अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 39) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

अचानक कमरे की लाइट ऑन हुई और ऑंखों पर पड़े इस प्रकाश ने विनया की ऑंखें बंद कर दी और वो चीख कर डगमगा गई, डगमगाते ही उसने खुद को बलिष्ठ हाथों में पाया।

“तुम डरती भी हो, मुझे तो लगा था केवल डराती हो।” मनीष विनया को बाॉंहों में लिए उसकी कजरारी नैनों में झांकता हुआ कहता है।

विनया की बड़ी आश्चर्यचकित आंखों से मनीष ने दोनों की तक़दीर के इस मोड़ को साझा किया। उसने कहा, “तुम्हें नहीं पता, मैं भी तुम्हें देखकर हैरान हूँ। यह कैसा सपना है जिसे हकीकत में मैं जी रहा हूँ?”

विनया ने धीरे से कहा, “मुझे लगा कि आप सिर्फ मेरे साथ खेल रहे हैं, मनीष।”

मनीष ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, “नहीं, यह सच है। तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा है। मैं तुम्हें सच से भी ज्यादा महसूस कर रहा हूँ और तुम्हारे साथ यह सब बहुत ही खास है।” मनीष ने विनया के चेहरे पर एक सजीव मुस्कान बिखेरी।

विनया ने भी मुस्कराते हुए कहा, “फिर, यह कैसा चमत्कार हुआ कि आप यहाँ हैं? कुछ समय पहले तो आपके यहाँ होने का कोई अंदेशा नहीं था।”

मनीष ने कहा, “हाँ, मैंने यह नहीं सोचा था कि हमारा सामंजस्यिक सफर इतना रोमांटिक होगा। मगर मुझे तुम्हारे बिना अब सब कुछ अधूरा लगता है और यह सचमुच आश्चर्यजनक है। मुझे तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी आँखों की चमक और तुम्हारी बातों में छुपी खासियतें हर क्षण याद आती रहती हैं।”

विनया ने धीरे से कहा, “मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि मेरा कमरा इतनी मिठास से भरा होगा। आपकी बुद्धिमत्ता, आपकी मुस्कान सब कुछ अब मेरे जीवन का हिस्सा बन गया है।”

यह दोनों एक दूसरे के आँचल में खुद को थामे अपने नए जीवन के साथ प्रियता और खुशियों की शुरुआत करने के लिए तैयार थे और अपने मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे।

उनके दिलों में बसी खुशी और एक-दूसरे के साथ बिताए गए समय की मिठास से उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा था। मनीष ने विनया की आँखों में देखा और कहा, “तुम्हारी हंसी मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है और मैं वादा करता हूँ कि हम एक-दूसरे के साथ हर रोज़ को खास बनाएंगे।”

विनया ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “हाँ, एक दूसरे के साथ जीना ही अब हमारा सबसे खास अनुभव होगा। हम एक-दूसरे के साथ मिलकर हर समस्या का सामना करेंगे और हर खुशी को और भी खास बनाएंगे।”

इस मिठास भरे पल के बाद, वे दोनों एक नए अध्याय की शुरुआत करने की ओर अग्रसर थे जो उनके जीवन को प्रेम, समर्थन और संबंधों से भरा हुआ रखने के लिए, नए सपनों की ओर उड़ान भरने के लिए तैयार हो रहा था।

“पूरी रात मेरी बांहों में ही बातें करते गुजारोगी क्या, आह बहुत भारी हो यार तुम। संपदा ने कहा था कि उसकी भाभी छुई मुई सी है, कहीं अदला बदली तो नहीं हो गई। तुम्हीं हो ना उसकी भाभी।” बोलते हुए मनीष खिलखिला कर हॅंस पड़ा था।

जी, नहीं नहीं, विनया मनीष के कथन पर हड़बड़ाती उसकी भुजाओं से निकलने की कोशिश करती है। लेकिन मनीष उसे एक हाथ से थामे रखा और दूसरे हाथ से फिर से कमरे का पंखा ऑन कर देता है। कमरे में ठंडी बयार के साथ साथ फूलों की पंखुड़ियां विनया के चेहरे पर गिरने लगती हैं। 

