सहारा…. – विनोद सिन्हा “सुदामा”

चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा….

बचपन में मैं जब भी यह गाना सुनता था तो मुझे यह गाना चंद्रमा और मामा का तुल्नात्मक चित्रण या फिर मामा भांजे का प्रेम मात्र लगता था,लेकिन जैसे जैसे समय बीता इस गाने का मर्म ,चंद्रमा का प्रेम और मामा का महत्व समझ पाया,तब और जब एकमात्र मामा मेरे पालक को खो दिया अपने..

मेरे जीवन में शुरू से मेरे पिता एवं मामा का लगभग सामान्य महत्व रहा या यूं कहें कि मामा जी का कुछ ज्यादा हीं क्योंकि बचपन से मेरा लालन-पालन मेरे मामा जी ने हीं किया – पर नियति कि आज दोनो हीं हमारे साथ नही हैं..

मेरे पिताजी का देहांत सन् 1982 को हो गया था.मैं सात आठ साल का रहा हूंगा.बचपन से पिता के प्यार का कोना खाली ही रहा.जब पिता जिंदा थे तो मरने से पहले एक दो साल तक वे काफी बीमार रहें.हमलोग सभी नानी घर ही रहतें थे.मेरे पिताजी के देहांत के बाद मैं और मेरे सभी भाई बहनों का लालन पोषण हमारे मामा जी ने ही किया.इसलिए मामाजी का प्यार और स्नेह हमारे जीवन में पिता के सामान ही था.शायद पिता से भी बढकर..चंदा मामा से भी बढकर..क्योंकि उनकी शीतल छाया कभी चंद्रमा के शीतलता से कम नहीं रही.

वैसे भी हमारे जीवन में चन्द्रमा का बड़ा महत्व है,देखा जाए तो मानव का जीवन चक्र मुख्य रूप से चंद्र द्वारा ही संचालित होता है, चंद्र के रेखांशों के आधार पर ही जातक का जन्म नक्षत्र और उसके जीवन में दशा मुक्ति की अवधियों और क्रम को तय किया जाता है। इन्हीं दशा मुक्तियों के आधार पर ही जातक के जीवन में घटने वाली अच्छी−बुरी घटनाओं और उनकी समयावधियों को आसानी से जाना जा सकता है। 




हमारे यहाँ एक परम्परा यह भी रही है कि चंद्रमा जिस राशि में जन्म के समय रहता है, उसी राशि के लिए नियत अक्षरों से ही जातक का नाम रखा जाता है,चंद्रमा बच्चों के जीवन अवधि का नियंत्रक होता है। विवाह तथा महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत, त्योहार एवं पर्व तथा लंबी यात्राएं व धार्मिक अनुष्ठानों आदि का निर्धारण चंद्र के शुभ नक्षत्रों में रहने की अवधि के आधार पर ही किया जाता है।

 चंद्र सभी के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि माता अपने बच्चे से,चंद्रमा को मानव मन और मातृत्व भावना से ओतप्रोत कहा जाता है। चंद्रमा किसी के प्रति भी शत्रुता का भाव नहीं रखता,इसलिए ही चंद्रमा को मामा कहा जाता है, जिनकी जन्मकुंडलियों में चंद्र शुभ तथा दुष्प्रभावों से मुक्त होकर बैठता है, वह दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेना पसंद करता है। ऐसे लोग सरल तथा विनम्र स्वभाव के होते हैं और अपनी अंतरात्मा की आवाज ज्यादा सुनते हैं,

चंद्र भावनाओं और इच्छाओं का नियंत्रक व संचालक भी होता है, मेरे मामा जी भी बिल्कुल उसी चंद्रमा के समानांतर थें ..शांत शीतल एवं मृदुल..हमेंशा हर किसी के सहयोग हेतु तत्पुरुष..क्या अपना क्या पराया सबकी मुस्कुराहटों को ही अपना थाती समझा..आज मामा जी इस दुनिया में तो नहीं हैं,उनको गए भी आठ साल हो गएं पर मन को विश्वास भी नहीं होता है कि वो नहीं हैं.शायद इसलिए कि जब भी उनकी याद आती है चंद्रमा को देख मामा जी का प्रेम स्नेह और उनकी शितलता महशूस कर लेता हूँ…

आज मामा व पिता दोनों ही नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियाँ प्रकाशपुंज के समान सदा मेरे साथ रहती हैं.और आज भी जीवन के हर मोड़ पर उन्हें व उनकी स्मृतियों को सहारा मान जीवन की जिम्मेदारियों को वहन करता हूँ…चाहे जितना अंधेरा हो…उन्हें याद कर मन एक अलौकिक प्रकाश से भर उठता है….फिर जिम्मेदारियां बोझ नहीं बल्कि… फर्ज लगने लगती हैं..

#मन के कोने से…

विनोद सिन्हा “सुदामा”

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