दामाद भी श्रवण कुमार – संध्या त्रिपाठी  : Moral Stories in Hindi

 हे भगवान…..! मुझे भी दोनों दामाद ध्वनि को जैसे मिले हैं वैसे ही मिल जाए तो मेरी भी जिंदगी सफल हो जाए …….मिसेज शर्मा ने अपने मन की बात शर्मा जी से कहा….मिसेज शर्मा की बात सुनते ही शर्मा जी ने पूछा….. अरे , ऐसी क्या बात है उनके दामादों में ….जो और सभी के दमादों से अलग है….??

          ध्वनि और उसके पति संपूर्ण साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे ….I उनकी दो बेटियां ही थी उन्होंने बेटियों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी …..बेटों के सभी शौक उन्होंने बेटियों में पूरा किया ….!! पढ़ लिख कर दोनों बेटियां डॉक्टर बन गईं…I समय और परिस्थिति अनुसार दोनों बेटियों का विवाह भी अच्छे परिवार में हुआ….I पेशे से दोनों दामाद डॉक्टर ही मिले…..I

     ध्वनि और संपूर्ण को इस बात की कभी कमी महसूस नहीं हुई कि उनका कोई बेटा- बहू नहीं है….. या बेटियों की शादी के बाद वह कभी खुद को अकेला महसूस कर सकें …..। समय-समय पर और बारी बारी से बेटी दामाद एक ना एक हर तीज-त्यौहार पर आना-जाना करते रहते थे… कभी अपने ही घर ध्वनि और संपूर्ण को ले जाकर भी माहौल को खुशनुमा बनाने की कोशिश करते थे…..!!!

        समय बीतता गया , इसी बीच अचानक ध्वनि की तबीयत खराब हो गई उसे हार्ट में प्रॉब्लम हुआ…! डॉक्टर ने तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी …..I संपूर्ण तो मानो जैसे अंदर से टूट ही गया अब क्या होगा…..???? इसी सोच विचार और ध्वनि की सेवा में लगा संपूर्ण चिंतित रहता था….!!

       तभी अचानक एक दिन फोन की घंटी बजी ….संपूर्ण ने जैसे ही हॅलो कहा….उधर से आवाज आई …..पापा आप गुड़गांव मेदांता जाने की तैयारी करो , हम आते हैं …..बड़ी बेटी और दामाद का फोन था जिसके आते ही संपूर्ण के सिर से हजारों किलो भार जैसे कम हो गया…. और वह बस इतना ही बोल पाया हाँ बेटा और फोन रखा ही था…… तब तक दूसरी बेटी और दामाद का भी फोन आ ही गया जिसमें छोटी बेटी कह रही थी …….दीदी और जीजा जी से बात हो गई है… हम निकल रहे हैं बस आप लोग तैयार रहना …..!!!

       ये क्या..  पल भर में ध्वनि और संपूर्ण की सारी चिंताएं कम हो गई…. दोनों बेटी और दोनों दामाद ध्वनि और संपूर्ण को लेकर गुड़गांव मेदांता अस्पताल आए और ध्वनि को अस्पताल में भर्ती करा…. पास में ही एक घर किराए पर लेकर खुद रहकर अस्पताल में उनका सफल ऑपरेशन कराया……I

      इतनी सेवा की दामादों ने… कि आसपास के मरीज देखकर बोलते ……आपका बेटा इस यूग का श्रवण कुमार है …..इस पर हँसकर ध्वनि का जवाब होता ……बेटा नहीं दामाद श्रवण कुमार है……!!! लोगों से दामादों की तारीफ सुनकर ध्वनि और संपूर्ण फूले नहीं समाते थे……।

     सच भी तो है दोस्तों..  बेटी जब ससुराल जाकर पूरे घर को अपना बनाकर अपनत्व की भावना से अपनी उपस्थिति तो दर्ज कराती ही है वो अपना पूरा योगदान और सहयोग भी देती है तो फिर दामाद ससुराल में अपना क्यों नहीं बन सकता….. आवश्यकता पड़ने पर दामाद को भी बेटे के भूमिका में आकर अपना दायित्व बखूबी निभाना चाहिए….!

        आज के जमाने में जब बेटा और बेटी में अंतर नहीं तो फिर दामाद और बेटा में कैसा अंतर ……..!!!

( स्वरचित मौलिक एवं सर्वाधिकार  सुरक्षित रचना )

  श्रीमती संध्या त्रिपाठी

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