उड़ान – संजय मृदुल : Moral stories in hindi

मैं तुम्हे जाता देख रही हूं, जेबों में हाथ डाले सर झुकाए। थोड़े कंधे भी झुके हुए हैं मंथर गति से। मैं बालकनी में खड़ी हूं और तुम   बीते समय की तरह गुजर गए चुपचाप। न कदम ठिठके, न नजर उठी। तुम्हारी पीठ दिखाई दे रही है जाते हुए। अजीब सा सुकून मिल रहा है मुझे। तुम्हारी परछाई में नमी दिखाई दे रही है। आज पहली बार हुआ कि तुम ऐसे ही चले गए। न देखा न रुके न घर आये।

तुम्हे यूँ सुलगता देखकर सुकून मिलता है मुझे। हमेशा ही तुम खामोशी से हर बार मेरी हर बात मान लेते हो।कोई प्रश्न नही, कभी ना नही। कैसे हो तुम। कोई कैसे किसी को इस हद तक प्यार कर सकता है। पूरी जिंदगी तुमने बेकार कर दी मेरे लिए। न घर बसाया न यहां से कहीं शिफ्ट हुए। हम बचपन से यहां रहते हैं। तुम्हारा घर थोड़ी ही दूरी पर। तुम भैया के दोस्त उनके क्लासमेट।

रोज का घर आना जाना। तुम शुरू से संकोची, संतोषी। मैं बड़े सपने देखने वाली। तुम्हे मालूम था पढ़ाई के बाद तुम्हे अपनी पारिवारिक दुकान की जिम्मेदारी सम्हालनी है। और मुझे ख्वाहिश थी अलग अलग शहर घूमने की। बड़े बंगले में रहने की। किसी उच्च शिक्षित से शादी करने की। तुम कभी मेरी कल्पना में फिट ही नही होते थे। उम्र के साथ तुम्हारी नजरो में आते बदलाव से मैं वाकिफ थी। तुम कुछ कहते नही थे पर तुम्हारा व्यवहार सब जाहिर करता था। कभी कोई काम हो, कुछ जरूरत हो तुम सबसे पहले हाजिर। मुझे अच्छा तो लगता था तुम्हारा इस तरह से केअर करना मुझे अच्छा तो लगता था मगर इतना सीरियसली नही लेती थी। क्योंकि मुझे मालूम था मेरी मंजिल कहीं और है।

भैया सब समझते थे एक दो बार इशारों में कुछ व्यक्त भी करना चाहा उन्होंने मगर मैंने कोई जवाब नही दिया। उन्होंने भी जोर नही दिया। शायद वो दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहते थे लेकिन मेरी उड़ान से भी वाकिफ थे वो। उन्हें लगा दोनो की जोड़ी बेमेल होगी।

फिर एक दिन मेरी शादी हो गयी, बड़े से परिवार के छोटे बेटे पेशे से इंजीनियर, उच्च शिक्षित परिवार। जैसे मेरे ख्वाब थे बिल्कुल वैसे ही। तुम हमेशा की तरह शांत, चुपचाप शादी में ऐसे लगे रहे जैसे कोई फर्क नही पड़ रहा हो। मगर तुम्हारी आंखे पढ़नी आती है मुझको। कितनी बेचैनी, कितना दर्द कितना लावा भरा था उनमें। तुम कैसे कर लेते हो ये सब। जबकि जानते हो कि तुमसे प्यार नही मुझे। तुम बस एक दोस्त हो। हमेशा मेरे लिए सब कुछ कर जाने के लिए तैयार, मेरे दुख तकलीफ बिना बताए समझ लेने वाले। मैं जानती हूं मैं बहुत कठोर हूँ अपने सपनो के लिए। जो चाहा वो चाहिए ही। इसीलिये कभी तुम्हारे प्रेम को बढ़ावा नही दिया। सोचती थी एक दिन तुम हकीकत से समझौता कर लोगे।

शादी के बाद एक दूसरे प्रदेश में बसना जहां कोई अपना न हो आसान नही होता। कितने साल हो गए। व्यस्तता ऐसी बढ़ी इनकी की मायके आने का मौका ही नही मिला। नॉकरी की अपनी परेशानियां, और वो बात जो कहना भी मुश्किल। 

जरूरी नही होता कि हर पढ़ा लिखा खूबसूरत इंसान सुसंस्कृत भी हो, अच्छा भी हो। अंकुल को काम के अलावा कुछ और नही सूझता था। मेरी रुचि मेरी खुशियों के लिए समय नही था। घर आते ऑफिस से तो फिर काम फैलाकर बैठ जाते। मेरी जरूरत तब पड़ती जब मेरी नींद पड़ चुकी होती। पूरी तरह झिंझोड़कर निचोड़कर करवट बदल सो जाते। मैं कब क्या चाहती हूं इस से कोई सरोकार नही था उन्हें। कम बोलना, कभी किसी बात की तारीफ न करना, न कभी परिवार से मिलने की बात करना। लगता था वो यहां आना पसन्द नही करते थे।

