ससुराल का सुख- विभा गुप्ता  : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi :   लड़कियों की तरह लड़के भी अपने ससुराल की अच्छी-अच्छी कल्पनाएँ करते हैं। हैदराबाद की एक आईटी कंपनी में काम करने वाला प्रतीक भी अपने होने वाले ससुराल की बहुत सारी कल्पनाएँ करता था।अपने शादीशुदा मित्रों से जब उनके ससुराल के खट्टे-मीठे अनुभवों को सुनता था तो वह सोचता कि काश! मुझे भी ऐसा ही ससुराल मिले जहाँ मेरी खूब खातिर हो, साले-सालियाँ हों जिनके साथ वह खूब हँसी-मज़ाक कर सके।

          एक दिन उसके एक सहकर्मी निशांत ने उसे बताया कि मेरे मामा का यहाँ पर बहुत बड़ा बिजनेस है।उनके दो बेटे हैं जो विवाहित हैं और एक बेटी पूजा है जो पढ़ी-लिखी है और सुंदर भी।तुम कहो तो उनसे तुम्हारे बारे में बात करुँ।वह तुरंत तैयार हो गया।
अगले ही दिन वह निशांत के साथ उसके मामा अश्विनी प्रसाद के घर चला गया।पूजा उसे पसंद आ गई और पूजा के घर वालों को भी प्रतीक पसंद आ गया।उसने अपने माता-पिता और अपनी बहन-बहनोई को बुलवा लिया और बड़ी धूमधाम से उसका विवाह पूजा के साथ सम्पन्न हो गया।
        विवाह के कुछ दिनों के बाद प्रतीक के माता-पिता अपने शहर लौट गये। तब पूजा के पिता उससे बोले कि हमारी इतनी बड़ी कोठी है, तुम दोनों भी यहीं आकर रहते तो मुझे खुशी होती।दरअसल वह चाहते थें उनकी बेटी-दामाद उनकी आँखों के सामने रहे।पूजा भी अपने घर की सुख- सुविधाओं की आदी हो चुकी थी तो उसने भी चलने की ज़िद की।
उसके लिये तो यह सुअवसर था,ससुराल में रहना, उसके सुख भोगना।इसलिए जब पूजा ने उससे कह तो वह सहर्ष तैयार हो गया।
        प्रतीक के पिता एक सरकारी मुलाज़िम थें,इसलिए वह बचपन से सरकारी क्वाटर में रहा था, इतनी बड़ी कोठी और शानो-शौकत वह पहली बार देख रहा था।
तीन-तीन नौकर उसकी सेवा में तैयार खड़े रहते थें।सुबह उठते ही बेड-टी मिलती थी।टेबल पर नाश्ता तैयार मिलता और शाम को घर वापिस आकर पत्नी-संग मौज-मस्ती।प्रतिदिन टेबल पर नये-नये व्यंजन रखे होते थें।छुट्टी के दिन साले-सलहजों से खूब हँसी-मज़ाक चलता,कभी-कभी तो पूजा की सहेलियाँ भी आ जाती थीं।
       यूँ कहे तो, प्रतीक के दिन मज़े में गुजर रहें थें।एक दिन कनाडा से छोटी भाभी का भाई आया था।उसके लिये स्पेशल ब्रेकफास्ट बनाकर डाइनिंग टेबल पर सजा दिया गया था।
उसे ऑफ़िस जाने की ज़ल्दी थी, इसलिये उसने खाना शुरु कर दिया।टेबल पर रखा एक डोंगे का ढ़क्कन उसने जैसे ही उठाया,तभी छोटी भाभी ने आकर उसके हाथ छीन लिया और हँसते हुए बोली,” ये मेरे भाई के लिये बना है।आप तो यहीं ही रहते हैं, फिर कभी खा लीजियेगा।” न जाने क्यों उसे ऐसा लगा जैसे छोटी भाभी ने उस पर व्यंग्य किया हो।
रविवार को हमेशा की तरह उसने ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहा तो उसने कह दिया कि छोटी मालकिन ने कहा है कि उनके भाई को घूमने जाना है।दूसरी गाड़ियाँ भी कहीं और जाने के लिए तैयार थीं।उस दिन उसे पूजा को अपनी मोटरसाइकिल पर ही बैठाकर घुमाना पड़ा।
