सामान्य समझ – तरन्नुम तन्हा

नई नई शादी होकर घर में आई थी मैं। ‘एम ए बी एड है बहू मेरी’, मेरे ससुर साहब तो सबसे मेरी तारीफ़ करते, लेकिन घर में मेरी सासुमाँ हर समय बुराई ही करतीं, ‘इसे ये नहीं आता, इसे वो नहीं आता’।

ससुर जी चुप रह जाते, और मैं खुद को समझाती, ‘अगली बार और ध्यान से करूँगी।‘

होली आने वाली थी, तो तैयारियाँ चल रही थीं— कचौरियाँ, नमकीन, गुज़िया। गुज़िया तो मैंने माँ के साथ खूब बनवाईं थी, लेकिन खस्ता कचौरियाँ, और नमकीन वगैरहा तो हम बाजार से ही लेते थे। ससुराल में बाजारी सामान बहुत ही कम घर लाया जाता था।

कचौरियाँ बेलने के लिए मुझसे ही कहा, सासुमाँ ने। मैं बड़े उत्साह से बेलने बैठी।

“मैंने कचौरियाँ बेलने के लिए कहा है या पूरियाँ?” दो कचौरियाँ बेल कर रखते ही सासुमाँ ने अत्यंत कर्कश स्वर में सबको सुनाया हो जैसे।

“अरे तो बता दो न कि खस्ता कचौरियाँ छोटी बेली जाती हैं,” अखबार पढ़ते ससुरजी उठ आए।

“हर काम हम ही सिखाएंगे क्या? कुछ इसकी माँ ने नहीं सिखाया?” सासुमाँ की तानाशाही बरक़रार रही।

मेरी आँखों में आँसू भर आए। घर होता तो मैं रसोई छोड़ कर अपने कमरे में भाग जाती और फिर हर काम की छुट्टी। लेकिन, बहती आँखें लिए मैंने कचौरियों का आकार कम रखते हुए बेला। जब काफी कचौरियाँ बन गईं तो ससुरजी स्वाद चखने के लिए आ गए। दरअसल उठती खुश्बू से उनसे रुका ही नहीं जा रहा था।

‘”देखा बस इतनी सी तो बात थी। कितनी बढ़िया कचौरियाँ बनी हैं। बहू कितनी समझदार है, एक ही बार में सब समझ लेती है,” ससुरजी के चेहरे पर स्वाद का आनंद था।

“हुहं…” करके सासुमाँ रसोई में आ गईं और एक कचौरी खाते हुए बोलीं, “थोड़ी कम सेंको, इन्हें कुछ नहीं पता,” और मैंने सिंकाई थोड़ी कम कर दी।


इस तरह लगभग एक चौथाई कचौरियाँ कम सिंकी हुई बनी।

बाद में जब मैंने एक अधिक सिंकी खाकर देखी तो वह बहुत मज़ेदार थी। उसी समय पतिदेव घर आए तो मैंने उन्हें कम सिंकी कचौरी दी। उन्हें कुछ भी मज़ा न आया और कम सिंकी कचौरियाँ किसी ने भी स्वाद से नहीं खाईं। इस बात को देवरजी ने कहा तो सासुमाँ ने बात मुझ पर ही डाल दी कि तेरी भाभी ने बनाईं हैं। खैर, मैं चुप ही रही, और देवरजी ने छाँट कर बढ़िया सिंकी कचौरियाँ खाईं।

थोड़ी देर बाद जब मैंने रसोई में झांका तो देखा कि सासुमाँ कचौरियों में कुछ छाँटने की कोशिश कर रही थीं। जबकि मैंने, पहले ही कम सिंकी कचौरियों को एक तरफ रख दिया था, होली वाले दिन गली के भंगेड़ियों को खिलाने के लिए।

—TT (तरन्नुम तन्हा)

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