वहाँ बही ठंडी बयार ने उनकी बढ़ती हुई उत्साह और उम्मीद की भावना को और भी बढ़ा दिया। फूलों की पंखुड़ियां विनया के चेहरे को प्यार और आत्मा की शांति का प्रतीक बन कर छूने लगीं। मनीष ने इस सुंदर समय का आनंद लेते हुए कहा, “तुम्हारी हर हरकत मेरे जीवन को रंगत से भर रही है और तुम्हारा साथ का सभी लम्हें मुझे स्वार्थ बना रहे हैं। दिल चाह रहा है कि इस रात की सुबह ना हो।” होंठों पर शरारती मुस्कान सजाए मनीष कहता है।

उसकी शरारती मुस्कान में छुपी प्रेम की सौगात विनया के चेहरे पर नई नवेली दुल्हन सी रंगत फैला रही थी, जैसे कि एक नए प्यार की खुशी से भरी शुरुआत हो रही हो। शर्माती हुई विनया कवि की कविता सी लग रही थी, जिसके चेहरे पर पड़ी शर्म की हर रेखा अपनी भावनाओं को संवेदनशीलता से बहा रही थी। उसकी हर एक हँसी, हर एक झिलमिलाहट और आँखों की चमक एक कविता की माधुर्यपूर्ण छंद में बदल जा रही थी। उसका आभा से भरा हुआ रूप, हर संवाद कला का सौंदर्य प्रस्तुत कर रहा था, जो मनीष को मग्न करता हुआ बांधता जा रहा था। मनीष की नजरें विनया के चेहरे से हटने के लिए सहमत नहीं थी, उसकी नजरों ने विनया को इस तरह घेर रखा था मानो उसे पहली बार देख रही हो। विनया उसकी नजरों से बचने के लिए उसके बांहों से निकलने के लिए कसमसाती है।

मनीष ने विनया को आपने और करीब खींचा और कहा, “यह सुबह अब और भी खास होने वाली है और हमारे बीच का यह नया आरंभ हमें सदैव याद रहेगा।”

मनीष के मुख से निकले इस वाक्य को सुनकर विनया शर्माती सुरम्य सरोवर में छुपे हुए तारों सी खुद में सिमट गई और धड़कनें ऐसे ऊपर नीचे होने लगी जैसे सरोवर की सतह पर खेलती हुई छोटी-छोटी लहरें और सिर के ऊपर बहती हवा में भी विनया के ललाट को स्वेद कणों की छोटी छोटी बूंदें चूमने लगी थी। विनया की हालत देख मनीष हॅंस पड़ा और उसे अपने बांहों से आजाद करता पंखा बंद कर उसके शरीर से खिसक गए शॉल को उसके चारों ओर लपेटता कर सो जाने के लिए कहता है और खुद भी हॅंसता हुआ बिस्तर के एक किनारे जाकर लेट गया।

विनया पसीने को पोछती कंबल ओढ़े अपनी धड़कन को सुनती सोने की कोशिश करने लगी। धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें बंद की और मन की गहराईयों में खो गई। पसीने से भीगी कंबल ने उसके शरीर को गरमी में लपेट लिया, रात भी चुपके से चुपके खिसक रहा था और उसका शांत स्वप्नमय मन उसे एक अनूठे सफर पर ले जा रहा था, जहां चाँदनी की किरणें भी उसकी रात को मधुर बना रही थी। जैसे कि वह सुन्दरता और शान्ति के अद्भुत संगम का अनुभव कर रही हो, जहां सपनों की पूर्ति और स्वप्नदृष्टि का मिलन हो रहा था।

विनया का शान्त स्वप्नमय मन रात के सिरे से लेकर सुबह तक कई रंगीन दृश्यों में लिपटा रहा। उसकी धड़कनें सपनों के स्वर्ग में सहजता से बहने लगी। उसकी मुस्कान सपनों की मिठास से भरी हुई एक नए दिन की शुरुआत की सूचना दे रही थी, जैसे कि एक नए सफर की शुरुआत हो रही हो। इस नए दिन के साथ विनया ने सपनों की गहरी दुनिया से निकल कर नए उत्साह के साथ आँखें खोली और सामने मनीष को बैठा देख झटपट उठ बैठी।

“वो मैं रात”… विनया का मासूम चेहरा आत्मग्लानि से भर हुआ था जैसे कि उसने कोई अनजाना पाप कर दिया हो।

