तुम्हारे साथ चली आई थी।बताओ,अब किसके सहारे और किसके लिए जिऊं? विलाप करती करती सरोज बेहोश हो गयी।        तीस वर्ष पूर्व एक छोटे से कस्बे में एक प्रेम पुष्प विकसित हुआ था।तीस वर्ष  पहले,तब प्रेम होना … Read more

शिकायत नहीं समझौता – मधु वशिष्ठ

पापा वाली गाड़ी में पेट्रोल कैसे खत्म हो सकता है, गाड़ी तो चली ही नहीं। पवन और अमित के हॉस्टल जाने के बाद मैंने खुद गाड़ी की टंकी फुल करवाई थी। नीचे ही तो खड़ी हुई थी चलो मम्मी से पूछते हैं। रहने दो, हो सकता है अब तक सो गई होंगी वैसे तुमने नोटिस … Read more

 अनकही चुभन: शहनाइयों के बीच एक खामोश चीख

 “अरे विशाखा! तुम कहां छुप कर बैठी हो अपने कमरे में? आज तुम्हारी सगी बहन की मेहंदी है और तुम ही पूरे घर से गायब हो? माना कि तुम्हारे अपने भाग्य में सुख नहीं लिखा, पर कम से कम बहन की खुशियों में तो ऐसे मनहूसियत मत फैलाओ। मुंह लटका कर बैठने से क्या अब … Read more

शीशे का महल: एक अनकही पारिवारिक दास्तान

 राधिका को देखते ही सीमा  अपने आंसुओं का बांध नहीं रोक पाई और फूट-फूटकर रोते हुए उसके गले लग गई। राधिका उसे संभालते हुए अंदर ले गई। कमरा अस्त-व्यस्त था। राधिका ने सीमा  को बिस्तर पर बिठाया और पानी पिलाया। जब सीमा  थोड़ी शांत हुई, तो राधिका ने उससे वे सारे सवाल किए जो पिछले … Read more

खामोश चीखें और एक माँ की दहाड़

 एक माँ का दिल सब समझता है। कल्याणी को यह समझते देर नहीं लगी कि वह जिस भेड़िये से अपनी बच्चियों को बचाने के लिए भागी थी, वह भेड़िया तो रक्षक का रूप धरकर उसके घर में ही बैठा है। उस रात कल्याणी सो नहीं पाई। उसने काव्या और दिशा से बात की, तो बच्चियों … Read more

ज़मीर का आईना: एक बेटे की अधूरी पहचान

 आज रामनाथ और कौशल्या की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। विकास के मन में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी थी। उसे याद था कि बचपन में वह इस दिन अपने माता-पिता के लिए अपने गुल्लक के पैसे तोड़कर एक छोटा सा केक लाता था। ग्लानि के एक क्षणिक झोंके ने आज उसे मजबूर … Read more

काँपते हाथों का वो आख़िरी नंबर

 वह आवाज़… वह लहज़ा… वह नफ़रत… सब कुछ स्पीकर के ज़रिए उस प्रतीक्षालय की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन अचानक मुझे किसी दहकते हुए अंगारे जैसा लगने लगा। मेरी नज़रें स्क्रीन से उठकर उन माँ के चेहरे पर गईं, और जो मैंने देखा, वह मैं ताउम्र नहीं … Read more

बंद लिफाफे का सफर

कबीर ने गहराई से कहा, “तुम दूसरों में खुशी ढूंढ रही हो, शिखा। तुम मानव से उम्मीद कर रही हो कि वह तुम्हें समझे, मुझसे उम्मीद कर रही हो कि मैं तुम्हारी बात सुनूं। लेकिन तुम उस शिखा को भूल गई हो, जो कॉलेज के मैगजीन के लिए कितनी शानदार कविताएं लिखती थी। जो अपने … Read more

अदृश्य डोर: एक माँ की वापसी

 यह सुनते ही देवकी की आत्मा सिहर उठी। वह जोर से “कबीर!” चिल्लाते हुए नींद से जाग गई। वह हांफ रही थी और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। बाहर बारिश रुक चुकी थी और सुबह की पहली किरण कबीर के कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। देवकी वहीं बैठी रही … Read more

error: Content is protected !!