निकम्मी बहू -Top 10 moral stories in hindii

Top 10 moral stories in hindi :  दोस्तों आपको इसमे 10 चुनिन्दा दिल को छु जानी वाली 10 कहानियाँ पढ़ने को मिलेगी

निकम्मी बहू

“अरे क्या हुआ नूतन बहन? सुना है कि तुम अचानक ही यहां का सब समेट कर अपने छोटे बेटा बहू के पास जा रही हो।”

नूतन जी की पुरानी सखी शीला चिंताकुल होकर पूछ रही थी।

हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए वो बोल पड़ीं,

” तुमने ठीक सुना है। मधुकर जी के जाने के बाद भी मैं इस शहर और घर का मोह नहीं छोड़ पाई थी। पर इधर कुछ दिनों से अकेलापन हावी होने लगा था।”

शीला ने सहमति जताते हुए कहा,

“ये तो तुमने बहुत ठीक किया पर तुमको बड़े बेटे बहू के पास जाना चाहिए। “

“पर क्यों?”

“तुमसे ही बराबर सुना था…बड़ी बहू बहुत होशियार और कामकाजी है। छोटी बहू बहुत सुस्त और ढीली ढाली और निकम्मी है।उसके पास तुम परेशान हो जाओगी।”

कुछ देर की गहन चुप्पी के बाद नूतन जी गंभीर स्वर में बोलीं,

” बड़ा बेटा बहुत साधन सम्पन्न हैं। बहू भी नौकरीपेशा है। मीठा बोल कर काम निकालना जानती है। छोटे के घर में उतना कुछ भी नहीं है। बेचारी बहू गृहस्थी के पाट में पिसी रहती है। “

शीला उत्तेजित होकर बोली,

“तभी तो कह रही हूं कि छोटी बहू की गृहस्थी में पिस कर रह जाओगी। अभी भी समय है, बड़ी बहू के घर चैन से रहो।”

नूतन ने गहरी सांस लेकर कहा,

“अपनी अपनी सोच है। और फिर कमजोर बच्चे पर माॅं की ममता अधिक रहती है। मेरे हाथ पाॅंव अभी सलामत है। छोटी की गृहस्थी का कुछ भार उठा लूॅंगी तो उसको राहत मिलेगी। फिर उसे भी अपने गुणों को उभारने का समय मिलेगा। धीरे धीरे वो भी बड़ी की तरह कामकाजी और स्मार्ट हो जाएगी।”

“बहुत ऊॅंची सोच है तुम्हारी ।”

“अरे कुछ सोच वोच नहीं है। बस अपनी कमजोर बहू का सहारा बनना है।”

नीरजा कृष्णा

 मायके का दर्द

आज रक्षाबंधन का त्योहार है. पूजा के पति उसकी ननद को ससुराल से विदाई कराकर लाने के लिए गए हैं. चार महीने पहले ही ननद की शादी हुई है. इसी ननद के कारण रक्षाबंधन में पूजा कभी अपने मायके नहीं जा सकी थी. हर बार रक्षाबंधन के दिन कभी सासु माँ की तबीयत खराब हो जाती तो कभी ननद अपनी परीक्षा की तैयारी का बहाना बना कर उसे रोक लेती थी.

इस साल पूजा ने मन बना लिया था कि वह मायके जाने के लिए संतोष से जरूर बात करेगी. तभी खबर आई कि उसकी ननद रक्षाबंधन में आ रही है. क्यूंकि शादी के बाद रक्षाबंधन में पहली बार वह घर आ रही थी इसलिए पूजा के मायके जाने का प्रश्न ही नहीं था.

घर में सर्वत्र चहल-पहल थी. सभी के चेहरे खिले हुए थे. पूजा भी अपने जज्बात पर काबू रखकर जबरदस्ती हंसने का प्रयास कर रही थी.

कार रूकने की आवाज सुनकर सभी मुख्य द्वार की ओर भागे. सासु माँ ने बेटी का स्वागत किया. माँ का आशीर्वाद लेने के बाद ननद ने पूजा को गले लगाते हुए धीरे से उसके कान में कहा- “भाभी आप जल्दी से मायके जाने के लिए तैयार हो जाइए. मैं आपके भैया को साथ में लाई हूँ. वे बाहर कार में आपका इंतजार कर रहे हैं. आपके लिए सारा सामान गाड़ी में रखा गया है.

