यादें मिट क्यों नहीं जाती? ( भाग-3 ) : Moral stories in hindi

आपने पढ़ा कि आपसी विचार-विमर्श और अनुराग की सहमति के बाद वह रश्मि को नियमित पढ़ाने लगा। इस दरम्यान वह रश्मि के सौंदर्य और प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित होकर उसकी ओर आकर्षित होने लगा, फिर भी वह अनहोनी की आशंका के वशीभूत वह अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखता था। अक्सर अनुराग, रश्मि की बड़ी बहन सरिता और रश्मि के बीच विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद भी होता था। इस तरह रश्मि और अनुराग के मध्य संकोच की दीवारें ढह गई। वह उस परिवार में घुलमिल गया, लेकिन वह सोचता भी कि उसे ऊंँचे घराने से इतनी घनिष्ठता नहीं रखनी चाहिए, फिर भी न जाने कौन सा आकर्षण था, जो बरबस उसे उस ओर खीच लेता था। अब आगे…………

********************************************

  राम नरेश बाबू विवादित जमीन-जायदाद से संबंधित केस-मुकदमों के काम से हमेशा बाहर ही रहते थे। जब कभी हवेली में रहते तो प्रायः चाटुकारों व सफेदपोश रइसों से वह घिरे रहते। शायद ही कभी मौका मिलता अपने परिवार में घुलने-मिलने का। उनकी जुबान की कड़वाहट और प्रताड़ना युक्त बर्ताव भी हवेली के लोगों को उनके निकट लाने में बाधक था।

  उस विशाल हवेली की अन्दरूनी व्यवस्था की जिम्मेवारी सुमित्रा देवी पर थी। वह उसकी देख-रेख, रख-रखाव और नौकर-चाकर के कामों की निगरानी में इतना व्यस्त रहती थी कि इधर झांकने का भी मौका नहीं मिलता था। फिर भी माह-दो माह में रश्मि की पढ़ाई के बारे में अनुराग से जरूर जानकारी हासिल करती।

  अनुराग के साथ वही हुआ जिसका डर था।

  रश्मि के सामिप्य और आकर्षण ने उसे दिग्भ्रमित कर दिया।

  वह रविवार को भी पहुंच जाता हवेली में पढ़ाने के बहाने।

  किसी दिन रश्मि से वह कहता कि दो दिनों तक पढ़ाने नहीं आएगा, आवश्यक कार्य होने के कारण। लेकिन उन दिनों में भी वह पहुंँच जाता।

  तब रश्मि हैरत और हर्ष व्यक्त करते हुए कहती,

” आपने तो नहीं कहा था आने के लिए…”

  “बात ऐसी है कि जहाँ जाना था वहाँ का प्रोग्राम स्थगित हो गया” वह झेंपते हुए जवाब देता।

  ” हांँ! हाँ!… वह तो मैं भी जानती थी कि… आपका प्रोग्राम स्थगित हो ही जाएगा” इसके साथ उसके चेहरे पर मुस्कान उभर आती।

  फिर कापी-किताब लेकर बैठ जाती उसके सामने। उस दिन पढ़ाई कम अंतरंग बातें अधिक होती।

  समय बीतने के साथ-साथ अनुराग और रश्मि के बीच आत्मीयता गहराती गई। दोनों के दिलों में प्रेम का सागर उमड़ने लगा। भला लगने लगे एक-दूजे को।

  उस दिन वह निर्धारित समय से कुछ पहले ही हवेली पहुँच गया लेकिन समय होने के बाद भी वह उस कक्ष में नहीं पहुंँची। कुछ पल तक वह बेकरारी से इंतजार करता रहा। फिर भी वहाँ के नौकर-चाकर से पूछना उसे अच्छा नहीं लगा। बेचैनी में वह कुर्सी छोड़कर कक्ष में चहलकदमी करने लगा।

  उसकी बड़ी बहन सरिता भी नहीं आई थी, जो हर दिन  वहाँ उपस्थित रहती थी।

       जब उसके सब्र का बांध  टूट गया तो विवश होकर वह किसी के द्वारा हवेली के अन्दर खबर भेजने की बात सोच ही रहा था कि अचानक उस कक्ष में दिव्य-अप्सरा की तरह प्रकट हुई रश्मि।

  कमरे में दाखिल होते ही वहाँ का माहौल खुशनुमा हो गया। स्नो-पाउडर और बेशकीमती लवेणडर की खुशबू की फुहारें वातावरण में मस्ती घोलने लगी। काले चमकदार बालों के जूड़े में लगे सफेद फूलों का गजरा घने काले बादलों में कौधने वाली बिजली सी चमक रही  थी।

  इन्द्रधनुषी परिधान से सुसज्जित व यौवन से दमकती देह, उभरे ललाट पर लटक आई बालों की लटें। कजरारी आँखों में लहराता भावनाओं का समन्दर देखकर क्षण-भर के लिए वह सम्मोहित सा देखता रह गया था।

