पछतावा  – उमा वर्मा

 तुम को गये हुए आठ महीने बीत गए लेकिन एक पल भी ऐसा नहीं था जब तुम्हारी याद नहीं आई हो।कल अमावस्या था और जब जब अमावस्या आता है तो मेरी बेचैनी बढ़ती  जाती है ।क्या करें ।लोग कहते हैं कि अमावस्या को जब कोई जाता है तो बहुत अच्छा होता है ।पता नहीं क्या अच्छा था, क्या बुरा था ।लेकिन मेरे लिए बहुत कष्ट दायक है यह तिथि ।

तुम्हारे जाने के एक दिन पहले दिन भर वाट्स एप पर फोन हुआ था ।बहुत सारी बातें तुम ने कही।तुम ने कहा ” नाती नया सोफा खरीदा है, जाकर देख लीजिए ” मुझे लगा यह कौन सी बड़ी बात हुई, लोग तो सामान खरीदते ही हैं ।फिर सब का आफिस भी तो होता है ।मैं किस समय जाऊँ? लेकिन तुम बहुत उत्साहित थी।फिर तुम्हारा मन रखने के लिए मै तुम्हारे बेटे के पास गयी।वह थोड़ी ही दूर पर रहता था ।

तुम तो राँची चली गई थी ।शाम को सात बजे मै वहाँ गई ” अरे वाह! कितना सुन्दर सोफा है, तुम्हारी मम्मी बहुत खुश हो जायेंगी ” ” नहीं नानी, मम्मी की तबियत बहुत खराब हो गई है ” उसे नींद का इन्जेक्शन दिया गया है ।मैं बेचैन हो गई ।” क्या हुआ मम्मी को?” पेट में दर्द होने लगा था ।तुम्हारे बेटे ने कहा ।मेरा मन नहीं लगा ।मैं घर वापस लौट गई ।रात भर छटपटाने लगी थी ।जाते समय तुमने साथ चलने को कहा तो मैंने जाने से मना कर दिया ।बहुत पछतावा हुआ ।काश,चली जाती ।




सुबह सात बजे मैसज किया तुमको ” कैसी तबियत है? फोन करें?” कोई जवाब नहीं आया ।मेरी घबराहट बढ़ती गई ।लेकिन कोई उपाय नजर नहीं आया ।तुम राँची में, मै दिल्ली में ।दूरी भी तो बहुत थी।आज फिर पछतावा हुआ कि मैंने तुम को फोन क्यो नही किया, मेसेज क्यों किया ।कुछ तो उत्तर, कोई भी देता ।अब सिर्फ पछतावा होने से क्या हो सकता है ।

हर पल तुम्हारी याद मुझे बेचैन कर देतीं हैं ।रोज तुम मेसेज करती थी ” क्या हो रहा है?” खाना हो गया? सो गये? दिन रात तुम मेरी चिंता करती ।अब जब तुम नहीं हो, मै बालकनी में बैठती हूँ तो लगता है अभी आकर पूछोगी ” चाय पी लिए? बना देंगे? फिर मेरे बिना कहे तुम तुरंत चाय बना देती थी ।नीचे जाने का मन ही नहीं करता ।पार्क में जहां जाती हूँ तो लगता है तुम वहां बैठी थी मेरे साथ ।वहां बैठी,वहां बैठी।कोई तो ऐसी जगह नहीं है जहां हम,तुम एक साथ नहीं बैठे थे ।

कहाँ से लाए वह पल।क्यो चली गई थी तुम ।दो महीने तुम अपने बेटे के पास थी और हमारा रोज मिलना होता था ।तुम को जाना था शायद इसी लिए ईश्वर ने इतनी मोहलत दे दी थी ।मै यहाँ के लिए नयी थी।मेरे लिए यह जगह नया था ।तुम ने एक एक गली कूचे से मेरा परिचय कराया ।सब जगह साथ लेकर घूमने गयी ।हाट,बाजार, माल, अक्षरधाम सब जगह ।मेरे यहाँ आकर मेरे पसंदीदा खाना बनाया ।इन दो महीने में तुम ने अपनी जिंदगी भी अपने तरीके से, खूब खुश होकर बिताया ।

और क्यों न खुश होती ।अपने बेटे की जिंदगी सवारने की खातिर बारह साल तपस्या जो की थी तुम ने ।कितने कम उम्र में पति चले  गए थे लेकिन तुम ने हिम्मत बनाए रखा।भले ही रात में छिप कर रोती रही लेकिन न घर वालों को बताया न बेटे को।सिर्फ मै ही तो सब कुछ जानतीं थी।मैं माँ थी तुम्हारी ।माँ तो अपने बच्चों के हर परेशानी को तुरंत भांप लेती है न।




पति के न रहने पर स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली थी ।घर में बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया ।तुम अपना और अपने बेटे की परवरिश और जिम्मेदारी खुद निभाती रही ।अच्छा लगता है ।स्वाभिमान तो होना ही चाहिए ।वह तो तुम मे कूट कूट कर भरा था ।जब भी खाली बैठती हूँ तो पुराने पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं ।क्यों तुम चली गई बेटा? अपनी माँ को छोड़ कर? बेटे की शादी हो गई ।

तुम ने वह भी निबटा  दिया जल्दी ही ।असल में तुम को तो जाना था न? बेटा भी याद करेगा, लेकिन फिर अपनी दुनिया में मस्त हो जायेगा ।घर के लोग भी ठीक ठाक ही रहेंगे ।और मै? तुम्हारी माँ? कैसे ठीक रहें? काश तुम्हारे साथ चली जाती तो अंतिम समय मिल तो लेती।

बहुत पछतावा है मुझे इस बात का ।कलम उठा लेती हूँ ।यही एक रास्ता बचा है मेरे लिए ।तुम को अपने पास महसूस करने के लिए ।मेरे घर नन्हे मेहमान के आने की खुशी है सब को।सभी कहते हैं कि तुम ही आ रही हो ।क्या यह सच हो सकता है? किसी को नहीं पता ।मुझे भी नहीं ।लेकिन एक उम्मिद है ।शायद ।बस,तुम्हारी याद में, तुम्हारी माँ ।

उमा वर्मा, नोएडा ।स्वरचित ।अप्रकाशित ।

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