         कुछ दिनों के बाद मुंबई से बड़ी भाभी के भैया-भाभी आयें।मुंबई में उनकी दो गारमेंट्स फ़ैक्ट्रियाँ थीं,ज़ाहिर था कि उनका विशेष आव-भगत होना था।प्रतीक तो वहीं रहता था, इसलिये उसे किनारे करके घर के सभी नौकरों-ड्राइवरों को  उनकी सेवा-टहल में लगा दिया गया जो उसे बहुत बुरा लगा।उसने पूजा से कहा तो वह बोली,” तुम भी ना प्रतीक…, आखिर वे बड़े भाभी के रिश्तेदार और हमारे मेहमान हैं।उनकी खातिर करना तो हमारी प्रायोर्टी(प्राथमिकता)है ना।”
      ” और मेरा सम्मान?” प्रतीक ने अपने मन में सोचा।ऑफ़िस में निशांत मिला तो उसने अपनी बात कही। निशांत बोला,” देखो प्रतीक, दामाद की इज़्जत ससुराल में तभी होती है जब वह मेहमान बनकर वहाँ आये-जाये।तुम तो वहीं रहने लगे थे तो….।” कहते-कहते निशांत चुप हो गया, तब तक प्रतीक का ज़मीर जाग गया था।
उसे ससुराल के सुख का सही अर्थ समझ आ गया था।घर आकर उसने अपना सामान पैक किया और पूजा को भी कहा कि तुम भी तैयार हो जाओ, हम लोग अपने घर में रहेंगे।सुनकर पूजा क्रोधित हो गई, बोली,” तुम्हारे उस दो कमरे के फ़्लैट में है ही क्या, तुम्हें जाना है तो जाओ, मैं नहीं….।” प्रतीक समझ गया और उसकी बात सुने बिना ही वहाँ से निकल गया।बाद में उसके ससुर ने फ़ोन करके उसे मनाने की कोशिश भी की, लेकिन उसने कहा,” मैं अपने घर में खुश हूँ।”
       जब भी पूजा प्रतीक को फ़ोन करती तो वह आने के लिए कहता और पूजा टाल जाती।एक दिन पूजा मार्केट गई थी, रास्ते में उसे याद आया कि टेलर को देने वाला कपड़ा तो वह घर भूल आई है।उसने ड्राइवर को वापस चलने को कहा।वह जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ने लगी, ड्राइंग रूम में बैठी उसकी छोटी भाभी ने सोचा कि उनकी बेटी नव्या है।
वो चिल्लाई, ” नव्या.. ,धीरे चलो।तेरी बुआ तो बिगड़ी हुई है ही, अब तू भी…।शादी हुए महीनों हो गये महारानी को, लेकिन यहाँ से जाने का नाम ही नहीं लेती।” सुनते ही पूजा ठिठक कर रुक गई।अपनी माँ के देहांत के बाद उसने अपनी भाभियों में ही अपनी माँ को देखा था लेकिन ये तो उसका भ्रम था जो आज….।किसी तरह से उसने अपनी रुलाई रोकी और उल्टे पाँव लौट गई।आज उसका मन प्रतीक के पास जाने के लिये बेचैन हो उठा।
        उसने ऑटोरिक्शा लिया और प्रतीक के पास जाकर उसके सीने-से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।प्रतीक ने उससे कुछ नहीं पूछा, पूजा की आँखों से बहते आँसुओं ने ही सब कुछ कह दिया था।अब पूजा वापस जाना नहीं चाहती थी लेकिन प्रतीक ने कहा,” अभी जाओ, कल मैं तुम्हें लेने आऊँगा।” पूजा के जाते ही उसने माँ को सारी बात बताई और कहा कि कुछ दिनों के लिए आप दोनों आ जाते तो…।”
    ” तू चिंता मत कर, अपनी बहू का स्वागत मैं ही करुँगी।”
