थैली भर के आशीर्वाद-  सुभद्रा प्रसाद : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :  “अरे ये क्या बेटा, गगन, मैंने तो तुम्हें सब्जी लाने को भेजा था, पर तुम तो खाली थैली लेकर आ गये |” माँ ने अपने पंद्रह वर्षिय पुत्र गगन को खाली थैली  लेकर घर में आते देखकर कहा |

      ” खाली थैली नहीं मां, थैली भरकर आशीर्वाद लाया हूँ |” गगन ने धीरे से कहा |

        ” थैली भरकर आशीर्वाद, यह क्या बात हुई? ” माँ ने आश्चर्य से पूछा |

       ” बताता हूँ, माँ |” गगन ने सोफे पर बैठते हुए कहा |

       ” कहाँ पैसे खर्च कर आये और अब क्या झूठी सच्ची कहानी सुनाना चाहते हो, बताओ |” माँ गगन के बगल में बैठते हुए गुस्से से बोली |

        ” कोई झूठी कहानी नहीं सुना रहा हूँ | सच्ची बात बताता हूँ |”गगन माँ से बोला -” रामधनी काका को तुम जानती थी ना ?”

       “कौन रामधनी? ” माँ उसकी बात बीच में काटते हुए बोली |

        ” वही रामधनी काका, जिन्हें और जिनकी पत्नी को तुम कभी- कभी घर में काम के लिए बुलाया करती थी | ” गगन ने कहा |

        ” अच्छा वो रामधनी, जो पति-पत्नी मजदूरी करते थे और मेरे यहाँ भी आकर काम कर जाया करते थे ” माँ ने याद करते हुए कहा-” पर उन दोनों की तो छ माह पहले ही काम से घर लौटते हुए एक दुर्घटना में एक साथ मृत्यु हो गई थी |” 

        ” हाँ माँ वही |” गगन ने  कहा और आगे माँ को बताया कि उनका घर, हमारे घर से थोड़ी दूर पर, बाजार जाने के रास्ते में ही पडता है ना | मैंने रामधनी काका को उनके घर में देखा था, इसीलिए मैं उनका घर जानता हूँ |आज जब मैं बाजार जा रहा था तो उनके घर से रोने की आवाज सुन मैं रूक गया | देखा कि काका की बुढ़ी माँ और   काका का बेटा दोनों रो रहे हैं | मैं ने पूछा तो काका की माँ ने बताया कि यह बच्चा दो दिन से भूखा है, इसीलिए रो रहा है |

जब मैं ने उनसे पूछा कि आप कुछ काम क्यों नहीं करती तो उन्होंने बताया कि बुढ़ापे और कमजोरी के कारण वह पूरा काम ठीक से नहीं कर पाती, इसी से कोई उन्हें काम नहीं देता | थोडा बहुत कुछ करके और इधर-उधर से कुछ मांग कर वह किसी तरह अपना और इस बच्चे को कुछ खिला पाती है | बच्चा भी अभी सिर्फ आठ वर्ष का ही है तो वह भी कुछ नहीं कर पाता है |उसका स्कूल, पढाई, कपड़े सब तो छूट गये पर भोजन बिना कैसे रहे ं?

कितने दिन से मैंने भरपेट खाना नहीं खाया, सिर्फ बच्चे का पेट भर देती थी, पर दो दिन से इसका भी पेट नहीं भरा है, इसी से यह खाने के लिए रो रहा है और मैं अपनी मजबूरी पर रो रही हूँ | इतना बताकर गगन ने मां का हाथ पकड़ लिया और उदास होकर बोला -” माँ, मुझे उन दोनों को देखकर बहुत दया आई और साथ ही रामधनी काका भी याद आ गये |वे जब हमारे यहाँ काम करने आते थे तो मुझे कितना प्यार करते थे | जब मैं छोटा था तो मुझे कंधे पर बैठाकर घुमाया भी करते थे |”

      ” हाँ, वह एक अच्छा और मेहनती आदमी था |अपना काम पूरी ईमानदारी से करता था | मुझे भी उसकी असमय मृत्यु का बहुत दुख हुआ था और जब भी उसकी माँ आती थी, कुछ न कुछ मदद कर देती थी, पर इधर बहुत दिन से वह नहीं आई है |”

        “माँ उन दोनों की हालत बहुत खराब है  | उनकी झोपड़ी टूट गई है |कपड़े बेहद फटे-गंदे थे, पर उनका सारा ध्यान भूख पर था | मुझसे रहा न गया | मैं ने बाजार से ब्रेड, बिस्किट, कचौड़ी- जलेबी और कुछ फल खरीदे और उन्हें दे दिये | वे लोग बहुत खुश हुये और खाने लगे | बस माँ इसी में तुम्हारे दिये सारे पैसे खर्च हो गये ,पर माँ काका की माँ ने मुझे इतना आशीर्वाद दिया कि मेरी खाली थैली भर गई |अब बताओ मां, क्या मैंने गलत किया? ” गगन रूआंसा होकर बोला | 

         ” नहीं, तुमने कोई गलती नहीं की|” माँ ने झट कहा |

       ” पर माँ खाने का यह सब सामान तो एक दो दिन में खत्म हो जायेगा, फिर उनका क्या होगा? क्या हम उनके लिए और कुछ नहीं कर सकते?” गगन माँ का हाथ पकडकर बोला |

    “मेरा बेटा इतना समझदार हो गया है और दूसरों के लिए इतना सोचता है , यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई | मै पापा से बात करूँगी और उनसे कहकर अपने बगीचे वाली कोठरी साफ करवा दूंगी | उन दोनों को उसमें ले आऊंगी और उनकी सारी आवश्यकताऐं भी पूरी करूँगी | दादी घर के कामों में मेरा हाथ बटा देगी, सहायता कर देगी और पोता तुम्हारे साथ खेलेगा | उसका नाम भी हम स्कूल में लिखवा देगें | ठीक है ना |” माँ ने गगन के सिर पर हाथ रखते हुए कहा | 

        ” ओह माँ तुम कितनी अच्छी हो? तुम उनके लिए इतना करोगी? ” गगन माँ से लिपट गया |

         ” यह मैं उनके लिए नहीं, तुम्हारे लिए कर रही हूँ मेरे बच्चे, ताकि तुम्हारी थैली सदा आशीर्वाद से भरी रहे |”माँ ने गगन को गले से लगा लिया | 

      दोनों हंसने लगे पर दोनों की आंखें रामधनी के परिवार की स्थिति पर नम थी |

# आशीर्वाद

स्वलिखित और मौलिक

सुभद्रा प्रसाद

पलामू, झारखंड |

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