यादें मिट क्यों नहीं जाती? ( भाग-2 ) : Moral stories in hindi

आपने पढ़ा कि भूतपूर्व जमींदार के पुत्र राम नरेश बाबू को जब अपनी मित्र-मंडली और चाटुकारों से पता चला कि उनके कस्बे में अनुराग नामक युवक ने बी. एस. सी. किया है, तब उन्होंने अपनी पुत्री  रश्मि को उससे ट्यूशन पढ़वाने का मन बना लिया था क्योंकि शादी की उम्र हो जाने के बाद भी वह मैट्रिक पास नहीं कर सकीं थी।

 वैसे गांवों और कस्बों में उस जमाने में किसी लड़की को मैट्रिक पास होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।… अब आगे पढ़िए….

********************************************

  राम नरेश बाबू ने अपने मन की बात को बैठक में उपस्थित मित्रों और अन्य लोगों के सामने रखी तो एक-दो ने उनकी बातों का समर्थन किया तो कुछ ने विरोध भी किया यह कहकर कि जवान लड़की को युवा लड़के द्वारा ट्यूशन पढ़ाना अच्छा नहीं है।

  राम नरेश बाबू की धर्मपत्नी सुमित्रा देवी जो पर्दे के पीछे उनलोगों का वार्तालाप सुन रही थी,  पर्दे की ओट से ही उसने कहा,

” मुन्ना बाबू!… जमाना बदल रहा है… आजकल पढ़ी-लिखी लड़की के साथ ही लोग शादी करना चाहते हैं… अच्छा घर और अच्छा वर शिक्षित लड़की को ही नसीब होता है” बैठक में उपस्थित अपने पति के खास दोस्त मुन्ना बाबू से कहा।

  अचानक सभी लोगों की निगाहें क्षण-भर के लिए उस पारभाषी(धुंधले) पर्दे की ओर मुड़ गई थी, जिसके पीछे राम नरेश बाबू की धर्मपत्नी खड़ी थी।

  इस प्रस्ताव पर रश्मि की मांँ की स्वीकृति की मुहर लगते ही सभी की जुबान बन्द हो गई थी।

  अपने कारिंदे के जरिये राम नरेश बाबू ने बुलवाया अनुराग को।

  अनुराग ने हवेली में दाखिल होते ही राम नरेश बाबू को प्रणाम किया। जवाब में उन्होंने मुस्कुराकर जीवन में प्रगति करते रहने का आशीर्वाद दिया।

  अनुराग पहली बार किसी जमींदार की हवेली में दाखिल हुआ था। उस हवेली के जर्रे-जर्रे में शान-शौकत का अक्स मौजूद था। उसके कदम-कदम पर अंग्रेजी सल्तनत की निशानियाँ जमींदारी प्रथा की दास्तान सुना रही थी।

 रंग-बिरंगी कलात्मक नक्काशी और वास्तुकला से सुसज्जित दीवारों, पायों , मेहराबों और छतों को वह देखकर भौचक्का रह गया था।

  सप्तरंगी प्रकाश बिखेरने वाली चमकती, दमकती झाड़-फानूस की मोहक झांकियां उसके कस्बे में भी देखने को मिल सकती है, उसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।

  थोड़ी सी औपचारिकता निभाने के बाद राम नरेश बाबू ने रश्मि को पढ़ाने का अनुरोध किया, साथ में उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए वह जो भी पैसे लेगा, उसको देने के लिए वह तैयार है। अनुराग ने जवाब में कहा, “चाचाजी!… मैं अधिक दिनों तक यहांँ नहीं रहूंँगा … नौकरी के लिए मैंने कई अर्जियां दे रखी है, कब कहांँ जाना पड़ेगा कहना मुश्किल है…”

  “ठीक है!… ठीक है!… जब तक यहांँ रहो, उसकी पढ़ाई में मदद कर दो… लड़की की बात है… इस गांव में कोई अच्छा पढ़ाने वाला है भी नहीं… गांव घर की बात है।

  बातचीत चल ही रही थी कि रश्मि चाय और नमकीन लेकर आ गई थी उस कमरे में।

  अनुराग ने कहा भी, ” इसकी क्या जरूरत थी… चाय तो मैंने अभी तुरंत पी है।”

  “एक कप चाय और पी लेने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा… इतना चलता है, तूने तो इस कस्बे का नाम रौशन कर दिया, और चाय पिलाने से भी मैं रहा… संकोच मत करो।”

  अनुराग उनके आग्रह को नहीं ठुकरा सका। उसने चाय की प्याली उठा ली टेबल पर से।

     उनके बगल की कुर्सी पर बैठ गई थी रश्मि अपने पिताजी के कहने पर।

 उसके पिताजी ने कहा,” देख लो यही मेरी बिटिया है… इसीको पढ़ाना है… बहुत कमजोर है गणित और साइंस में… अब तुम्हारी जिम्मेवारी है इसको मैट्रिक पास करवाना।”

  अनुराग नेअपनी नजर उठाकर देखा रश्मि को क्षण-भर के लिए उसकी निगाहें उसकी नजर से टकरा गई। रश्मि की पलकें नीचे गिर गई थी। वह लाज और संकोच से गड़ी जा रही थी।

 इस पर राम नरेश बाबू ने कहा,” अरे!… लजाने की क्या बात है… अपने ही गांव का लड़का है… अपनी ही जात-बिरादरी का भी है… जो समझ में नहीं आवेगा, पूछना… संकोच मत करना बेटी।”

  राम नरेश बाबू के आग्रह को वह ठुकरा नहीं सका था, दूसरे दिन से ही वह पढ़ाने के लिए जाने लगा हवेली में।

