हर मर्ज का इलाज दवाई नहीं है- मंजू ओमर । Moral stories in hindi

हर मर्ज का इलाज दवाई नहीं है सही बात है। जबसे मैं प्रेमा से मिलकर आई हूं मन को बहुत अच्छा लग रहा है। बीमारी के बाद आज तीसरी बार प्रेमा से मुलाकात हुई है ।

              प्रेमा मेरी बहुत अच्छी सहेली है और मेरी किटी पार्टी की मेम्बर्स भी । अभी दो महीने पहले प्रेमा बाथरूम में बेहोश हो गई थी, घर में कोई भी नहीं था पति काम पर गए थे और बहू मायके गई हुई थी और बेटा बैंक गया था वो बैंक में नौकरी करता था।वो चार घंटे बाथरूम में बैहोश पड़ी रही ।

                        दरअसल प्रेमा बिल्कुल दुबली-पतली, सांवली सलोनी नार्मल कद काठी की महिला थी। शुगर और वीपी की मरीज भी । एक बेटी थी जिसने लव-मैरिज कर ली थी तो प्रेमा और उनके पति महेश जी ने बेटी से रिश्ता तोड लिया था क्योंकि बेटी ने बहुत छोटी जाति में शादी कर ली थी।इस बात को लेकर बहू प्रेमा को ताने मारती रहती थी कि बेटी को कैसे संस्कार दिए थे कि घर से भागकर शादी कर ली ।और इधर महेश जी भी प्रेमा का ध्यान नहीं रखते थे । ऐसा लगता था कि जैसे वो उनकी पत्नी नहीं घर की नौकरानी हो । शादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी घर में कोई कद्र नहीं थी चाहे जो भी बातें सुनाकर चला जाता था। ऐसा लगता था कि बेटी के भाग जाने में उन्हीं का हाथ हो । आखिर सबके साथ उनने भी तो अपनी बेटी खोइ थी सिर्फ वो ही तो जिम्मेदार नहीं थी ।

                   महेश जी की कुछ खेती बाड़ी भी थी जिससे खड़ा अनाज घर में आता था और प्रेमा से कहते थे कि इसको कूट पीसकर साफ करके रखो और घर के चक्की से पीसकर आटा बेसन तैयार करो ।और घर के सारे काम करों। खानें पीने का कोई सामान बनना है तो घर पर बनाओ जैसे मिठाई या नमकीन या कोई नाश्ता , रसगुल्ले बनने है तो घर पर खोआ बना कर बनाओ ,पनीर बनना है तो घर में दूध फाड़कर पनीर बनाओ बाजार से कुछ नहीं आयेगा।बेचारी प्रेमा दिनभर घर के कामों में ही व्यस्त रहती थी जब देखो तब वो काम ही किया करती थी ।

                बहू भी कोई काम में हाथ नहीं बंटाती थी ।बेटा बैंक जाता था तो उसका भी टिफिन बना कर पेमा को ही देना है ।जब हम सहेलियां कहते थे कि बहू से कहो बेटे का टिफिन बनाए तो वो कहती बेटा कहता है वो सोकर अभी नहीं उठी है ।आप ही बना दो ना बहू का पक्ष लेता रहता है हर वक्त साढ़े आठ बजे बेटा को निकलना रहता है सो वो जानबूझ कर देर से उठती है कि बनना न पड़े। महेश जी भी कहते यदि बहू नहीं बना रही है तो क्यों उसके पीछे पड़ी हो बहू बेटे में झगड़ा करवाओगी बेमतलब तुम ही बना दिया करों ।घर में शांति बनी रहे इसलिए पेमा भी कुछ नहीं बोलती अपना नसीब समझ कर करती रहती है बेचारी ।                इस तरह पेमा पर बहुत बोझ था घर का और घर के कामों का ।और इतना सबकुछ करने पर भी उनकी कोई इज्जत नहीं थी घर में। प्रेमा कहती इतना सबकुछ करने पर भी घर में मेरी कोई इज्जत नहीं है और न कोई मुझपर ध्यान देता है तो क्या करना है जी कर और फिर इसी लिए वो शुगर और वीपी की दवाई नहीं खाती थी । कभी खा लिया कभी नहीं खाया।बस लापरवाही ।हम लोग बहुत गुस्सा होते थे कि प्रेमा तुम दवाई क्यों नहीं खाती हो देखना किसी दिन लफड़ा हो जायेगा । लेकिन प्रेमा की एक खराब आदत थी वो किसी की नहीं सुनती थी ज्यादा कहो तो कहती कि मैं परहेज से रहती हूं शुगर है तो मीठा नहीं खाती ।बस जब भी बैठती घर में सबकी बुराइयां बताती रहती ‌।

