तेरा  मेरा रिश्ता – सुषमा यादव

,,,, तुम मेरी जिंदगी में आये,एक बहार बन कर,,,,

,, मेरी जिंदगी में ठंडी हवा के झोंके जैसा तुम्हारा आना,, वो भी उस वक्त जब मैं तन्हां थी,, परेशानियों और जिम्मेदारियों के झंझावातों से चारों तरफ से घिरी हुई थी,,,,,,,, पहली बार तुम्हारी आंखों में मैंने अपने लिए अपार वेदना और आंखों में आसूं देखा,,मेरा दर्द तुम स्वयं महसूस कर रहे थे,, तुमने मुझसे वादा किया कि,,,आप सबकी जिम्मेदारी और परेशानी अब मेरी है,,कभी भी आपकी आंखों में आसूं नहीं आने दूंगा,,, अपने आंसू पोंछ लो,, एक नई सुबह आपका इंतजार कर रही है,,,

मैं रोने लगी थी,,,, मैंने ताजिंदगी कभी सुख नहीं देखा, सबने मुझे अपमानित और जलील ही किया,,, हमेशा मैंने सबके लिए किया, सबके लिए सोचा,,पर मेरे लिए किसी ने नहीं सोचा, मेरे लिए कोई कुछ नहीं करता,,,ना बीमारी में,ना थकान में, और ना ही परेशानियों में,,, किसी के द्वारा मुझे राहत नहीं मिलता है,,

ये सुनकर तुमने कहा,,, कोई चिंता नहीं करना, मैं आपके साथ हूं,,,सब ठीक हो जाएगा,,,, मैं हूं ना,,,,

तुमने कहा,,साहब ने अंतिम समय अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर वादा लिया था कि मेरे जाने के बाद मेरे परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभालोगे, अब मुझे अपना फ़र्ज़ निभाना है,

तुमने दूसरे दिन से ही आकर जैसे अपनी ड्यूटी संभाल ली थी,,

प्रति दिन सुबह आकर  सबके लिए चाय बनाना, नाश्ता, खाना बनाने में मेरी मदद करना, मुझे स्कूल ले जाना और फिर छुट्टी हो जाने पर वापस लाना,,, सामान लाना, सबको बाहर घुमाना,, बाजार ले जाना,, मंदिर ले जाना,सब जैसे तुम्हारी अनिवार्य सेवा में शामिल हो गए थे,,,,,

मेरे साथ मेरे बुजुर्ग श्वसुर और पिता जी भी रहते थे,,,हम तीनों की देखभाल तुम बहुत ही अच्छी तरह से करते थे,,,,

मेरी बेटियों को रेल्वे स्टेशन से, एयरपोर्ट से लाना,ले जाना,सब तुम्हारे ऊपर,,,उनको बाहर ले जाने का काम तुम्हारा,,, मैं कभी बेटियों के पास रहने जाऊं तो दोनों बुजुर्गों की देखभाल करना,



उनके खाने पीने का प्रबंध करना

तुम्हारा काम,,, मेरी सारी परेशानियां दूर कर दिया तुमने,,,दो बार मेरे श्वसुर बीमार हुए, दोनों बार तुमने अस्पताल में भर्ती कराया,, इलाज करवाया , बहुत भागदौड़ किया, दिन रात लगे रहे,,रात भर वहीं सोते रहे,, तुम्हारा परिवार भी लगा रहा,,, मेरी नौकरी में भी कोई आंच नहीं आने दिया,,, मैं बराबर अपनी नौकरी पर जाती रही,,, दोनों ही बार तुमने बहुत मदद किया,,

घर में कोई उत्सव हो, कोई त्यौहार हो, कोई भी धार्मिक कार्यक्रम हो, सबका तुम इंतज़ाम करते,, बेटी की शादी में भागदौड़ करके सबकी आवाभगत करना,पूरा प्रबंध करना,,सबका निर्वहन तुमने बहुत अच्छी तरह से किया,,

तुम्हारे साथ तुम्हारी पत्नी और दोनों बेटे तुमसे भी ज्यादा मेरा ख्याल रखते हैं,, बेटे ने अपने तिलक में मुझे अपने साथ बिठाया, और सब नेगचार मेरे हाथों से करवाया,

