एक फैसला – पुष्पा जोशी : Moral stories in hindi

  रामदयाल जी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानअध्यापक थे। वे एक ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े। छोटा सा गॉंव था, गाँव में उनका खेती का व्यवसाय था, और चार भाइयों का संयुक्त परिवार था। पिताजी गंगाराम ने सभी बेटों को पढ़ाने की कोशिश की। गाँव में हायरसेकण्डरी स्कूल था, आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ता था।रामदयाल जी के तीनों बड़े भाइयों की पढ़ाई में रूचि नहीं थी, उन्होंने मुश्किल से नौवीं,दसवीं त‌क पढ़ाई की। वे गाँव के माहौल में खुश थे, खेती किसानी‌ के काम में उन्हें आनन्द आता था।

रामदयाल जी कुशाग्र बुद्धि के थे,परीक्षा हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करते थे। उनकी आगे पढ़ने की इच्छा थी अत: गंगा रामजी ने उन्हें शहर में पढ़ने के लिए भेजा। रामदयाल जी ने कॉलेज में एडमिशन लिया और स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में पास की। बाद में बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान से बी.एड की डिग्री प्राप्त की। उसकी पढ़ाई के खर्चे में पिताजी और भाइयों ने कोई कमी नहीं रखी। रामदयाल जी ने प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण की और माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक बन गए।कुछ सालों में उनकी योग्यता के अनुसार उनका प्रमोशन हुआ वे माध्यमिक विद्यालय के प्रधान अध्यापक बन गए।

          गाँव में समय के साथ तीनों भाइयों का विवाह हो गया, तीनों के बच्चे हुए परिवार बढ़ गया और मकान छोटा पढ़ने लगा। जरूरत के हिसाब से कुछ कमरे और बनाऐ। रामदयाल जी का भी विवाह हो गया वे अपनी पत्नी के साथ शहर में ही रहने लगे। उनके भी तीन बच्चे हुए। दो बेटे और एक लड़की। लड़की दोनों बेटों से बड़ी थी। गंगाराम जी वृद्ध थे, और बिमार रहने लगे थे। एक बार उन्होंने चारों बेटो को बुलाया और कहा बेटा अब मेरा जाने का समय आ गया है। तुम्हारी दोनों बहिने तो उनके ससुराल में खुश है।

मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने से पूर्व मैं अपनी जमीन और मकान का बटवारा कर दूं ताकि मेरे जाने के बाद विवाद न हो                         रामदयाल जी ने कहा -‘बाबा! मैं शहर में रहता हूँ, मेरी अच्छी नौकरी है। मुझे इस मुकाम तक पहुँचाने में आपने और मेरे भाइयों ने जो सहयोग किया और प्यार दिया, वह मेरे लिए अनमोल है, मुझे मकान में और जमीन में कोई हिस्सा नहीं चाहिए। मैं तो बस यह चाहता हूँ ,कि मुझे मेरे परिवार का प्रेम मिलता रहै। मैं जब भी गाँव आऊॅं मुझे लगे कि मैं अपने घर आया हूँ, मकान में नहीं।’  गंगाराम जी बहुत खुश हुए।

अब उन्होंने तीनों बड़े बेटों से पूछा तो उन्होंने भी यही कहा कि-‘हम बटवारा नहीं चाहते हैं। हम सब साथ में रहेंगे बाबा! रामदयाल भले ही शहर रहै, वह हमारे दिल से दूर नहीं है। यह घर और खेत हम सबके हैं।’ गंगाराम के मन में संतोष था कि उनके बेटों में प्रेम है ।कुछ दिनों बाद गंगाराम का निधन हो गया। भाइयों में प्रेम बरकरार था। धीरे -धीरे सभी भाइयों के बच्चों की शादी हो गई। रामदयाल की बेटी सुधा का विवाह एक अच्छे सम्पन्न परिवार में हो गया था। वह मितव्ययी था, बच्चों को अच्छा शिक्षण दिलाया और रहने के लिए मकान भी बनाया।

वह दूरदर्शी था इसलिए उसने मकान को दो बराबर के हिस्सों में बनाया था, ताकि आगे चलकर कोई विवाद न हो। रामदयाल जी की बात अलग थी कि उन्होंने जमीन जायदाद में हिस्सा नहीं लिया, मगर उनके बेटे सोमेश्वर और विजयेश से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी, कि वे साथ साथ रहैंगे। दोनों बात- बात पर लड़ने लगते थे, और उनकी पत्नियाँ इनसे दो कदम आगे थी। हर पल झगड़े का माहौल रहता। रामदयाल जी और सुशीला जी परिवार में सामंजस्य बनाने की कोशिश करते थे।