  रश्मि सचमुच मैथ और साइंस में बहुत कमजोर थी। उसने काफी लगन से पढ़ाना शुरू कर दिया।

  किसी लड़की को पढ़ाने का उसका पहला अवसर था।

  गणित समझा देने के बाद उसके सामने बैठी रश्मि गणित के प्रश्नों को हल करती तो वह प्रायः उसके रूप, लावण्य को टक-टकी निगाहों से देखता।

  खूबसूरत, हसीन, गुलाबी रंग की बेशकीमती चुस्त समीज और जम्फर में जापानी गुड़िया की तरह मालूम पड़ती थी वह। रेशम सदृश काली केश-राशि, सुर्ख रसीले होंठ, सुरमई हिरणी सदृश आंँखें, कंचुकी के डोरों के बंधन की परिभाषी वस्त्रों में उभरती झलक और गोरे गुलाबी गालों पर काला तिल उसके अंतर्मन में हलचल मचा देती थी।

  उसके बोलने की अदा उसे इस तरह सम्मोहित कर लेती थी कि उसके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का जवाब देना भी कभी-कभी मुश्किल हो जाता था उसे।

  इसके बावजूद भी वह अपनी भावनाओं को दबाए रखता था। वह अपने व्यवहार पर कठोर पाबंदी लगाए हुए था ताकि उस पर कोई उंगली नहीं उठा सके।

  समय बीतने के साथ-साथ संकोच की दीवारें ढहने लगी। जिस सुसज्जित कमरे में वह पढ़ाता था, वहाँ पर्दों में रहनेवाली उसकी मांँ और शादीशुदा उसकी बड़ी बहन सरिता भी आने-जाने लगी। बातचीत में हिस्सा लेने लगी।

  धीरे-धीरे अनुराग राम नरेश बाबू के परिवार में पूरी तरह से घुल-मिल गया।

  ट्युशन का समय समाप्त होने के बाद प्रायः सरिता उस कक्ष में पहुंच जाती ऊब मिटाने की नीयत से, फिर गप-शप का जो सिलसिला शुरू होता वह घंटों चलता।

  कभी-कभी बात-चीत बहस का रूप धारण कर लेती। इस बहस में रश्मि और सरिता तो खुलकर भाग लेती ही, अनुराग भी इसकी आंँच से नहीं बच पाता। अंततोगत्वा उसे भी इसमें कूदना पड़ता।

  देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, रूढ़िवादिता, गांवों की दकियानूसी परम्पराएं, तिलक-दहेज और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर ही अक्सर वाद-विवाद होते। कभी-कभी धूम मचाने वाली फिल्मों पर भी जमकर रंगीन बातें होती।

  इसमें घंटों निकल जाते, पर कुछ पता नहीं चलता।

  वीरान रहने वाली हवेली में हंँसी के ठहाके गूंजने लगे। वहाँ के वातावरण में मादकता घुलने लगी। माहौल संगीतमय ध्वनि से झंकृत होने लगा। पढ़ाई का कोई नीयत समय नहीं रहा, किसी दिन वह दो घंटे पढ़ा देता, तो किसी दिन चार घंटे। कभी-कभी तो पूरा दिन ही हवेली में गुजर जाता।

  कभी-कभार हंँसी का समवेत स्वर इतना तेज होता कि उसकी आवाजें हवेली से बाहर चली जाती।

  अनुराग जब हवेली से बाहर आता तो कस्बे के लोग उसे घूर-घूर कर देखते। उनके चेहरे पर रहस्यमय मुस्कान उभर आती। वहां से उसके जाने के बाद खुसुर-पुसुर करते आपस में लोग।

  आपसी झिझक समाप्त हो गई थी। रश्मि अनुराग के साथ खुलकर बात-चीत करने लगी सरिता की अनुपस्थिति में। वार्तालाप के क्रम में वह व्यक्तिगत प्रश्नों को पूछने से भी परहेज नहीं करती, इसके साथ ही वह अपने नजरिए से भी वाकिफ कराती उसे।

  नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर वह बल देती तो कभी अपनी बिरादरी में फैली दहेज-प्रथा का जोरदार ढंग से विरोध करती वार्ता के क्रम में वह।

  अनुराग को महसूस होने लगा कि ऐसी प्रगतिशील विचारों को मान्यता देने वाली लड़की उस इलाके में ढूंढ़ने से भी शायद ही मिले। उसने रश्मि में नवीन व्यक्तित्व का दर्शन किया।

  जैसे-जैसे वह उसके सद्गुणों से परिचित होता गया, वैसे-वैसे वह उसके निकट से निकटतर  होता गया।

  राम नरेश बाबू के परिवार से उसकी घनिष्ठता चरम विन्दु पर पहुंच गई थी।

  जब भी वह पढ़ाने के बाद वहाँ से जाने लगता तो प्रायः रश्मि और सरिता यह कहकर ठहरने के लिए आग्रह करती कि क्या कीजिएगा घर जाकर, बोर होने के सिवा। गप-शप में हमलोगों का भी मन लग जाता है।

  दोनों बहनों के आग्रह के अंदाज का जादू उसे चुम्बक की तरह बरबस खीच लेता।

  अपने घर में अनुराग यदा-कदा सोचता भी कि उसे ऊंँचे घराने के लोगों से इतना मेल-जोल नहीं रखना चाहिए। कहीं कोई अनहोनी उसे कहीं का नहीं रखे, लेकिन न जाने कौन सा आकर्षण था जो उसे जबरन उस ओर खींच लेता था।…………. ।

अगला भाग

यादें मिट क्यों नहीं जाती? ( भाग-3 ) : Moral stories in hindi

   स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित

                 मुकुन्द लाल

                  हजारीबाग(झारखंड)

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!