इस अप्रत्याशित समाचार से पूजा भाव-विभोर हो गई. उसने अपने पति संतोष को देखा. वह हौले-होले मुस्करा रहे थे. शायद वह भी इस सरप्राईज में शामिल थे. ननद बोली- “मुझे माफ़ कर देना भाभी, ससुराल जाकर मुझे महसूस हुआ कि मायके का दर्द क्या होता है…”

– विनोद प्रसाद

 लिबास

नीना की उम्र लगभग पच्चीस को होने चली थी।दो वर्ष पूर्व ही तो विवाह हुआ था। परंतु नियति ने घोर अन्याय किया था।

खाने-खेलने के लिए अभी भरा-पूरा उम्र और ये ईश्वर का दंड।ऑफिस से लौटते समय पति रमेश की एक ट्रक के चपेट में आने से मृत्यु हो गई थी।

गोद में छ: माह की बच्ची,कैसे दोनों की जिंदगी कटेगी।ये सोंच-सोंचकर घरवाले चिंतित रहते थे।

कुछ ने नये सिरे से जिंदगी शुरु करने की सलाह दी तो कुछ ने यादों की समाधि पर खूद को मिटा देने की।

आखिर औरत को इसी समाज में रहना है तो ऊँच-नीच का खासा ख्याल भी रखना होगा।

गली-मोहल्ले की कुछ औरतों का तो बस एक ही काम था,दूसरों के घर की ताका-झांकी।

कौन किसके यहाँ अभी आया,कौन अभी गया एकदम पैनी निगाह लिए ताकती रहती।

छोटी ननद के ज़िद करने पर माथे पर छोटी सी बिंदी लगाई थी।थोड़े से रंग-बिरंगी चूड़ियां भी हाथों में डाली थी।इंसान का रंगों से कितना गहरा नाता है ये उसने महसूस किया था।

हद तो तब हो गई जब किसी ने कहा देखो!.आईने के सामने ज्यादा वक्त मत गुजारना।लिबास जितना सादा होगा उतना ही अच्छा रहेगा।ये भटकने नहीं देती।

नीना की नजरों में कई सादे लिबास तैरने लगे थे।जो भटके हुए थे।

सपना चन्द्रा

बस एक झलक,,,

बाइक पर बैठ कर ऑफिस से घर की ओर निकले थे मैं औरमेरा दोस्त जीवन ।शहर करीब 30 किलोमीटर पीछे रह गया था कि आगे के एक मोड़ पर जीवन ने बाइक रुकवाई ,”अरे यार, यहां आगे रुको कुछ देर ,फिर चलते हैं घर ।”

मुझे आश्चर्य हुआ हम एक पेड़ के नीचे खड़े थे या छिपे थे यह बाद में पता चला।

खीझ कर जीवन से पूछा,”क्यों रुके हैं हम यहां।ले दे कर चार घर हैं सामने।कोई रिश्तेदारी है क्या ,तो उनके घर चलो न। बौचट की तरह खड़े हैं हम लोग।”

उसकी आवाज़ जैसे फुसफुसाती- सी कहीं दूर से आती लगी,”अरे रुको न यार ,सरगम को भर नज़र देख लूं ,चलते हैं फिर।”

अब चौंकने की बारी मेरी थी ,सरगम तो वही लड़की है जिसे जीवन कॉलेज के ज़माने से प्यार करता था।पर शादी नहीं हो पाई क्योंकि जाति आड़े आ गई थी।जीवन तो जीवन भर अविवाहित रह गया ,पर सरगम किसी और की धड़कन में बज रही थी।ये बावला अब भी उसको याद करता है।सोच कर मुझे बड़ा गुस्सा आया।

इंतज़ार और सरगम के दर्शन की अभिलाषा में हमारे एक – दो घंटे बीत गए ।

मैं फिर जीवन को चलने के लिए कहने ही वाला था कि जीवन थोड़ा ऊंची आवाज़ में बोला,” चंचल देख – देख उधर मेरी सरगम ,कितनी क्यूट लग रही है!”

