सही फैसला – उमा वर्मा : Moral stories in hindi

 नन्दिनी आज अपने घर, अपने गांव लौट आई है ।थकी हारी है ।दिन भर का सफर था।बहुत शान्ति मिली है यहाँ आकर ।शायद सोच रही है, जो फैसला लिया, सही किया है ।वह तो मोह माया का बन्धन था।दुख तो होता ही है छोड़ कर लेकिन उसके सामने और कोई चारा नहीं था ।इसी घर में नन्दिनी  कभी दुलहन बन कर आयी थी ।कितने बरस बीत गए ।कितनी यादें सहेजी हुई है उसके मन में ।जब से गयी है कृष्णा ही देखभाल कर रहा था घर का।तभी तो निश्चिन्त थी वह।

वह पुरानी सोच में खोयी हुई थी तभी कावेरी, कृष्णा की पत्नी चाय ले आयी ” माँ पहले चाय पी लीजिये ” नहा धो लीजिए तबतक मैं भोजन तैयार कर लेती हूँ ।कितनी अच्छी है, कावेरी? एक दम अपनी बेटी की तरह ।शादी हुए छः साल बीत गए थे ।नन्दिनी माँ नहीं बन पायी ।सास के ताने उलाहना सुनती रही, डाक्टर के यहाँ दौड़ लगाती रही ।

नन्दिनी में तो कोई खराबी नहीं निकला तब जाकर सास थोड़ा नरम हुई थी ।उनके समझ में आ गया था कि उनके बेटे में ही गड़बड़ है ।और फिर परिवार की सहमति से राजेश और नन्दिनी अनाथालय से जाकर बच्चे को गोद लिया था ।गोल-मटोल बच्चा बहुत रो रहा था तब।नन्दिनी के गोद में आते ही चुप हो गया था।शायद ईश्वर ने उसे नन्दिनी के लिए ही भेजा था ।

फिर पूरी खाना पूर्ति करके बच्चे को गोद लिया था उसने ।राजेश अच्छे पोस्ट पर थे।पैसे की कमी नहीं थी।बच्चे की छठी और नाम करण खूब धूम धाम से हुआ था ।कृष्णा नाम दिया था सासू माँ ने ही ।कहा था ” बिलकुल कृष्ण कन्हैया सा लगता है ” फिर उसके ही पालन पोषण में कब नन्दिनी का समय कटने लगा था की राजेश भी उलाहना देते ” वाह! नन्दिनी, देख रहा हूँ, जब से कृष्णा घर में आया है तुम तो मुझे भूलती ही जा रही हो” अरे, कभी इस बन्दे का भी खयाल रखा करो।दोनों की नोक झोंक चलती रहती ।

फिर अचानक उसके जीवन में नयी हलचल शुरू हो गई ।दो साल का हो गया था कृष्णा, तभी उसे माँ बनने का अहसास हुआ ।” हे भगवान, जब चाहा तब तो मिला नहीं और अब यह सब फिर से?” खुश तो थी वह लेकिन मन में एक डर बैठ गया कि कृष्णा के तरफ से कहीं उदास हो गई तो क्या करेगा बिचारा ।” नहीं, नहीं वह ऐसा नहीं होने देगी ।वह हमेशा उसका बड़ा बेटा रहेगा ।समय पर बेटे का जन्म हुआ ।पति और सास बहुत खुश होते बच्चे को देख देख कर ।” आखिर अपना खून है ” दादी और पिता का प्यार बेटे में सिमट गया ।

लेकिन नन्दिनी के लिए कृष्णा जान था।उसे लगता कृष्णा के भाग्य से ही वह फिर एक बार माँ बनी है ।इसबार बच्चे का नाम केशव रखा गया ।दोनों बच्चे की उछलकूद से घर आँगन गुलज़ार रहता ।देखते देखते एक साल  बीत गया ।केशव का पहला जन्म दिन था।मन था कि खूब धूम धाम से मनाया जाए।राजेश स्कूटर लेकर कुछ सामान खरीदने के लिए घर से कुछ ही दूर निकले कि सामने से आते हुए ट्रक ने धक्का मार दिया ।किसी ने घर में खबर की।बदहवास नन्दिनी बच्चे को पड़ोसी के घर छोड़ कर कर दौड़ पड़ी ।

