प्रकृति के संकेत – मनवीन कौर

अनघा का फ़ोन था ,”क्या  दिया सासु माँ ने सरगी के लिए ?”उसने उत्सुकता से  पूछा ।

“कुछ नहीं । वह कहती हैं हम नहीं मानते व्रत – श्रत ।”मिनी ने कहा ।

“फिर पति देव लाए होंगे ?”

“अरे नहीं ,यह भी कहाँ मानते। मैंने सरगी में आलू गोभी की सजी और दो पराठे बना कर क्या लिए ।”मिनी बोली ।

“सरगी तो शगुन होता है ।”अनघा ने धीमे स्वर में कहा ।”

“मैं नहीं मानती शगुन -अपशगुन ।”

फ़ोन रख कर मिनी पूजा के लिए चली गयी ।इष्ट देव के आगे घी का दीपक जलाया और  पाठ गुनगुनाने लगी ।मिष्ठी के उठने की आवाज़ सुन कर दूध बनाने के लिए उठी । दूध का डिब्बा ऊपर अलमारी में था । उसने डिब्बा निकलने के लिए हाथ उठाया तो दीये की लो से सुर्ख़ लाल  साड़ी का पल्लू जलने  लगा । वह तो अच्छा हुआ कि मिनी ने देख लिया और तुरंत हाथ से रगड़ कर बुझा दिया ।

नन्ही को दूध दे कर वह साड़ी बदलने चली गयी ।सोचने लगी ,” ऋषि को ऑफ़िस के काम से बड़ौदा गए दो दिन  हो गए हैं । आज तो आ जाना चाहिए ।उनको फ़ोन लगाती हूँ ।”रिशि आप आज आ रहे हैं ना ।”उसने पूछा ।

“ हाँ -हाँ मैं यहाँ से निकल चुका हूँ ।शाम तक पहुँच जाऊँगा ।” रिशि ने उत्तर दिया ।

मिनी निश्चिंत हो कर काम में व्यस्त हो गयी ।

बड़े जतन से संध्या को उसने पूजा की थाली सजाई ।पड़ौसी के घर जा कर पूजा के लिए बैठी ही थी कि अनघा बोल पड़ी ,” क्या ग़ज़ब ढा रही हो । इतनी ख़ूबसूरत बीबी को देख कर तो  भाई साहेब  तुम पर लट्टू रहते होंगे ।”सब ठहाका लगा कर हंस पड़ीं और उसका  मुँह शर्म से और भी लाल हो गया ।



पूजा समाप्त कर जब वापस लौटी तो देखा ,एक कुतिया दरवाजे के आगे रास्ता रोक कर बैठी हुई थी ।उसने ,उसे उठाने की  बहुत कोशिश की पर वह टस से मस तक नहीं हुई । एक हाथ में पूजा की थाली और दूसरे में पानी का पात्र , उसके ऊपर  जलता हुआ दीपक  । तब उसने दूर से ही दरवाज़े  को खोलने का प्रयत्न किया । किंतु संतुलन बिगड़ गया ।पूजा की थाली हाथ से गिर गई और वह खुद सम्भालते -सम्भालते कुतिया के पैरों में जा गिरी । दीपक बुझ गया । यह सब देख कुतिया भाग खड़ी हुई ।बड़ी मुश्किल से उसने सब समेटा और अंदर चली गयी ।

अब उसका मन भी आशंकित होने लगा । आठ बजे चाँद निकल आया । मिनी ने  लपक कर फ़ोन उठाया , “रिशि कहाँ तक पहुँचे ।”उसने पूछा ।

दूसरी तरफ़ से भारी भरकम आवाज़ आयी ,”आप जिस को फ़ोन कर रही हैं उनकी गाड़ी का ऐक्सिडेंट  हो गया है । आप तुरंत पारेक हॉस्पिटल पहुँच जाइए ।”

उसकी आँखें पथरा गयीं ,पैर ज़मीन के साथ चिपक गए ,फ़ोन हाथ से छूट गया ।होश आने पर उसने मिष्ठी को उठाया और बदहवासी हॉस्पिटल की तरफ़ दौड़ पड़ी ।सामने खून से लथपथ रिशि के पार्थिव शरीर को देख उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि वह जीवित नहीं है । वह उसे उठाने का प्रयत्न करने लगी । घरवालों ने बहुत समझाया पर वह तो पत्थर का बुत बन गयी थी ।दीदी ने मिष्ठी को उसकी  गोद में बिठा दिया ।नन्हे  हाथों के स्पर्श से वह सिहर उठी और बिलख बिलख कर चीत्कार करने लगी ।

“अभी इन्हें पोस्टमार्टम के लिए रखेंगे ।आप कल लेकर जाइए ।”नर्स ने बताया ।

कब सब ने मिल कर उसे कार में बैठा दिया उसे होश नहीं ।उसे याद आने लगा ,”प्रकृति तो उसे सुबह से ही संकेत दे रही थी । सतर्क रहने के लिए , सशक्त बनने  के लिए ,पहले से तैयार रहने के लिए ।परंतु क्या कोई स्त्री अपने पति के अशुभ की कल्पना भी कर सकती है ? उसने भरी आँखों से हैरान ,परेशान नन्ही मिष्ठी की तरफ़ देखा ।  आँखों से अश्रु बह चले ।अब इस नन्ही जान का भविष्य मुझे ही संवारना है ।  मुझे तैयार होना पड़ेगा ।मुझे सशक्त बनना होगा । आँखों   में अश्रु की धार  खुद बख़ुद सूखने लगी ।

मनवीन कौर पाहवा

18/7/22

औरंगाबाद

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