उसके देखने की दिशा में मेरी नज़र गई तो देखा एक भरेपुरे बदन की स्त्री सर पर पल्लू रखे ,एक बच्चे का हाथ पकड़े थी और एक बच्ची को गोद में उठाए पास की दुकान पर कुछ खरीदने लगी।

मेरी नज़र जीवन की ओर गई तो उसने कहा,”चलो अब चलते हैं ।मुझे साल भर जीने की ऊर्जा मिल गई।हर साल उसे देखने यहां आ जाता हूं।”

मैं आश्चर्य से उसका मुंह देखते हुए उसके प्रेम के प्रति नतमस्तक हो उठा और उसकी पीठ ठोंकी , “हां ,चल चलते हैं अब।”

जल कुछ बूंदें मेरी पलकों में और कुछ जीवन की आंखों में तरंगित हो उठे थे।

निर्मल चाहत ऐसी ही तो होती है न!

*सत्यवती मौर्य

रिश्ते ,,,

“बेटा, ज़रा मोबाइल देखना हिंदी के कीबोर्ड पता नहीं कहाँ ग़ायब हो गए।जो है उससे टाइप नहीं कर पा रहा हूँ”,रामेश्वर जी ने अपनी नवागत बहू से कहा।

“जी बाबूजी ,देखती हूँ अभी”बहू ने कहा।

हाथ में मोबाइल ले कर कोशिश की पर बात नहीं बनी ।बीच में सन्देश आ गया मोबाइल अपडेट करने का। बहू ने क्लिक कर दिया।अपडेट होते ही कुछ नम्बर डिलीट हो गए।बहू ने घबरा कर फोन मुझे वापस पकड़ाते हुए कहा,” अंकल ,,अपडेट करते ही पता नहीं कैसे कुछ नम्बर डिलीट हो गए और हिंदी का बोर्ड भी ठीक नहीं हुआ। सॉरी बाबूजी,सॉरी बाबूजी”,वह बहुत ग्लानि महसूस कर रही थी।

रामेश्वर जी ने मोबाइल लेते हुए कहा,”बेटा, कोई बात नहीं शाम को राजेश को दिखाता हूँ ,वह ठीक कर देगा।नहीं तो दुकान में दिखा कर ठीक करवा लेंगे।”

रामेश्वर जो अमूमन किसी भी बिगड़ी हुई बात पर जल्दी ग़ुस्सा हो जाते थे ,उन्हें इस तरह शांत देख,पत्नी को अचरज हुआ।

बहू के भीतर जाते ही वे उनसे बोली,”अजी, नम्बर डिलीट हो गया और आप चुप हैं।पहले तो ख़ूब गरज -बरस पड़ते थे?”

रामेश्वर जी ने कहा,” भागवान,अभी -अभी तो आई हैं बहूरानी।और मैं हूं उसका अंकल , जब बाबूजी कहने लगेगी तब देखेंगे।”और हँसने लगे।

स्वर्गवासी दोस्त की बिटिया से बेटे की शादी करके दोस्ती और वादे को निभाया था उन्होंने। अब पिता का फ़र्ज़ भी निभाने की कोशिश में लगे थे।बहू को बेटी बनने में वक़्त तो लगेगा न!सोचकर वे मुस्का रहे थे और पत्नी दीदा फाड़े उनके शांत मुख को देख रही थीं।

*सत्यवती मौर्य

बदलाव

सोहन जी रिटायर्ड होने वाले है पर घर में ये सभी के लिए जितना खुशी का विषय है उतना ही चिंता का भी विषय है।

उसके गुस्सैल और अनुशासन वाले स्वभाव से सब डरे सहमे रहते है।

जब वो बैंक जाते तब जाकर सब राहत की सांस लेते।

दोनो बेटे को अपनी अपनी ऑफिस चले जाएंगे पर दोनो बहुएं और सोहन जी की पत्नी रेखा का हाल क्या होने वाला है वो अच्छी तरह इस बात को समझ रही है।

रेखा जी अपनी दोनों बहुओं को दिलासा तो दे रही है कि सब सही होगा पर अन्दर ही अन्दर वो भी आने वाले तूफान को भली भांति समझ रही है कि आगे उनका बचा जीवन अंधेरे में ही बीतने वाला है।

