उपकारों का बोझ – उषा सोमानी  : Moral stories in hindi

दोपहर का समय था। धीरेन ऑफिस के कार्यों में व्यस्त था, तभी उसे छाती में बहुत तेज दर्द हुआ। ऑफिस सहकर्मी उसे अस्पताल लेकर आए। डॉक्टर ने चेकअप के बाद बताया कि उसे दिल का दौरा पड़ा। दिल के दौरे के नाम से ही साथ आए सहकर्मी को पसीने छूट गए। ऑफिस सहकर्मी ने धीरेन की पत्नी को फोन किया। वह पगलाई सी कुछ ही देर में धीरेन के दोस्त के साथ अस्पताल पहुँच गई। जब उसने आई. सी. यू. में धीरेन को देखा तो उसकी आंखें भर आयी। धीरेन अवचेतन अवस्था में पलंग पर लेटा हुआ था।

उसके हाथ, पैर और छाती पर लगी हुई नलियाँ मोनिटर से जुड़ी हुई थीं। धीरेन के दिल की धड़कन, वह मॉनिटर पर चल रही तरंगों में देखने लगी। फिर उसने स्टैंड पर टकी ग्लूकोस की बॉटल से टपकती बूँदों को देखा। वह धीरेन की पीड़ा के अहसास से सिहर गई। अनायास ही उसके हाथ धीरेन के बालों में पहुँच गये और वह उन्हें सहलाने लगी और बोली, “ये क्या हो गया?”

डॉक्टर के बताए अनुसार टेस्ट हुए। रिपोर्ट भी आ गई। डॉक्टर का कहना था कि ओपन हार्ट सर्जरी कर बायपास करना पड़ेगा। सर्जरी के नाम से ही धरा का चेहरा सफेद पड़ गया। 

नर्स ऑपरेशन करने की अनुमति और घोषणा प्रपत्र लेकर आयी और बोली, “पेशेंट के साथ उनका बेटा, बेटी पत्नी या नजदीकी रिश्तेदार हैं।”

बुझे हुए स्वर से धरा बोली, “सिस्टर, बच्चे विदेश में रहते हैं। मैं धीरेन की पत्नी हूँ।”

 धीरेन के दोस्त ने हाथ आगे बढ़ाकर सिस्टर से फॉर्म लिया। उसने फॉर्म को भरा और धरा को हस्ताक्षर करने के लिए दिया। उन कागजो पर हस्ताक्षर करते हुए धरा बोली, “भाई साहब, आप पैसों की चिंता मत करना।”

अस्पताल की कागजी औपचारिकता पूरी होने के बाद धीरेन के ऑपरेशन की तैयारी शुरू हो गई। धरा बुत बनी धीरेन को स्ट्रेचर पर ले जाते हुए देख रही थी। ऑपरेशन थियेटर का दरवाजा बंद हुआ और लाल रंग की बत्ती जल गई। धरा का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लगा की उसके शरीर में बहने वाला खून सूख गया है। वह धम से बाहर रखी बेंच पर बैठ गई। अनायास ही उसके दोनों हाथ जुड़ गए और वह ईश्वर से कुशलता की कामना करने लगी। परम दयालु ईश्वर ने उसकी अरदास सुन ली और ऑपरेशन सफल रहा।

 धीरेन को चौथे दिन आई.सी.यू. से कॉटेज में शिफ्ट कर दिया गया। इन चार दिनों में नींद की कमी और चिंता, धरा के चेहरे पर साफ दिखाई देने लगी। ऊपर से अस्पताल में शुभचिंतकों के फोन और उनकी उपस्थिति ने धरा को निढाल कर दिया। उसके सिर में बहुत तेज दर्द था। उसने सिस्टर से दवा ली और धीरेन को खाना खिलाया। धीरेन ने उसकी आँखों में झाँका। वहाँ पीड़ा के अथाह समंदर में बैचेनी हिलोरें ले रही थीं। वह बोला, “दिल का इलाज तो डॉक्टर ने कर दिया परन्तु यह फोन जो बेवक्त तुम्हारे आराम पर अटैक करता है इसका इलाज?”

धरा झुंझलाकर बोली, “ये फोन वरदान है या अभिशाप समझ ही नहीं आता। लोग जब बात करना शुरू करते हैं तो सुपर एक्सप्रेस की तरह चल पड़ते हैं।” धरा ने धीरेन को खाना खिलाया और उसे पानी पिलाकर लेटा दिया।

 धीरेन बोला, “तुम्हारा भी खाना रखा है। खा लो।”

 “अभी मन नहीं है। थोड़ी देर लेट जाती हूँ। उसके बाद खा लूँगी।”

थोड़ी ही देर में दोनों को नींद आ गयी। आहट से  धरा की नींद खुली तो दोपहर के चार बजे थे। धीरेन से मिलने उनके दूर के रिश्तेदार आए। उनके उठने से पहले ही दूसरे मेहमान आ गये तो पहले वाले को जगह कम होने से अपने आप ही उठकर जाना पड़ा। मरीजों से मिलने का समय समाप्त हुआ। धीरेन को दवा देने के लिए नर्स आयी। वह धरा से बोली, “मैम, आपके मिलने वाले बहुत आते है। मरीज को आराम की आवश्यकता है।”