  पर दूसरे ही पल  जब रश्मि की आवाज “माफ करेंगे!… आज देर हो गई” उसके कानों से टकराई तो वह सम्मोहन से मुक्त हुआ। उसने तुरंत अपने को संयत करते हुए कहा, ” वो तो मैं समझ रहा हूँ देर होने का कारण…”

  “दरअसल, बात ऐसी है कि… बड़ी दीदी की तबीयत खराब हो गई है, कुछ इन्हीं कारणों से… सुबह से ही रुटिन उल्टा-पुल्टा हो गया… स्नान करने में भी देर हो गई” टेबल के बगल में रखी हुई कुर्सी पर बैठते हुए रश्मि ने कहा।

 ” खैर!… छोड़ो!… जाने दो उन बातों को… निकालो कापी-किताब… परीक्षा भी निकट है”टेबल के पास रखी हुई कुर्सी पर बैठते हुए अनुराग ने कहा।

  पढ़ाई तो शुरू हो गई थी लेकिन अधिक देर तक नहीं चल सकी ।

  आधे घंटे के बाद ही गणित हल करने की प्रक्रिया को विराम देते हुए रश्मि ने कहा,” आज पढ़ने का मन नहीं करता है… “

 ” क्यों?… क्या बात है?… तबीयत तो ठीक है न!…” गंभीर स्वर में उसने कहा।

  “तबीयत तो ठीक है…”

  “फिर?” इसके साथ ही उसने सवालिया निगाह गड़ा दी थी उसके मनमोहक और गुलाबी आभा से दप-दपाये हुए चेहरे पर।

  पल-भर वह खामोश रही। उसने चोर निगाहों से अनुराग को देखा। उसके होठों पर मुस्कान तिर आई।

  कुछ मिनट तक वातावरण मौन रहा।

  ” कुछ बोलिए न!… “वक्ष पर से सरकते हुए दुपट्टे को सम्हालते हुए रश्मि ने कहा।

  ” क्या बोलूँ!”

  “कुछ भी… चुप रहना अच्छा नहीं लगता है।”

  “आप ही बोलिए… मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बोलूँ… क्या नहीं बोलूँ…”

  ” आपका एम क्या है?… आप क्या बनना चाहते हैं?” मादक मुस्कान बिखरते हुए रश्मि ने पूछा।

  क्षण-भर मौन रहने के बाद उसने जवाब दिया,” देखो!… मैं कोई बड़ा अफसर, इंजीनियर या डाक्टर बनने से तो रहा… मुझे रोजी-रोटी चलाने के लिए कोई नौकरी मिल जाएगी तो वही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है..”

 ” बस!… “

 ” मेरे दिल में बड़ा पद पाने की लालसा नहीं है… फिर भी मेरे जैसे आम आदमी चाहे भी तो कोई बड़ा पद पा सकता है?… नहीं न!… मेरे पास डिग्री के सिवाय क्या है?… न पैसा, न पैरवी… आज रिश्वत खोरी का बाजार गर्म है… और न तो मैं रिश्वत लेना चाहता हूँ… न रिश्वत देना चाहता हूँ।… मुझे ईमानदारी से दो रोटी ही नसीब हो जाती है तो वही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है” अनुराग ने बेबाकी से अपना विचार प्रकट किया।

 ” आपके ख्याल तो बहुत ऊंँचे हैं… आप तो सचमुच महान हैं “कहकर रश्मि हंँसने लगी।

 ” क्या मैं झूठ कह रहा हूँ?… आज लाखों लोग डिग्रियाँ लेकर नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं… ऐसी परिस्थितियों में ईमानदारी से रोजी-रोजगार मिल जाए तो क्या कम बड़ी उपलब्धि है यह?… “

 ” अच्छा बाबा!… सुन लिया… आप तो बेकारी और रोजगार पर अच्छा भाषण पिलाने लगे… शान्त हो जाइए महाशय। “

  रश्मि का व्यंग्य सुनकर अनुराग झेंप गया। कुछ मिनट तक चुप रहने के बाद उसने मुस्कुराते हुए पूछा,

” मैट्रिक कर लेने के बाद आप आगे पढ़ना चाहती हैं या घर-गृहस्थी में लग जाना चाहती हैं… “

 ” नहीं!… मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ… पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ…”

  “आश्चर्य है!… क्या आपका दकियानूसी परिवार सहमत होगा आपके विचार से… उच्च शिक्षा की इजाजत देगा?… गांव से बाहर शहर में रहकर पढ़ने की बात वे लोग सहन कर पाएंगे? “

  “उनको सहन करना पड़ेगा… मैं जो चाहूँगी वही होगा… मेरी माँ मेरे विचार से सहमत है… पिताजी नहीं भी राजी होंगे तो मांँ उन्हें मना लेगी।

