शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 1) – अर्चना खंडेलवाल  : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : “ये तुम्हारी शक करने की आदत कब जायेगी? तुम्हें तो हर बात पर ही शक करना है और मेरा समझाना ही बेकार है, मै क्यूं पत्थर से सिर फोड़ रही हूं और वंदना दनदनाती हुई कमरे से बाहर निकल गई, बाहर बॉलकोनी में जाकर आंसू बहाने लगी, पर उसके आंसूओं से रितेश पर कोई असर नहीं होता था,  आखिर वो भी तो पूरे दिन ऑफिस में काम करके आती थी, और आते ही घर गृहस्थी संभालती थी, उसके काम करने पर उस पर शक किया जाता था, और रोज सौ सवाल दागे जाते थे, आज पार्टी में जाकर क्या आ गई? उस पर शक किया जाने लगा, रितेश अकेले ही नहीं उसके घरवाले भी वंदना को हर बात के लिए शक के दायरे में खड़ा कर देते थे, आखिर वो भी इंसान हैं, कब तक अपनी सच्चाई सबके सामने साबित करती रहेगी?

वंदना और रितेश की मुलाकात ऑफिस जाते वक्त बस में हुई थी, दोनों एक ही ऑफिस में काम करते थे, पर एक-दूसरे से बात नहीं करते थे। रोज यूं ही मिलते मिलाते एक बार रितेश ने साथ में कॉफी पीने को कहा तो वंदना ने भी हामी भर दी, धीरे-धीरे दोस्ती हुई और रिशता प्यार में बदल गया।

एक दिन रितेश ने बातों ही बातों में शादी का प्रस्ताव रख दिया, तो वो हैरान रह गई, उसने सोचकर बताने को कहा, अपने घरवालों से बात की और शर्त रखी कि वो शादी के बाद नौकरी नहीं छोड़ेगी, ये नौकरी उसका अभिमान है। रितेश ने भी अपने घरवालों से बात की और दोनों की रजामंदी से शादी हो गई। रितेश के घर में उसके मम्मी -पापा और एक छोटी बहन थी, पापा की तबीयत ठीक नहीं रहती थी, उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी, तो रितेश अकेले ही घर का खर्च चला रहा था।

वंदना के आने से उसे घर खर्च चलाने में आसानी हो गई थी, लेकिन वंदना पर अब दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी, उसे ऑफिस जाने से पहले भी काम करके जाना होता था, और ऑफिस से आकर भी काम पर लगना होता था, इन सबके कारण वो बहुत थक जाती थी, पर नई -नई शादी हुई थी तो वो कुछ बोल भी नहीं पा रही थी, उसकी सास और ननद दोनों उस पर हावी रहते थे।

एक दिन वो ऑफिस से घर आई तो उसके हाथ में नया पर्स था, ये देखते ही उसकी ननद नेहा जलने लगी और बोली,” भाभी, माना आप कमाते हो, पर अपने ऊपर खर्च करने से पहले आपको भैया से पूछना चाहिए था, अब सारी कमाई खुद पर ही खर्च कर दोगी तो घरवालों का क्या होगा? मम्मी को आपसे कितनी उम्मीदें थीं”।

अपनी बेटी नेहा की आवाज सुनकर भारती जी  बाहर आई, वंदना के हाथ में पर्स देखकर बौखला गई,” वाह!, बहू तुम्हारे तो ठाठ है, तुम तो कमा भी रही हो, और लुटा भी रही हो, और मेरा बेटा वहां अकेले मेहनत कर रहा है “।

ये सब सुनकर वंदना बोली,” मम्मी जी, मैंने ये पर्स खुद नहीं खरीदा है, मेरी एक सहेली ने मुझे उपहार में दिया है, उसकी पर्स की दुकान है और वो हर साल दुकान पर अच्छी सेल होने पर मुझे पर्स देती है, ताकि अगले वर्ष भी उसकी अच्छी कमाई हो, उसके ऐसा करने से उसके काम में बरकत होती है, ऐसा उसका मानना है”।

“भाभी, हमें इस तरह से बेवकूफ मत बनाओ, आपने ये पर्स उनकी दुकान से खरीदा होगा, और उनका नाम लगा रही हो, भला इतना महंगा पर्स कोई बिना मतलब के तो उपहार में नहीं देता है “।

उसकी बात सुनकर भारती जी भी बोलती है,” बहू मुझे तो लगता है, तूने अपने ही पैसे खर्च किये होंगे, वरना कोई किसी को कुछ नहीं देता है “।

“मम्मी जी, मै सच कह रही हूं, मै झूठ क्यूं बोलूंगी? अगर मै कोई चीज अपने लिए खरीदूंगी तो आप सबसे छुपाने की क्या जरूरत है “?

“भाभी, रहने दो, नेहा और भारती जी अंदर चले गए , ड्रॉइंग रूम में खड़ी वंदना को बहुत बुरा लग रहा था।

वंदना अपने कमरे में जाकर आराम करने के लिए पलंग पर लेट गई, और उसके पैरों में दर्द हो रहा था, उसे लग आराम कर लेगी तो रात का खाना बना लेगी, रितेश की बॉस  के साथ मीटिंग थी, इसलिए उसको देर से आना था।

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शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 2)

शक से रिश्ते बिगड़ जाते हैं (भाग 2) – अर्चना खंडेलवाल  : Moral stories in hindi

लेखिका

अर्चना खंडेलवाल

 

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