          अगली दिन वह ऑफ़िस से हाफ़ डे की छुट्टी लेकर अपने ससुराल चला गया और पूजा को लेकर जब घर आया तो उसकी माँ ने बेटे-बहू की आरती उतार कर स्वागत किया।प्रतीक की माँ ने पूजा को चाय बनाना सिखाया।धीरे-धीरे पूजा अपनी सास से पूछ-पूछकर सब कुछ सीखने लगी।अब उसे अहसास होने लगा कि उसका असली घर तो यही है।
जहाँ सास-ससुर के कदम पड़े,वही जगह तो ससुराल है।उसका घर बेशक उसके मायके से बहुत छोटा था लेकिन प्यार और अपनेपन से तो भरा-पूरा था।यहाँ कोई उससे पूछने वाला नहीं कि कब तक रहोगी? कब जाओगी? यहाँ के हर सदस्यों से उसे कुछ भी कहने और कुछ भी सुनने का अधिकार था।
          पूजा बहुत खुश थी और एक दिन जब उसका जी मितलाया तो सास की अनुभवी आँखों ने सब समझ लिया।अगले दिन जब वह डाॅक्टर के पास गई तो उन्होंने उसकी प्रेग्नेंसी कन्फ़र्म कर दी।शाम को जब प्रतीक घर आया तो उसके पिता ने कहा,” बेटा, परिवार बढ़ रहा तो तीन कमरों का घर ले लो।पैसे कम पड़े तो मैं…।”
      “पापा, यही तो मैं बताने वाला था कि मैंने घर देख लिया है और अगले महीने उसमें शिफ़्ट हो जाएँगे।” कहते हुए प्रतीक ने पिता को नये फ़्लैट का एग्रीमेंट- पेपर दिखाया।
      पूजा के पिता ने ‘नाना’ बनने की खुशखबरी सुनी तो बेटी-दामाद को डिनर पर बुलाया।पिछली बातों को याद कर पूजा वहाँ जाना नहीं चाहती थी लेकिन प्रतीक ने समझाया कि रिश्तों की कटुता को मन से निकाल देने में ही समझदारी है।हर पिता की तरह तुम्हारे पापा भी तो अपनी बेटी को आशीर्वाद देना चाहते हैं।उनका मान तो हमें रखना ही चाहिए।
           दोनों भाभियों ने अपनी ननद- ननदोई की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी।उनके बच्चे भी फूफ़ाजी- फूफ़ा जी कहकर खूब आगे- पीछे घूमने लगे।तब प्रतीक को समझ आया कि ससुराल का सुख घर-जमाई बनकर नहीं बल्कि मेहमान बनकर कभी-कभी जाने से ही मिलता है।शायद इसीलिए दामाद को पाहुन कहा गया है।
“क्या सोच रहें हैं प्रतीक जी” बड़े साले के पूछने पर उसके विचारों की श्रृंखला टूटी, मुस्कुराते हुए बोला,” जी,कुछ नहीं।कल की मीटिंग के बारे में सोच रहा था कि कैसे सब मैनेज होगा, पूजा को डाॅक्टर के पास भी ले जाना है और..।”
     इतने में पूजा के पिता आकर बोले कि तुम दोनों एक दिन रुक तो जाओ, हम सभी को बहुत….। तो दोनों एक स्वर में बोले, ” नहीं…. वो..कुछ..।” अश्विनी प्रसाद की अनुभवी आँखों ने उनके मन के भावों को चेहरे पर पढ़    लिया था।बेटी के न रुकने का दुख तो उन्हें हुआ लेकिन इस बात की खुशी थी कि उनकी बेटी अपने घर के सुख और महत्त्व को समझने लगी थी।
                                   विभा गुप्ता
    # ससुराल                  स्वरचित
              ससुराल का महत्त्व जितना लड़की के लिये है,उतना ही लड़के के लिये भी होता है।लड़की का ससुराल उसका अपना घर होता है और लड़के का ससुराल उसके लिए एक अतिथि-गृह।

 

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