प्रीतिभोज – ऋतु अग्रवाल

   मेरे पापा मूलत: राजस्थानी है पर चूंकि लगभग 100 वर्ष पहले उनके दादाजी व्यापार के सिलसिले में दिल्ली आ गए थे तो हमें राजस्थानी व्यवहार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। जन्म से लेकर शिक्षा दीक्षा सब दिल्ली में ही हुई और पापा के बहुत सारे रिश्तेदार भी दिल्ली ही आ गए थे तो राजस्थान से संपर्क लगभग ना के बराबर था।

        काफी समय पहले पापा के दूर के रिश्तेदार (चाचा जी) की पोती के विवाह के अवसर पर जयपुर जाना हुआ। वहां विवाह के अवसर पर जो माहौल देखा, उसे याद करके आज भी मन भावविभोर हो उठता है।

          घर की सभी महिलाएं मटर छीलने में, अनाज साफ करने में और पुरुष हलवाई को सामान लाकर देने में व्यस्त थे। हमें सगाई में भी उपस्थित रहना था तो हम 3 दिन पहले ही वहां पहुंच गए थे। महिलाएं काम करने के साथ बन्ना-बन्नी और हंसी मजाक कर रही थी और पुरुषों की अपनी ही किस्सागोई हो रही थी। मन ही नहीं भर रहा था उन सब की बातें सुनकर।



          पर सबसे अच्छा लगा उनके यहां का प्रीतिभोज। जब सभी घरातियों और बरातियों को बाकायदा आसन पर बिठाकर पत्तल में जिताया गया। पांच सब्जियां,दही भल्ले, दो मीठे, दाल बाटी चूरमा, बस इतने ही भोज्य पदार्थ थे  पर सब इतना स्वादिष्ट कि आज भी मन हूक जाता है। उस पर परिवार के पुरुषों द्वारा इसरार करके खिलाना।

      मैंने पापा से कहा कि पापा असली प्रीतिभोज तो यही है जहां सब प्रेम से खिला रहे हैं और सब हंसी मजाक के साथ प्रेम से खा रहे हैं। अन्न की बर्बादी का तो चिह्न तक नहीं है वरना आजकल की शादियों  में पैसे और भोजन का कितना अपव्यय होता है।

        वर और वधू पक्ष का कितना खर्चा होता है? उस पर भी मेहमान दावत की निंदा करते हुए नजर आते हैं। जरा पूछिए तो कि वर और वधू पक्ष ने कितनी मेहनत और निवेश के बाद दावत का आयोजन किया होगा। यह मेरे स्वयं के अनुभव और विचार हैं।काश हम भी दिखावे से ऊपर उठकर इस प्रकार के विवाह समारोह का आनंद उठा पाएँ।

यह पूर्णतया मौलिक रचना है।

ऋतु अग्रवाल

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