जब तक लोगों की मदद से अस्पताल में भर्ती कराया गया तो राजेश की कुछ साँस बची हुई थी लेकिन पत्नी के पहुँचते ही उनकी सांसें खत्म हो गई ।पछाड़ खा कर गिर पड़ी थी वह राजेश के शरीर पर ।उसके करूण चित्कार से पूरा इमरजेन्सी वार्ड हिल गया था ।फिर लोगों की मदद से घर आई तो बच्चे चिपक गये ।माँ को रोते देखा तो खुद भी रोने लगे।बहुत बड़ा सवाल था ।अब क्या करेगी? कहाँ जायेगी? दो छोटे बच्चे, बूढ़ी सास ।सबकी जिम्मेदारी उसी पर थी।नन्दिनी ने अपने मन को समझा लिया, खुद ही अपने आँसू पोंछ लिए ।

अब उसे अपनी चिंता तो थी साथ ही सास और दो छोटे बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना होगा ।दोनों बेटे का स्कूल में नाम लिखा दिया ।पति के बिना आमदनी ठप हो गई ।उसने भी स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली थी ।और घर में भी बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था ।बेटों की अच्छी शिक्षा के लिए पैसे तो रहने ही चाहिए था ।छः महीने के बाद बेटे के गम में सासूमा भी चली गई ।

बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ा नन्दिनी को।समय अपनी गति से भागने लगा था ।कृष्णा पढ़ाई में अव्वल आने लगा, वहीं केशव औसत नंबर लाता।किसी तरह पढ़ाई पूरी करके एक अच्छी कंपनी में सेटल हो गया था वह।वह नौकरी के सिलसिले में मुम्बई चला गया ।नन्दिनी कृष्णा के साथ गांव लौट आई ।कृष्णा का कहना था कि गांव में रहकर स्कूल खोलेगा और गरीब बच्चों की पढ़ाई में मदद करेगा ।

पति थे तो शहर में रहकर सब सुविधा का उपयोग किया लेकिन अब अपने को इसी वातावरण में ढालने का प्रयास करना होगा ,इस बात को वह अच्छी तरह महसूस कर रही थी ।कृष्णा पराया खून था लेकिन वह माँ का भरोसा वाला बेटा था।अपनी जमीन पर उसने स्कूल खुलवा दिया ।कृष्णा स्कूल के साथ खेती बारी भी देखने लगा था ।माँ के खाने पीने, और स्वास्थय का ध्यान भी रखता।फिर एक अच्छी लड़की देख कर कृष्णा की शादी हो गई ।

केशव को खबर देने पर भी नहीं आया ।वह महीने में एकाध बार माँ को फोन करता।फिर धीरे-धीरे फोन आना भी कम हो गया ।कृष्णा की पत्नी कावेरी भी बहुत सुशील लड़की थी वह भी नन्दिनी के लिए जान देती थी ।अब नन्दिनी का जीवन एक सिलसिलेवार ढंग से चल रहा था ।लेकिन केशव की याद उसे बेचैन कर देतीं ।एक दिन बिना बताये कृष्णा के साथ वह मुम्बई बेटे के यहाँ पहुँच गयी ।एक सजी धजी महिला ने दरवाजे पर स्वागत किया ।मालूम हुआ कि केशव ने अपने आफिस के मैनेजर के बेटी से  शादी कर ली थी एक महीने पहले ही ।

लड़की विजातीय थी।शायद इसीलिए माँ को खबर करना जरूरी नहीं समझा ।नन्दिनी कृष्णा के साथ लौटना चाहती थी।तभी बेटे ने रोक लिया ” नहीं माँ, अभी कैसे जा सकती हो तुम? आखिर मै तुम्हारा अपना बेटा हूँ ।बहू को तुम्हारी जरूरत है? हाथ उठ गए थे नन्दिनी के ।थपपड़ पड़ ही जाता, पर अपने को रोक लिया ।ठीक है रूक जाती हूँ लेकिन अपना और पराया शब्द आगे से मत निकालना ।