  रश्मि के प्रगतिशील और सार्थक विचार सुनकर अनुराग अभिभूत हो गया।

  सौंदर्य और सद्गुणों का संगम नर-नारी के आकर्षण को मजबूती और स्थायीत्व प्रदान करता है।

  कुछ इसी तरह की बातें अनुराग के साथ भी हुई। उसे रश्मि के बिना एक पल भी चैन नहीं मिलता। उसकी भूख, प्यास और नींद उससे दूर चली गई थी।

  रात्रि में वह उठ बैठता बिस्तर पर। जब बेचैनी चरम विन्दु पर पहुंच जाती तो वह चहलकदमी करने लगता अपने घर के बरामदे में। उसे ऐसा लगता कि उसी वक्त निस्तब्ध रात्रि में रश्मि के पास चला जाए, लेकिन उसका विवेक ऐसा कदम उठाने से रोक देता उसे। वह विवश होकर पुनः बिस्तर पर लेट जाता। घंटों आंँखें फाड़े पड़ा रहता, सोचता रहता कैसे जल्दी सुबह हो जाए कि वह उसकी एक झलक पा ले… यही सोचते-सोचते उसकी आंँखें कब लग जाती पता नहीं चलता।

  समय के साथ-साथ बेचैनी का पौधा विशाल वृक्ष में परिवर्तित हो गया। कुछ देर की मुलाकात से उसे तसल्ली नहीं होती बल्कि उसकी प्यास और बढ़ जाती।

  वह चाहता था कि रश्मि से घंटों बातें करे, रमणीक स्थानों की सैर करे, खुशबू बिखेरने वाले बागों में जाए, फूलों से लदी झाड़ियों के बीच बैठकर घंटों प्यार भरी बातें करे एकांत में।

  एक दिन उसने रश्मि के सामने प्रेम में मगन होकर एकांत में खुलकर बात-चीत करने और अपने दिल में धधकती आग को उसके साहचर्य से बुझाने का प्रस्ताव रखा था तो रश्मि ने हंसते हुए कहा, ” आप पागल तो नहीं हो गए हैं… इस कस्बे में कहांँ घूमेंगे इकट्ठे हमलोग… लोग-बाग देखेंगे तो सिवा हम दोनों पर उंगली उठाने के और क्या करेंगे… झूठ-मूठ बदनाम करेंगे… और कहीं बाहर जाने की इजाजत दूसरे के साथ पिताजी देंगे?”

  “ठीक है छोड़ो!… मैं तो पागल हो ही गया हूँ “रुआंँसे स्वर में उसने कहा।

 ” बुरा मान गए आप!… “

 ” नहीं तो!… “

 ” गंभीरता से सोचिए!… क्या आपका प्रप्रोजल व्यावहारिक है इस कस्बे के माहौल में। “

  मिलना-जुलना तो जारी था पढ़ाने के बहाने लेकिन उस अल्प मिलन से अनुराग अतृप्त रह जाता था। अंतस् में धधक रही प्रेमाग्नि की उष्मा से वह व्याकुल हो उठा। उसे ऐसा महसूस होता मानों वह पागल हो जाएगा।

  रश्मि के यहाँ रहने की भी एक सीमा थी। दो घंटे या अधिक से अधिक तीन घंटे किन्तु वह हवेली से जाने के बाद भी कोई न कोई बहाना बनाकर उसके इर्द-गिर्द मड़राता ही रहता इस प्रत्याशा में कि एक झलक पा लें उसकी।

  उस दिन रश्मि के साथ सरिता भी बैठी थी उस कक्ष में जहांँ पढ़ाई चल रही थी।

  अनुराग कुढ़ रहा था सरिता के वहांँ मुस्तैद होने के कारण। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि  आखिर उसकी बड़ी बहन क्यों यहाँ आकर जम जाती है, उसे तो घर के काम में हाथ बंटाना चाहिए।

  रश्मि वैसे तो गणित हल कर रही थी या अपने अन्दर के जज्बातों को सख्ती से नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रही थी, कहना मुश्किल था।

  सरिता अखबार पढ़ने के बहाने वहाँ बैठी हुई थी। हटने का नाम नहीं ले रही थी वहाँ से।

  अचानक सुमित्रा देवी(मालकिन) ने कोई काम निपटाने के लिए दाई के मार्फत सरिता को बुला भेजा लेकिन उसने टाल दिया। वह नहीं जाना चाहती थी वहांँ से।

  तब रश्मि ने तल्ख आवाज में कहा, ” जाओ न दीदी!… कोई जरूरी काम है तभी न मांँ बुला रही है।”

  विवश होकर सरिता को वहाँ से जाना पड़ा।

  रश्मि और अनुराग के चेहरे खुशी से खिल उठे, मानों उन्हें कोई बहुत कीमती तोहफा मिल गया हो।……….

अगला भाग

यादें मिट क्यों नहीं जाती? ( भाग-4 ) : Moral stories in hindi

        ©® मुकुन्द लाल

                    हजारीबाग(झारखंड)

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!