खैर जो होना है वो तो होकर रहेगा।

आखिर सोहन जी रिटायर्ड हो गए और उसके दूसरे दिन ही सुबह जल्दी उठकर सबके लिए चाय बनाने लगे और फिर सबको चाय देकर खुद भी उनके साथ चाय पीने लगे।

फिर नाश्ते में सिर्फ पोहा बनाने को कहा और घर के काम में सबकी मदद करने लगे।

ना कोई टोका टाकी, ना ही कोई अनुशासन

अपने पोते के साथ खेलने लगे

उनका ये बदला रूप देख कर सब हैरान थे

उनकी पत्नी रेखा जी ने हिम्मत करके उनसे पूछा कि, “आपकी तबियत ठीक है ना”

हां रेखा मैं बिलकुल ठीक हूं, क्यों क्या हुआ?

“नही आज आप बदले बदले है इसलिए”

“अच्छा हा हा हा हा”

“अरे आप हंस क्यों रहे है?”

“अरे यार सारी जिंदगी भागम भाग में बिताई

रोज सुबह उठो तैयार हो, काम करो, शाम को आओ तो फिर घर की जरूरतें पूरी करने में लग जाओ।”

“मशीन बन गया था मैं, बस खुशी इस बात की थी इस मशीन ने खुद को घिस कर तुम सबके सपने पूरे किए, अपने बच्चों को लायक बनाया।”

“हमेशा खुद को अंधेरे में रखा और तुम सबके लिए रोशनी ढूंढने में लगा रहा।”

“पर अब में जीवन के इस मोड़ पर अपने लिए जीना चाहता हूं, अपने अंधेरे को पीछे छोड़ उस एक रोशनी की किरण को पकड़ना चाहता हूं और उसी रोशनी में तुम सबके साथ आगे बढ़ना चाहता हूं।”

“जो जो मैने अपने जीवन में खोया है उसे पाना चाहता हूं।”

उनकी बाते सुन उनके दोनो बेटे उनके गले लग गए और बोले, “पापा बिलकुल सही कहा आपने जो कुछ आपने हमारे लिए, हमारे सुख के लिए छोड़ा वो सुख हम आपको देंगे और इस प्यारे परिवार में आई इस रोशनी की किरण को हमेशा संजोकर रखेंगे।”

नताशा हर्ष गुरनानी

भोपाल

कबाड़  

‘फूलवती क्या कर रही है ? खाली हुई तो आना ‘। रामकली, फूलवती की खोली के आगे से निकलते हुए बोली। रामकली ने चारों थैले रखें ही थे कि फूलवती आ गई। उसे देख रामकली बोली, ‘ये सब मैडम ने दिये है । चार थैले कल भी लाई थीं । मैडम रिटायर हो गई है।

‘ इतना सामान ‘ फूलवती हैरानी से बड़े बड़े आठ दस थैलो को देखते हुए बोली।

‘ हा , दस साल से तो मैने अपनी मैडम को थैले भर भर कर लाते ही देखा था, निकालते कभी नही देखा । यहां तक की दिवाली पे भी कभी नही निकाला इतना कबाड़ा ।’ रामकली बोलने के साथ साथ थैलो से सामान निकाल निकाल कर रखे भी जा रही थी।

‘ जो जो कपडे तेरे , तेरे बच्चों या तेरे आदमी के काम आये , वो ले ले ‘। रामकली ने कपड़ें उस के आगे फैलाते हुए कहा।

‘ तू रख ले रामकली तेरे आगे काम आ जाएंगे’

‘ न, न बहन ये काम तो कोठियों वाली मैडमें करती हैं । शायद इसीलिए तो इतनी बडी बडी कोठियां में रहती है ताकि उन्हें ठूस ठूस के भर सके। मैने तो रख लिया जो चाहिए था। ये तो इतने कपड़ें है इस से तो आसपास की सभी खोलियों के परिवारों का तन भी ढक जाएगा।’ रामकली की आवाज़ मे संतुष्टि का भाव था।

डॉ अंजना गर्ग

म द वि रोहतक ।

दूसरी भाषा

नरेश जी का बड़ा बेटा घर आया था। घर का माहौल त्योहार जैसा था। भाई से मिलने रेखा भी अपने परिवार के साथ पहुँच चुकी थी। सुशीला जी अपने रसोइए को बच्चों की पसंद का व्यंजन बनाने की हिदायत देती रहती थी।

