शुभचिंतक -शिव कुमारी शुक्ला Moral Stories in Hindi

लता जी ने काइनेटिक निकाल कर बाहर खड़ा किया जैसे ही वे गेट बन्द करने के लिए मुड़ीं  उन्हें हल्का सा सामूहिक हास्य सुनाई दिया। उनके पलटते ही चुप हो गईं। आस-पड़ोस की तीन चार महिलाएं किसी एक के गेट पर  खड़ी हो कर बतिया रहीं थी। अभी वह स्कूटर स्टार्ट कर ही रही थी 

 कि उसे सुनाने को जोर से बोला गया। देखो कैसे नई साडी पहनकर चल दी घूमने,ठाट हैं  बैटी की कमाई जो खा रहे हैं।

सुनते ही लता जी को ऐसा लगा कि किसी ने पिघला हुआ सीसा  कान में उडेंल दिया हो। इन्हें क्या पता कि  बेटी  के माँ बाप को कितनी  चिंता होती है, पर उनसे ज्यादा चिन्ता तो  दूसरों  को होती है।

अरे बेटी की कमाई क्यों खायेंगे। लता जी एवं वरूण जी दोनों ही वर्किंग है। बैंक में अच्छी  पोस्ट पर हैं। बेटी को अच्छी शिक्षा दिलवाई । बेटी इंन्जीयर है इंफोसिस जैसी  कम्पनी में।उसके लायक सुयोग्य वर मिलने पर ही तो करेंगे शादी या किसी को भी हाथ पकड़ा देंगे । मां-पापा के लिए बोझ नहीं होती बेटी किन्तुअडोसी-पडोसी, रिश्तेदार ऐसे शो करते तो मानो उनके कंधो पर ही बेटी का बोझ हो । आये दिन  उसे ऐसी समस्याओं से रूबरू होना पड़ता| कभी कलीग पूछते मिसेज मिश्रा कब  खुशखबरी सुना रही हैं बेटी की शादी की। कोई कहता मिला  गया क्या कोई रिश्ता। समय पर  शादी नहीं हुई तो अच्छा वर मुश्किल मिलता है। कोई राय देता कुछ कम्प्रोमाइज कर लो कम पढा लिखा भी देख लो जरुरी नहीं  बराबर ही पढ़ा लिखा हो।सब एडजस्ट करना पड़ता है जीवन में।

कोई राय देता दहेज की रकम बढ़ा दो। अब तो तीन साल हो गये बेटी ने भी अच्छी खासी सेविंग कर ली  होगी। मतलब ये जितने मुँह उतनी बातें ।

और पुरुष भी पूछने में पीछे  नहीं रहते। मिश्रा जी क्या आँखें बंद कर बैठे हो। घर में जवान लड़की को कब तक बिठा कर रखोगे जैसे उन्हीं के घर मे   बैठी  हो।कोई कहता मिश्रा जी कान में तेल डाल के बैठे हो क्या लोग कैसी-कैसी बातें बना रहे हैं आपकी बेटी के बारे में क्या आप को  सुनाई नहीं  देती।

 माता-पिता वैसे ही भाग भाग कर परेशाम आज कहीं लडके वालों  से मिलने जा रहे हैं तो दो दिन बाद दूसरी जगह पर ,बात नहीं बन रही करे तो क्या ।किन्तु वे दोंनो समझदार थे सो उन्होंने आपस मैं फैसला लिया कि सुनना सबकी करना मन की किसी की बातों से, तानों से विचलीत न हो कर संयम बनाये रखेगें। शादी तभी करेंगे जब उपयुक्त घर वर मिलेगा। बेटी के पूरे जीवन का सवाल है। लोगों का क्या है उनका काम तो है कुछ कहना । फिर  संकट में ये सहायता करने नहीं आयेगें। यदि कम पढे लिखे से कर दी तो कहेंगे कैसी पढी  लिखी  लड़की को कम पढे लिखे के पल्ले  बांध दिया। अरे पैसे बचा लिए होंगे दहेज के । यदि शक्ल सूरत में  कमतर होगा तो कहेगे कैसी  बैमेल जोडी है। माता पिता ने जरा भी नहीं ही सोचा।

हद तो तब हो गई जब उनकी बेटी क्षमा से छोटी वरुण जी के भतीजे की बेटी की शादी तय हो गई। शादी में पूरा परिवार, रिश्तेदार आये उन लोगों ने पूछ-पूछ कर बरुणजी एवं  लता जी का वहाँ रहना मुश्किल कर दिया। आपकी बेटी तो बड़ी है आप क्यों नही कर रहे शादी कहीं लडका – बडका देखना शुरु किया कि नहीं या ऐसे ही बेटी को घर बैठाने का इरादा है। वहीं दूसरे जरा मुस्कराते बोले अच्छे पैकेज पर लगी है कहीं शादी करने का इरादा तो नहीं  बदल लिया।

बरुण जी और लता जी को भतीजे की बेटी  की शादी होने का जरा भी बुरा नहीं लग रहा था। वे दोनों खुश थे कि चलो परिवार की एक बेटी का  तो रिश्ता हुआ। किन्तु लोग उन्हें  कह  कह कर उकसा रहे थे कि वे  शायद कुछ  उल्टा सीधा बोलें तो दूसरे पक्ष को नमक-मिर्च  

लागा कर बतायें। ये सगे सम्वन्धी और रिश्तेदार थे। चार माह बाद ही उन्हें अच्छा रिश्ता जहाँ बात तो साल भर से चल रही थी किन्तु पक्की नहीं हो पा रही थी कारण लडका विदेश में  सर्विस करता था और बरूण जी की बेटी स्थायी तौर पर विदेश में रहने को तैयार नहीं थी। वैसे बह कम्पनी की ओर से खुद कई जगह विदेश होआई थी किन्तु वह स्थायी तौर पर नहीं रहना चाहती थी। पर भाग्य का लिखा कौन मिटा सकता है।

वरुण जी और लता जी ने धूमधाम से शादी कर दी। उन्होंने धैर्य बनाये रखा। सब के ताने ,उल्हाने सुने, व्यंग्य बाण भी  झेले किन्तु आपा नहीं खोया और न घबरा कर कोई गलत कदम उठाया कि कहीं भी रिश्ता कर दें। 

बेटी सुखी वैवाहिक जीवना बिता रही है किन्तु यू. एस. में । 

लोगों का काम ही होता है बातें बनाना उन   

पर ध्यान न देकर अपने जीवन एवं परिवार के साथ खिलवाड न करें ।अच्छा बुरा भुगतना हमें ही पडता  है कोई साथ नहीं देता। जबतक सफलता नहीं मिलती तब तक बातें सुनायेंगे और सफलता मिलते ही ये ही  लोग सबसे पहले दौड़े आयेंगे तारीफों के पुल बाँधने, बधाई देने ।

वरूण जी और लता जी की सोच ने सबके मुँह पर ताला लगा दिया ।

कुछ तो लोग कहेंगे,

         लोगों का  काम है कहना 

 छोडो बेकार की  बातों में   

          कहीं दूभर न हो जाए जीना

शिव कुमारी शुक्ला

5-5-24 

स्व रचित मौलिक एवं अप्रकाशित 

वाक्य **लोगों काम है बातें बनाना

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