                    बस उसी का नतीजा निकला कि उस दिन वो बाथरूम में चक्कर खाकर गिर पड़ी वीपी शूट कर गया था ।ब्रेन हेमरेज हो गया था। दोपहर दो बजे गिरी थी बाथरूम में और शाम को छै बजे जब बेटा बैंक से आया तो दरवाजा अंदर से बंद था । खटखटाने पर कोई खोल नहीं रहा था । पड़ोसी की मदद से दरवाजा खोला मम्मी, मम्मी की आवाज लगाई सब जगह देखा पर कहीं मम्मी दिखाई नहीं दी । फिर बाथरूम में जाकर देखा तो मम्मी बेहोश पड़ी थी । तुरंत एम्बुलेंस बुलाई गई और अस्पताल ले जाया गया लेकिन काफी समय बीत गया था सो यहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए । ग्वालियर ले जाया गया लेकिन स्थिति कंट्रोल में नहीं आ पा रही थी 20 दिन रहने के बाद भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर दिल्ली ले जाया गया अब वहां स्थिति बेहतर है ।

          करीब एक महीने के बाद घर लौट कर आई ।हम लोग मिलना चाह रहे थे लेकिन बेटा और महेश जी ने मिलने नहीं दिया पैरालिसिस का अटैक था तो प्रेमा बिस्तर में ही थी । यादाश्त भी काफी चली गई थी ।घर आने के पंद्रह दिन बाद जब डाक्टर से बात हुई तो उन्होंने कहा इनको पुराने लोगो से मिलवाएं पुरानी बातें याद कराए ,इनको खुशनुमा माहौल दिजिए तो वो धीरे धीरे ठीक होंगी।

                   फिर एक दिन महेश जी का फोन आया कि भाभी जी आप घर आकर प्रेमा से मिल सकती है ।हम लोग करीब सात लोग उनके घर गए व्हील चेयर पर बैठे पेमा को देखा हम लोगों को देखते ही उसकी आंखों से अश्रु की धारा बहने लगी हम लोगों ने एक एक कर अपना नाम पूछा लेकिन सबका नाम वो बताने में असमर्थ रही ।हम लोगों ने बहुत ढांढस बंधाया तो फिर थोड़ा नार्मल हो पाई। कुछ देर बात करके हम लोग वापस आ गए ।

               दो दिन बाद मैं फिर गई मुझसे कुछ ज्यादा ही लगाव था उनका तो उस दिन मुझे दैख कर मुस्कुराई। मैंने खूब हिम्मत बढ़ाई और पाज़िटिव सोच रखने को कहा । थोड़ी बातें करके मैं वापस आ गई ।अब कल मैं तीसरी बार गई तो महेश जी कहने लगे भाभी जी आप लोगो के आने से बहुत फर्क पड़ गया है प्रेमा में आप हर एक दो दिन में आती रहा करिए ।

                 आज बेटा बहू और महेश जी सबको इतना ध्यान रखते देखकर बहुत अच्छा लग रहा था । महेश जी बार बार रिक्वेस्ट कर रहे थे कि आप आती रहियेगा जल्दी जल्दी । हमने कहा ठीक है भाई साहब दवाई अपनी जगह है मिलना जुलना अपनी जगह है ।आपस में मेलजोल भी दवाई का ही काम करती है ।आप किसी से मिलने नहीं दे कर ठीक नहीं कर रहे थे ।अब चिंता न किजिए पेमा जल्दी ठीक हो जाएगी।

                   हर मर्ज का इलाज दवाई है तो अपनापन और मेल-मिलाप भी है । प्यार के दो मीठे बोल बहुत से मर्ज को दूर कर देती है । मैंने पेमा से कहा देखना जल्दी ही तुम किटी पार्टी में आने लगोगी । प्रेमा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान बिखर गई ।

धन्यवाद 

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

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