शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 2) – अर्चना खंडेलवाल  : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : तभी भारती जी की आवाज आती है,” अरे! बहू खाने की तैयारी कर लें, मेरा बेटा आने वाला है,” तू तो रोज आकर पसर जाती है, फिर खाना बनाने में देरी हो जाती है, और य पैरो में दर्द क झूठा बहाना मत बनाना, तेरी तो रोज की ही आदत हो गई है, तेरा तो पता ही नहीं लगता कि कब झूठ बोलती है और कब सच”?

भारी कदमों से वंदना उठी, नेहा और भारती जी उसकी जरा भी मदद नहीं करते थे, बस ऑफिस से आते -जाते वक्त उसे तानें सुनने को जरूर मिलते थे। रात को रितेश घर पर आया तो उसके कानों तक भी पर्स वाली बात पहुंचा दी गई।

कमरे में जाते ही रितेश गुस्सा हो गया,” तुम्हें सिर्फ अपनी पड़ी रहती है, तुम तो मेरी मम्मी और बहन को कभी खुश नहीं रख सकती, एक पर्स अपने लिए लाई तो छोटी ननद के लिए भी कुछ ले आती, तुम तो मजे कर रही हो और मेरी बहन तरस रही है “।

“रितेश, ये तुम क्या कह रहे हो? एक पर्स के लिए कितना बवाल हो गया है, और मै ये पर्स नेहा को ही देने वाली थी, पर मुझ पर ये शक गलत है कि मैंने इसे  खरीदा है “।

“तुम भी मेरी बात पर विश्वास नहीं करते हो, आखिर तुम भी सब जैसे हो और वंदना रूठकर सो गई”। रितेश ने उसे मनाना भी जरूरी नहीं समझा।

अगले दिन वंदना ने अच्छी सी ड्रेस पहनी और तैयार हो गई, “ये  आज सज-धजकर कहां जा रही हो? भारती जी ने पूछा तो वंदना ने कहा,” मेरे फ्रेंड का बर्थडे है तो वो होटल में पार्टी देगा, मै रात को देर से घर आऊंगी, मेरा डिनर भी बाहर ही है”।

“अच्छा, फिर तो रितेश भी बाहर ही खाना खायेगा, वो भी तो जायेगा”,  भारती जी बोली।

“नहीं मम्मी जी, वो मेरा फ्रेंड है, रितेश का नहीं है, वो और मैं ऑफिस के अलग-अलग एरिये में काम करते हैं, मै बिल्डिंग नंबर एक मै जाती हूं और रितेश दो नंबर की बिल्डिंग में काम करते हैं, हम दोनों के फ्रेंडस भी अलग है”।

ये सुनते ही भारती जी का शक्की दिमाग दौडने लगा,” वो शादीशुदा है या कुंवारा? और साथ में कितने लोग जा रहे हैं, तुम कब तक आ जाओगी, मेरे विचार से तो जहां तुम्हारा पति नहीं जा रहा है, तुम्हें भी वहां नहीं जाना चाहिए, कल को कोई ऊँच-नीच हो गई तो, लोग और रिश्तेदार क्या कहेंगे? समाज में हमारी बदनामी हो जायेगी।”।

ये सुनते ही वंदना का दिमाग चकरा गया,” मम्मी जी, आप ये क्या सोच रही है, क्यों इतना शक कर रही है?  मेरा कलीग है, और मै अकेले नहीं जा रही हूं, रितेश को भी उसके बारे में पता है, और वंदना चली गई।

उस दिन रितेश शाम को जल्दी घर आ गया था, उसका फोन नहीं लग रहा था तो वंदना ने उसे मैसेज कर दिया और वो पार्टी के लिए निकल गई थी, घर पर आकर रितेश भी गुस्सा हो रहा था,” आखिर अपने आपको क्या समझती है? हमारी इज्जत की तो जरा भी परवाह नहीं है”।

वंदना ने आकर रितेश को समझाया भी कि तुम तो मेरे सभी दोस्तों को जानते हो,और तुम ही शक कर रहे हो कि मेरे उसके साथ कोई सबंध है, तुमको तो मम्मी जी को समझाना चाहिए, एक तो वो शक करती रहती है, दूसरी ओर नेहा भी पढ़ी-लिखी है, फिर भी वो उनके कान भरती रहती है, फिर शादी करने का ये मतलब नहीं है कि सबसे दोस्ती तोड़ ली जाएं?

वंदना को आज भारी धक्का लगा था, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका पति उसके साथ ऐसे कर सकता है, वो तो उसका सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था।

उसने रात को ही अपनी मम्मी को फोन किया और सारी बातें बताई, वंदना की मम्मी ने भी उसे समझाया,” वंदना रिश्तों के बीच में गलतफहमियां आ जाती है तो उन्हें दूर किया जाता है, ना कि रिश्तों से ही दूरियां बना ली जाती है, तुझे वो सब शक के जाले हटाने होंगे, वरना तू उन जालो में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेगी, मुसीबतों को छोड़कर भागना कमजोरी  है पर मुसीबतों से लड़कर ही मजबूत बना जा सकता है।

वंदना के कदम रूक गये, वो सब कुछ छोड़कर मम्मी के घर जाने वाली थी, पर रहना तो इसी घर में था, उसने आंसू पोंछे और तैयार होकर रितेश के साथ ऑफिस चली गई, दिन भर दोनों ने काम किया और शाम को ऑफिस से घर जाने की बजाय वंदना उसे पार्क में ले गई, और घर पर फोन कर दिया कि हम दोनों बाहर ही खाना खाकर आयेंगे।

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शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 3)

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शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 1)

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लेखिका

अर्चना खंडेलवाल

 

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