धरा लंबी गहरी साँस लेकर बोलीं, “क्या करे सिस्टर, बहुत बड़ा सोशल सर्कल है।”

नर्स मुस्करायी और कंधे उचकाते हुए बोली, “मैम, रिकवरी नहीं होगी। आप पेशेंट का पूरा ध्यान रखें।”

धरा उदार दिल से सभी आगन्तुक के उपकारों और शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद करती। कुछ शुभचिंतक तो समय के इतने पाबंद थे की चार बजते ही अस्पताल पहुँच जाते। उनके समय की पाबंदता को देख, आप घड़ी मिला सकते। कुछ महाज्ञानी आचार्य, वैध बनकर अर्जित ज्ञान के सरोवर में जबरन धीरेन और धरा को डुबकी लगवाते। वे इस पुनीत कार्य को करने के लिए कटिबद्ध थे अतः बिना नागा उपस्थिति दर्ज करवाते। धरा के कठिन परीक्षा का ये समय भी बीत ही गया। अस्पताल से छुट्टी हो गई और घर आ गए। आज रविवार का दिन था। धीरेन को अस्पताल से छुट्टी मिले आज चौथा दिन था। सुबह से ही शुभचिंतकों का ताँता लगा था। धरा सीमा पर तैनात सिपाही की तरह डटकर सभी की आवभगत के लिए तत्पर खड़ी थी। आज धरा को साँस लेने की भी फुरसत नहीं थी। धीरेन की दवाइयों का समय हो गया। उसने धरा से नाश्ता और जूस माँगा। धरा बोली, “अब बनाती हूँ।” 

उसने धीरेन का नाश्ता बनाया परंतु तब तक धीरेन की दवा एक घंटा लेट हो चुकी थी। धरा को बहुत दुःख हुआ परंतु वह समझ ही नहीं पा रही थी कि यह उसकी लापरवाही थी या दुविधा। सुबह से शाम तक मशीन की तरह चलती रही। घड़ी ने रात के ग्यारह बजाए। धीरेन को खाना खिलाकर, धरा बिना खाना खाए बिस्तर पर लेट गई। नींद तो उसकी पलकों पर सवार उसके लेटने का इंतजार कर रही थी। लेटते ही वह खर्राटे भरने लगी। धीरेन ने उसे चद्दर ओढाया और कमरे की बत्ती बंद की।

आकाश में पूर्णिमा के चंद्रमा की मनमोहक शीतल चाँदनी फैली थी। वह चाँदनी हौले से खिड़की से कमरे में प्रवेश करने लगी और थोड़ी ही देर में उसने पूरे कमरे में शीतलता और रोशनी का उजास भर दिया। उस मध्यम रोशनी में धीरेन की नजरें धरा के चेहरे पर जा अटकी। हमेशा करीने से सजी हुई धरा के बाल आज अस्त-व्यस्त होकर बिखरे थे। धीरेन ने धीरे से हाथ आगे बढ़ाया और धरा के मुख पर बिखरे हुए बालों को करीने से सँवारा। वह टक-टकी लगाएँ धरा को देखने लगा। उसके विचारों के तानेबाने में अदालत का दृश्य था। जहाँ एक कटघरे में वह तो सामने धरा खड़ी थी परंतु न्यायाधीश की कुर्सी तो खाली थी। तभी धरा कि करवट ने उसे विचारों की तंद्रा से बाहर निकाला। शायद वह बहुत थक गई थी और उसके पैरो में दर्द था। उसकी आवाज में हल्की सी करहाट थी। धीरेन ने उसका चद्दर ठीक किया और फिर से मानस पटल पर चल रहे दृश्य से जुड़ गया। न्यायाधीश की उस खाली कुर्सी पर खुद को विराजमान कर उसने अनोखा फैसला लिया और सो गया। सुबह वह धरा से बोला, “ये शुभ चिंतक मेरे स्वास्थ्य लाभ की मंगल कामना लेकर आते हैं। अपने ज्ञान की खुराक का सेवन करवाते हैं। तुम पर मेहमान नवाजी का बोझ बढ़ाते हैं। मेरे आराम में खलल कर आराम करने की नसीहत दे जाते हैं। अब इनके उपकारों तले मेरा दम घुटने लगा है। हम कुछ दिनों के लिए घर से दूर चलते हैं।”

 धरा गहरी सोच में डूब गई। उसे चुप देखकर धीरेन बोला, “क्या सोच रही हो?”

धरा बुदबुदाईं भला हो इन हितैषियों का। उसने धीरेन और स्वयं के फोन को साइलेंट मोड पर किया। टेबल की दराज से कागज निकाला और उस पर लिखा ‘हम कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं, लौटने पर मुलाकात होगी’ और घर के मुख्य दरवाजे पर बाहर की ओर चिपका दिया। फिर घर के भीतर प्रवेश कर दरवाजे को इंटरलॉक कर दिया। धीरेन उसे देख कर मुस्कराने लगा। शुभचिंतकों के उपकारों के बोझ से मुक्त होकर धरा के चेहरे पर सकून और मुस्कान छा गई।

उषा सोमानी

चित्तौड़गढ़ (राज.)

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