“ना, तुम पर यह नहीं जंचता है। जैसे रात के अंधकार से निकलकर सूर्य की किरणें नई सुबह के आगमन की सूचना देती हैं, उसी तरह तुम्हारा चेहरा भी नई उम्मीदों और सपनों से भरा हुआ ही शोभता है। पगली हमारा रिश्ता पहले मैत्री सूत्र से तो बंध जाए, इससे बड़ा रिश्ता भी होता है क्या?” मनीष उसकी भावनाओं को समझ कर उसके बगल में बैठा उसकी हथेली को अपनी हथेली के साथ मिलाता हुआ कहता है।

और विनया अपनी बड़ी बड़ी ऑंखों को और बड़ी करके मनीष को देख रही थी। क्या वो इतना संजीदा भी हो सकता है, उसे विश्वास नहीं हो रहा था। विनया की नजरें मनीष के चेहरे पर हैरानी और प्यार से टिकी हुई थी, उसके सामने पल पल मनीष का नया रूप उजागर हो रहा था। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था और वह आत्मविश्वास से भरी आँखों से मनीष की ओर देख रही थी, जैसे कि वह खुद को इस नए युगल के साथ जोड़ रही हो।

“अब ऐसे ही घूरती रहोगी कि चलोगी भी, मैंने तुम्हारे साथ सूर्योदय देखने के लिए अपनी नींद को तलांजलि दी है।” मनीष उसे खड़ा करता हुआ कहता है।

“आं, हाॅं” विनया स्वप्न संसार में डूबी मनीष के निर्देश पर चली जा रही थी।

और इस नए स्वप्न संसार में विनया और मनीष की भावनाएं आपस में मिलकर एक दूसरे के साथ जुड़ रही थी। उनकी बातचीत और हंसी में छुपा एक अद्भुत संबंध बन रहा था, जो दोनों को एक-दूसरे के करीब ले जा रहा था। विनया ने आदर्श स्वप्नों को पूरा करने की दिशा में नए उत्साह के साथ कदम बढ़ाया, जबकि मनीष ने उसे सहारा और समर्थन दिया। इस प्यार भरे सफर में वे अपने आप को नए और बेहतर रास्तों पर पहुंचते हुए महसूस कर रहे थे। साथ ही साथ एक-दूसरे के साथ रहने का सुख भी महसूस कर रहे थे, जिसमें हर कदम एक नई कहानी का हिस्सा बनता जा रहा था। 

बालकनी की रेलिंग पर निशा के बीतने की गवाह चमकते मोतियों को हाथ से एकसार करते हुए दोनों आजू बाजू खड़े पौ फटने की प्रतीक्षा कर रहे थे मनीष विनया से कुछ कहने के लिए उसकी ओर देखता है तो वो सामने विशाल पेड़ की ओर मुग्ध दृष्टि दिए देख रही थी।

मनीष उसकी नजर का पीछा करता सामने देखता है तो पक्षियों का जोड़ा अपनी भाषा में किलोल करते दिखे।

“कल रात तुम्हारे माथे पर उभर आई पसीने की बूंदों ने बता दिया कि तुम सच में ही छुई मुई हो।” मनीष पक्षियों को देखता हुआ विनया के थोड़ा और निकट आकर उसके कान में फुसफुसा उठा।

विनया मनीष के कान में फुसफुसाने पर पहले उसे चौंक कर देखती है और फिर उसकी बात समझ कर होंठों पर दबी मुस्कान और गुलाबी ठंड को खुद में समेटे गुलाबी चेहरा लिए शरमा कर नजर नीची कर लेती है और अंजना के कमरे से निकलती संपदा दोनों को दोनों को एक दूसरे के इतने निकट देख चुपचाप फिर से कमरे की ओर पैर मोड़ लेती है और मोबाइल लेकर उन दोनों का पीछे से एक तस्वीर क्लिक कर अंजना को दिखाती है।

अंजना उन दोनों को एक दूसरे के मगन देख खिल उठी थी। उसकी आंखों के अश्रु बता रहे थे कि बेटे बहू में बढ़ रहे सामंजस्य को देख कर उसकी खुशियां द्विगुणित हो गई थी। 

“ओह हो तुम मम्मियों की यही दिक्कत है, गंगा यमुना बहाने का कोई बहाना चाहिए होता है।” अंजना के गाल पर टपके अश्रु बूंदों को देखकर संपदा उसे चिढ़ाती हुई कहती है।