रेखा की बेटी पिंकी और पोता आदि दोनों आपस में काफी घुलमिल चुके थे। दोनों अक्सर बगान में साथ ही खेलते थे। पिछली बार जिन पौधों को आदि ने देखा था वे अब बड़े हो चुके थे किसी- किसी में तो फल भी आ चुका था। जिन पौधों को आदि ने अपने हाथ से लगाया था उसे देखकर वह बहुत खुश था।

आज आदि पिंकी के साथ गेंद खेल रहा था। गेंद उछलकर गेट से बाहर चला गया। लौटते समय आदि की नजर गेट पर लिखे उन हिन्दी अंकों पर गयी।

“पिंकी, ये क्या लिखा है?”

उसका सवाल सुन पिंकी मुह पर हाथ रख हँसने लगी और बोली- अरे बुद्धू, ये हमारा क्वार्टर नम्बर है।”

क्वार्टर नम्बर तो फिफटी सेवन है।”

“वही तो यहाँ लिखा है। इतने बड़े होकर भी पढ़ने नहीं आता?”

और पिंकी हँसती हुई नाना जी के पास गयी।

“नाना जी, आदि भैया को क्वार्टर नम्बर भी पढ़ने नहीं आता।”

” दूसरे लैंग्वेज में था तो मैं कैसे पढ़ता?”

पुष्पा पाण्डेय

राँची,झारखंड।

दिव्य विदाई

“ सत्या जी इस पल अपनी चेतना में ही नहीं है । देखो न इनके पति का निधन हुआ है लेकिन वह सभी आने जाने वालों के मस्तक पर चंदन का तिलक लगा रही हैं ।” एक पड़ोसन जी ने कहा ।

“ हाँ वही तो शांति पाठ आरंभ होने को है, हौसले से कितना प्रबन्ध कर रही है । पूरे घर को फूलों से सजाया है । दिन के समय भी ढेरों टी लाइट्स प्रज्वलित हैं । घर में केवड़े की सुंगध का रूम फ्रैशनर छिड़का है ।” सत्या जी की दूर के रिश्ते की एक महिला बोलीं ।

“ जगह जगह धूप बत्ती और अगरबत्ती जल रही है । घर के मुख्य द्वार पर पर भी फूलों की बंदनवार सुसज्जित है । तीन दिन से निरंतर भजन और श्री भगवद्गीता के श्लोकों के स्वर गूंज रहे हैं । कहीं से लग ही नहीं रहा है कि इनके घर में किसी की मृत्यु हुई है ।” पहली वाली ने कहा ।

सत्या जी की एक सखी मानवी निकट ही बैठी थीं । बीच बीच में जाकर वह प्रबंध में सत्या जी का हाथ बँटाती थीं और फिर कुछ देर को बैठ भी जाती थीं । मानवी जी तो जानती ही हैं कि सत्या जी आध्यात्मिक हैं ।

मानवी जी मन ही मन सोंच रही थीं कि यह लोग समझ नहीं पा रही हैं कि मृत्यु शोक का विषय नहीं है । जीव की यात्रा संपन्न हुई आत्मा को मुक्ति मिली । हम तो जीव की बाहरी काया से ही मोह करते हैं सो उसकी याद मे रोते भी है परन्तु हमें शोक नहीं करना चाहिए । मृत्यु जीवन मरण के चक्र से मुक्ति की ओर अगला कदम है । जाने वाली हर आत्मा ऐसी ही दिव्य विदाई के योग्य है । सत्या तो आज पूरी निष्ठा से अपने पत्नी धर्म का निर्वाह कर रही हैं ।

मानवी जी का ह्रदय अपनी सखी के प्रति सम्मान और श्रद्धा से आकंठ भर गया था ।

जय श्री कृष्णा

आभा अदीब राज़दान

लखनऊ

मीठा पान

“ये तुम बेकार का जमावड़ा मत लगाया करो। तुम्हारी सहेलियों को कोई कामधाम नहीं है क्या?”