मैं कभी कहती भी तो टाल जाते। मेरे परिवार से अजीब सी बेरुखी थी उन्हें। कट रही थी जिंदगी बस। सारे ख्वाब सारी उड़ाने अब बेकार लगने लगे थे। क्या इसी जिंदगी के ख्वाब देखे थे मैंने। मेरे सारे शौक मन के सन्दूक में बंद हो गए थे जिनके ताले की चाबी खो गयी थी। उन्हें मेरा सोशल होना, डांस करना, लिखना कुछ भी पसन्द नही था। जीवन एक ढर्रे में बंध गया था। एक बिटिया ही थी जिसके सहारे कट रही थी जिंदगी। सालो बाद जब मैं मायके आयी तो तुम मिलने आये मुझसे। मैं बालकनी में थी, पीठ थी तुमहरी तरफ। तुम चुपचाप करीब आये और  धीरे से पूछा ये कैसे निशान हैं पीठ पर। उस पल मैं पल्लू से पीठ ढंकना भूल गयी थी या शायद अकेली थी इएलिये लापरवाह हो गयी।

मैंने कहा कैसे निशान? खरोंच के तुम ने कहा। मैं चुप रही। तुम्हारी आँखों मे नमी दिखाई दी एक पल को। तुम चुपचाप वापस चले गए बिना कुछ कहे। जब तक मैं थी तुम रोज कई बार आते घर। मगर मुझसे बात न करते। उदास आंखे मेरी आँखों से टकराती और तुम नजर झुका लेते।

तुमने शादी नही की। क्यों? कभी बताया नही, मगर मुझे मालूम था, मेरी जगह कोई नही ले सकती। तुम्हारे यहां मुझे खाने के लिए बुलाया था मुझे तुम्हारे घरवालों ने। हम सब गए थे। तब मैंने तुम्हारे कमरे में तुम्हारी डायरी देख ली थी। जाने तुमने जानबूझकर रखी थी सामने या अनजाने में। मैं चुपचाप ले आई थी छुपाकर। सारी रात बांचती रही एक एक लफ्ज़। केवल मेरी बातें मेरी यादें। 

मन ही मन भीगती रही और सोचती रही कि मैंने सही किया या गलत तुम्हारे साथ।

मगर अब समय निकल चुका था। क्या फायदा सब सोचकर।

दूसरे दिन तुम आये तो चुपचाप तुम्हे डायरी थमाई और हट गई वहां से। तुम हमेशा की तरह चुपचाप चले गए। जितने दिन मैं रही न आये न बात की।

अब सालो बाद जब उम्र के पचासवें पड़ाव की दहलीज में खड़े हैं हम। मैं हमेशा के लिए वापस आ चुकी हूं। वो नही रहे। ससुराल का माहौल ऐसा था नही की वहां जगह मिलती। तो और कोई ठिकाना भी नही था मायके के सिवा। बेटी एक कॉलेज में पढ़ाने लगी है। भैया ने ऊपर वाले मंजिल में दो कमरे दे दिए थे तो गुजर हो रही है। तुम आज भी रोज घर आते हो पहले की तरह। भैया के साथ दोस्ती वैसी ही है तुम्हारी शायद अब और करीब हो तुम उनके। मैं जब से आई हूं देख रही हूं मेरी जरूरतों का ख्याल रखते हो पहले जैसे।

भैया भी हक़ से बोल देते हैं तुम मुस्कुरा के हाँ बोल कर कर देते हो। बिटिया कब जाती कब आती है ध्यान रखते हो। रोज एक बार मेसेज कर पूछ लेते हो तुम ठीक हो? मैं हाँ कह देती। फिर पूरा दिन कोई बात नही। पर तुम्हारी आंखे जाने क्या क्या कहती हैं। मैं नही झांकती उनमें, नजर भी नही मिलाती तुमसे। इतना सब होने के बाद कभी कोई उलाहना नही दिखाई दी इनमे।

तुम किस कदर चाहते हो मुझे ये जानती हूं मैं। पर क्या करूँ। अब न उम्र है न हालात। सच कहूं तो अब मन भी नही तुमसे जुड़ने का। तुम्हारे साथ जो भी किया मैंने वो अब दर्द देता है मुझको। अफसोस होता है। अब लगता है कि ऊंची उड़ान हमेशा नही होती। जीवन तो जमीन पर ही बिताना होता है। चाहे पंछी हो या इंसान। एक घोसला एक घर ही आखरी मंजिल होते हैं। मैं चाहूं भी तो सब वापस नही आ सकता। ये कोई फ़िल्म या उपन्यास नही जिसमे इस उम्र में दूसरा विवाह हो जाता है। सच्चाई बहुत अलग होती है। अब ऐसे ही जीना है। तुम रोज यूँ ही जाओगे यहां से और मैं बस देखती रहूँगी।

संजय मृदुल

रायपुर

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