“तुम नहीं समझोगी।” उन खुशियों भरे अश्रु को अपनी हथेली में समाती हुई अंजना संपदा के गाल थपथपा कर कहती है।

मम्मी दीपिका भाभी ने यह सुंदर विचार साझा किया कि हमें अपने जीवन में विशेष और अनमोल लम्हों की तस्वीरें कैद करनी चाहिए। ये तस्वीरें हमारे लिए न केवल प्रेम की मिठास को बनाए रखने में सहायक होती हैं, बल्कि वे हमें हर परिस्थिति में खुद को स्मित रेखा की अनुभूति करने का मौका देती हैं। इन तस्वीरों के माध्यम से हम अपने जीवन के सुंदर पलों को सजीव रूप से महसूस करते हैं और उन्हें स्थायी रूप से याद कर सकते हैं। यह एक खूबसूरत विचार है जो हमें हमारे जीवन को सकारात्मकता और प्रेम से भरने की प्रेरणा प्रदान करता है।”

“इस सुंदर विचार के माध्यम से हमें यह सिखने को मिलता है कि जीवन में हर छोटी-बड़ी खुशियाँ और प्यार भरे पल हमारे लिए महत्वपूर्ण होते हैं। विशेष रूप से यह दीपिका भाभी ने हमें याद दिलाया है कि हमें इन लम्हों का उचित मूल्य देना चाहिए और उन्हें हमारे जीवन के किसी भी मोड़ पर दोहराना चाहिए। इससे हम न केवल अपनी खुशियों के मौजूदा समय का आनंद लेते हैं, बल्कि भविष्य में भी उन्हें फिर से जीने का साहस पा सकते हैं।” संपदा मनीष और विनया की तस्वीर को निहारती हुई दीपिका को याद करती हुई अंजना से कहती है।

“आओ मम्मी, तुम्हारे इन गंगा यमुना के साथ भी एक सेल्फी ली जाए। कल को अगर भैया भाभी के प्रेम से तुम्हें अन्य सासों की तरह अगर कुढ़न महसूस हुई तो ये खुशियों भरी सेल्फी देख कर वापस अपने अच्छे रूप में आ सकोगी।” मोबाइल उपर कर उसके फ्रेम में खुद को और अंजना को समाती हुई संपदा हॅंसती हुई कहती है।

इस दिन के लिए तो एक साल से नैन तरस गए थे मेरे। अब तुम्हारी शादी हो जाए तो बस”…

“ना ना, भाभी ने कहा जब तक मैं अपने पैरों पर ना खड़ी हो जाऊंगी, तब तक वो मेरी शादी का नहीं सोचेंगी। मैं तो सोच रही हूं ऐसी मशक्कत के बाद मुझे यहाॅं से जाना ही होगा तो ये मशक्कत करनी ही क्यों। ना पैरों पर खड़ी होऊंगी, ना तुम लोग को छोड़ कर जाना होगा।” सेल्फी लेने के बाद संपदा दोनों हाथों से अंजना का कंधा पकड़ लिपटी हुई उसे दाएं बाएं झुलाती हुई कहती है।

“क्या बात है, लव बर्डस इतनी ठंडी में ठंडी का ही मजा ले रहे हैं।” कोयल कमरे से निकलती है और बालकनी में खड़े मनीष और विनया को देखकर कहती है।

“आइए आइए भाभी।” मनीष कहता हुआ कोयल की ओर मुड़ता है और सूर्योदय की पहली किरण विनया के चेहरे पर देख देखता रह जाता है। विनया की आँखों में खिल उठे सूर्य के किरणों ने उसके चेहरे को चमका दिया था। जैसे कि एक नये और सुंदर अध्याय की शुरुआत हो रही हो। इस माहौल में विनया का मुख स्वयं भविष्य की सुनहरी शुरुआत का प्रतीक बन रहा था, जिसे मनीष बिना पलकें झपकाए देख रहा था।

“जब मैं आई थी तब भी आप मेरी देवरानी को बिना पलकें झपकाए देख रहे थे और आज भी जब हम घर के लिए निकलने वाले हैं, तब भी आपकी पलकें झपकना नहीं चाह रही हैं।” कोयल दोनों नजदीक खड़ी कह रही थी।

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आरती झा आद्या

दिल्ली

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