रवि का गुस्सा देख कर मीरा हैरान थी। आज कॉलोनी की सात आठ सहेलियों को उसने चाय पर बुलाया था। वो फिर चिल्ला पड़ा था,”बच्चे स्कूल गए और पति बेचारा ऑफिस में खट रहा है। तुम औरतें महफ़िल सजा कर मस्ती करती हो।”

किचन में मीरा की मदद करती मम्मी जी ने बेटे को झिड़का,”इतना अंटसंट क्यों बक रहे हो? इसकी सभी सहेलियां अच्छे परिवारों की सुसंस्कृत महिलाएं हैं। तुम्हारे भी मित्र आते हैं ।”

वो चिढ़ गया,”आप हमेशा मीरा की ही तारीफ़ करती हो। आप नहीं समझती हैं…ये बड़े घरों की मॉड औरतें बड़ी घरफोड़ू होती हैं।”

मीरा रुआँसी हो गई थी। उन्होनें बात सम्हालते हुए रवि को समझाया भी और डाँटा भी। तीन बजे से महफ़िल सजी और सबने खूब मस्ती की। तभी कॉलबेल बजी…सामने दुकान का पुराना नौकर एक पैकेट लिए खड़ा था। मम्मी जी ने मुस्कुराते हुए खोल कर देखा…उसमें मीरा की सहेलियों के लिए गुलकंद वाले मीठे पान के बीड़े थे।

वो आश्चर्य से कभी पान के बीड़ों को देख रही थी और कभी मम्मी जी की ओर। तभी रवि का फोन आ गया,”मम्मी जी, आपकी सलाह कितनी बढ़िया थी। मीरा और उसकी सहेलियों का मुँह मीठा हो गया ना।”

मीरा पान चबाते हुए मुस्कुरा उठी और हौले से बुदबुदाईं,”सबसे ज्यादा तो मन मीठा हो गया।”

नीरजा कृष्णा

संस्कार

रीमा का बचपन बहुत ही प्यारा था। अपने माता-पिता की लाड़ली इकलौती संतान, हर कार्य में निपुण।।जैसे ही बड़ी हुई, उसकी शादी की बात शुरू हो गई और एक दिन ब्याह कर वह अपने ससुराल आ गई। यहाँ भी उसे अपने सास-ससुर से माता-पिता जैसा स्नेह मिला। पति का प्यार पाकर तो उसकी खुशी दुगुनी हो गई।

पर इन खुशियों को जो सहन न कर पा रही थी, वे थी उसके पति की बुआ जो इसी घर में उनके साथ रहती थी। अपने भाई के असीम प्यार के कारण उनकी गर्दन ऐंठी रहती थी। जैसे ही उसने देखा सभी रीमा को सिर-आँखों पर बिठा रहे हैं तो उन्होंने बात-बात पर रीमा को नीचा दिखाना शुरु कर दिया।

एक दिन जब उन्होंने उसके स्कर्ट टॉप पहनने पर व्यंग्य किया कि अच्छे घर की बहुएँ साड़ी पहनती हैं,सिर पर पल्ला रखती हैं, तुममें तो कोई संस्कार नहीं तो रीमा ने आदर से कहा,”संस्कार कपड़ों से नहीं, व्यवहार से पता चलते हैं। अगर साड़ी पहनने वाले ही संस्कारी होते हैं तो आपकी बहू आपको अपने साथ रखती।

रीमा की बात सुनकर बुआ जी ने ऊँची आवाज़ में रीमा को बुरा- भला कहना शुरू कर दिया। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनका भाई उनका साथ देगा पर रीमा के ससुर ने कहा कि वे सही का साथ देंगे। रीमा उनकी बहू है, पर बेटी जैसी है। जैसे मैं चाहता हूँ मेरी बेटी खुश रहे, वैसे ही अपनी बहू को खुश रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।

अपने भाई की बात सुनकर बुआ को भी एहसास हुआ कि गर्दन ऐंठ कर प्यार व सत्कार नहीं पाया जा सकता। अब वह भी इसी परिवार की सदस्या हैं और इस परिवार के सुख की जिम्मेदारी भी उनकी है। उन्होंने रीमा को प्यार से गले लगा लिया और दिल से अपना लिया।
स्वरचित
रचना गुलाटी

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