अपने साथ बारात में ले गया, सबने वहां भी मेरा विशेष अतिथि जैसा मान सम्मान किया,, मैं तो अभिभूत हो गई थी,, इतना आदर, मान, तो कभी अपने सगे रिश्तेदारों से नहीं मिला,,

मैं किसी बात पर नाराज़ हो जाती तो तुम बहुत अपनेपन से मुझे मनाते, समझाते,,।   तुम्हारे परिवार में भी मुझे बहुत मान सम्मान मिला,, परिवार के एक सम्मानित सदस्य की भांति मुझसे व्यवहार होता है,, हर काम में मुझे ही आगे किया जाता है,,, कहीं भी जाते,हम सब साथ साथ जाते हैं,,चाहे पिकनिक हो, मंदिर हो,बाहर कहीं भी जाना हो, मैं हमेशा तुम सबके साथ मौजूद रहती, और तुम बराबर मेरी देखभाल करते,,एक नज़र हमेशा मेरे ऊपर ही रहती,जरा सी धूप हो, बरसात हो,, मेरे चेहरे पर शिकन देख कर तुम्हारा चेहरा उतर जाता,,

चाहे, बगीचे का काम हो, घर में कोई गड़बड़ी हो गई हो,सब तुरंत

व्यवस्थित हो जाता,,

अगर कोई मुझे कुछ कहता तो तुम मरने, मारने पर उतारू हो जाते हो, यहां तक कि तुम्हारे बेटे भी,,,,

एक बार मेरे पैर में बहुत जलन और भयंकर दर्द शुरू हो गया था, तुम घर की पूरी जिम्मेदारी संभालने के साथ ही मुझे कई शहरों में इलाज के लिए ले गए,



जब नहीं ठीक हुई तो लखनऊ भी ले गए,, मेरी समझ में नहीं आता कि इतना सब कुछ तुम कैसे कर लेते हो,,

मेरे श्वसुर का अचानक देहांत हो गया था,,मेरा सारा परिवार गांव में था,, मेरे साथ तुम्हारे परिवार के लोग प्रयागराज संगम में श्वसुर जी का दाह संस्कार करने गए थे,,रात बारह बजे से सुबह नौ बजे तक हम सब गांव वालों का इंतजार करते रहे,पर वो नहीं आते, मैंने रोते हुए कहा कि,,, मैं इनका अंतिम संस्कार करूंगी,,, कैसे करते हैं, मुझे बताओ,,,, तुमने मुझे आश्चर्य चकित हो कर देखा,

और कहा कि,, मैंने इन्हें हमेशा अपने पिता की नजरों से देखा है,, मैं करूंगा,, मैंने भी कहा कि , हां, तुमने इनकी बहुत सेवा की है,, शायद ये तुम्हारे ही हाथों से अपना दाह संस्कार करवाना चाहते हों,,, तुमने पूरे विधि विधान से उनकी चिता सजाई , और मुखाग्नि दी,, जैसे ही चिता धू धू करके जलने लगी, वैसे ही उनके भतीजे प्रगट हो गये,, मेरे पति अकेले ही थे, उनके कोई और संतान नहीं थी,,,पूरे तेरह दिन तक तुमने सब रीति रिवाजों का पालन किया,,,उनकी तेरहवीं भी बहुत ही बेहतरीन तरीके से संपन्न हुई थी,,

अभी भी पूरी निष्ठा से,, पूरी शिद्दत से, तुम हम सबकी देखभाल करते हो,, बिना किसी स्वार्थ के,,,इस ज़माने में कोई किसी के लिए इतना सब कुछ कैसे कर सकता है,,,

सचमुच तुम बेमिसाल हो, तुमने अपना किया वादा आज़

चौदह साल बीतने पर भी बखूबी बिना किसी स्वार्थ के

निभा रहे हो,,

, तुमने तो मानवता की एक मिसाल कायम कर दी है,,,

मैं हमेशा के लिए तुम्हारी ऋणी हो गई हूं,, तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का एहसान कभी नहीं भूल सकतीं हूं,

,,,*** कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें नाम नहीं दिया जाता,,

जाने क्या है , तेरा मेरा रिश्ता,,

शायद पिछले जन्म का कोई नाता है,,, कभी ना टूटने वाला अचूक रिश्ता है,****

***** बहुत ही प्यारा है,ये दिल का रिश्ता***

सुषमा यादव,, प्रतापगढ़,,

स्वरचित, मौलिक,

 

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