मगर एक बिमारी के चलते सुशीला जी का निधन हो गया।इस दु:ख से उबर ही नहीं पाए थे और एक अनहौनी घटित हो गई है। सुधा के पति का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस पर दु:ख का पहाड़ टूट गया। ससुराल वाले जो उसे माथे पर बिठाए रखते थे उससे दूर हो गए। सुयश की मृत्यु के बाद उन्होंने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। जो सास ससुर उसे गृहलक्ष्मी कहते थे आज उसे अपशकुनी मानने लगे थे। और बात-बात पर ताने देते थे। ननंद और देवर भी उसे हमेशा टार्चर करते थे। वे चाहते थे कि  सुधा घर छोड़कर चली जाए। जब तक सहन कर सकती थी उसने सहन किया और फिर अपने मायके आ गई।

रामदयाल जी को उसकी हालत देखकर बहुत दु:ख हुआ उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा- ‘बेटा! तू चिन्ता मत कर मैं हूँ ना। मैं तेरी सारी व्यवस्था कर दूंगा।’ कहने को तो कह दिया रामदयाल जी ने मगर समझ नहीं पा रहै थे कि क्या करे। सेवानिवृत्ति के बाद जो पैसा मिला वह भी बेटो के मकान बनाने में लगा दिया। वह अकेला तो दोनों बेटों के पास आराम से जीवन यापन कर लेता, मगर अब सुधा के पूरे जीवन का प्रश्न था, बेटो के व्यवहार को वे जानते थे। उन्हें चिन्ता सता रही थी कि वे पक्के पान हो गए हैं, पता नहीं कब झड़ जाऐंगे।

उसके बाद ये बेटे सुधा के साथ पता नहीं कैसा व्यवहार करेंगे। ऐसा नहीं था कि दोनों आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे, मगर उनकी दुनियाँ उनके बीवी बच्चों तक सीमित थी। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। सोचते-सोचते उनके मन में एक विचार आया उन्होंने मन ही मन एक फैसला ले लिया था। उन्हें शांति से नींद आ गई।

दूसरे दिन उन्होंने अपने दोनों बेटों को बुलाया और अपना फैसला सुनाया- बेटा ! मेरी सम्पत्ति में जैसा तुम्हारा अधिकार है वैसे ही सुधा का भी अधिकार है उसका हमारे सिवा कोई नहीं है। मैं चाहता हूँ…… उनका वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था और बड़ा बेटा बोल उठा  – ‘ठीक है पापा , दीदी कुछ दिन हमारे साथ रहैं पर उन्हें उनके ससुराल तो जाना पड़ेगा।’ बड़े भाई के सुर में सुर मिलाकर छोटा बेटा बोला-‘हॉं पापा इस घर की हालत तो आपको मालुम है छोटा सा घर है, दीदी हमेशा तो यहाँ नहीं रह सकती है ना।

‘ रामदयाल जी ने कहा जब ससुराल में उसको कोई रखना ही नहीं चाहता है तो वह वहाँ कैसे रहैगी। मेरा फैसला है वो मेरे साथ ही रहेगी। मैं जानता हूँ कि तुम दोनों उसे अपने पास रखना नहीं चाहोगे। तुम्हारे विचार मैंने जान लिए है। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों मिलकर छत पर सुधा के रहने लायक मकान बनवा दो। पर पापा……। पर… वर… कुछ नहीं। यह मेरा फैसला है या तो सुधा के रहने के लिए एक रसोई, एक कमरा, एक हॉल और लेट बॉथ बनवा दो, या यह मकान छोड़ कर अपना अलग इन्तजाम कर लो।

मैं उसकी कहीं नौकरी लगवा दूंगा ,अपना भरण पोषण वह खुद कर लेगी। जब तक मैं हूँ सुधा को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा।’ फिर अपनी आवाज में नरमी लाकर बोले – ‘बेटा तुम तीनों भाई बहिन हो, अपना-अपना कमाया खाना पर सुख- दु:ख में साथ रहना। उनकी आंखों में और आवाज में नमी आ  गई थी। दोनों बेटों को उनकी बात समझ में आई,अपने कहै हुए शब्दों पर पछतावा हुआ। उन दोनों ने अपनी बहिन के लिए छत पर  घर बनवाया। रामदयाल जी ने एक स्कूल में उसकी नौकरी लगवा दी। रामदयाल जी अपनी इच्छा अनुसार सब बच्चों के साथ रहते। भाई बहिन अलग -अलग घर में रहते हुए भी सुख- दुःख में एक दूसरे के साथ थे। रामदयाल जी का फैसला रंग लाया, तीनों बच्चों का जीवन व्यवस्थित चलने लगा।

प्रेषक-

पुष्पा जोशी

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

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