कृष्णा अपने खून से बढ़कर है मेरे लिए ।कृष्णा गांव लौट गया ।आश्वासन दिया कि ” जब जरूरत हो मुझे पुकार लेना माँ, मै दौड़ कर आ जाऊँगा ” कुछ दिन तो नन्दिनी के साथ सबकुछ ब्यवस्थित और अच्छा हुआ ।पन्द्रह बीस दिन के बाद परिवर्तन हो गया ।केशव काम पर चला जाता ।उसके जाने के बाद सीमा अपनी थाली लेकर कमरे में घुस जाती।वहीं खाती,टीवी देखती और सो जाती।घर के काम से कोई मतलब नहीं था उसे ।नन्दिनी दिन भर खटती रहती ।खाना बनाना, झाड़ू, बर्तन सब उसी के जिम्मे था ।

बेटा शाम को घर आता तो सीमा सास की खातिर दारी का दिखावा करती ।अच्छी अच्छी बातें करती, थाली परोस कर देती ।बिस्तर लगा देती।केशव खुश होता कि पत्नि माँ का खूब खयाल रखती है ।दूसरे ही दिन उसका रंग बदल जाता ।एक बार वैसे ही नन्दिनी को चक्कर आ गया था तो बोली कि ” ए बुढ़िया ,ज्यादा नाटक मत करना, यहाँ रहना है तो मेरे हिसाब से चलना होगा ।वरना धक्का देकर बाहर करना मुझे अच्छी तरह आता है ” अपने आँसू पोंछ लिए थे उसने ।सोचा बेटा को बता देना चाहिए ।

वह बताती उसके पहले अगले दिन केशव सुबह सुबह चिल्लाने लगा ” अम्मा, तुम्हे पैसे चाहिए थी तो मुझे कहती, ड्राअर से चोरी करने की क्या जरूरत थी ।पांच हजार रुपये मै कुछ काम से कल ही निकाल कर लाया था ” ” क्या कह रहा है तू बेटा, होश में तो है? माँ पर झूठा इलजाम लगाते शर्म नहीं आती तुझे?” उस रात नन्दिनी ने खाना नहीं  खाया ।रोने से सिर दर्द होने लगा था ।इसी दिन के लिए अपने बेटे को जन्म दिया? इससे भला तो वह अनाथ कृष्णा है जो पत्नि के साथ मिलकर मेरी सेवा में लगा रहता है ।

उसने मन में फैसला किया ” अब वह यहाँ एक पल भी नहीं रहेगी, इतनी जिल्लत कयों सहे वह? अभी भी उसके नाम से घर है, खेती बारी है और सबसे भला कृष्णा भी है ।उसने कागज कलम निकाला,और लिखा ” मेरे बाद मेरी जमीन जायदाद बेच कर आधे भाग को कृष्णा को दिया जाय और आधी भाग अनाथालय को दान में देना है ” सुबह बेटा बहू सोये हुए थे तभी चार बजे ही नन्दिनी घर से निकल गई ।पहली बस मिल गई थी उसे ।एक अजीब सी शांति मिल गई थी उसे ।घर पहुँची तो कृष्णा अकचका गया था ” माँ, आप ? अभी? अचानक?”

” सवाल मत कर बेटा ” अब मै हमेशा के लिए तेरे पास आ गयी हूँ ” उसने अपनी पेपर दिखा कर कहा ” बेटा, मैंने एक फैसला किया है, तू जल्दी से वकील साहब को बुला ला।उन्हे पेपर देना है ” जा देर मत करो ।कृष्णा दौड़ पड़ा ।दो घंटे के बाद लौट कर आया तो चिल्ला कर पुकारा ” माँ, देखो,वकील साहब को ले कर आ गया हूँ ” पर नन्दिनी कहाँ थी ?

केशव की तस्वीर को सीने से लगा कर सो गयी थी वह।लेकिन सोयी कहाँ थी ? वह तो दुनिया से मुक्त हो गई थी ।नन्दिनी का फैसला, उसकी जान लेकर चला गया ।बेटे के लिए कुछ न देकर भी दुखी थी और बेटे से मिले अपमान से भी दुखी थी ।उसके दुख का अंत हो गया था ।

उमा वर्मा, राँची ।सिंह मोड़ ।स्वरचित ।मौलिक ।

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!