मजबूरी या तिरस्कार – आरती मिश्रा

शर्मा जी सुबह सुबह स्वच्छ और ताजी हवाखोरी करने रोजाना निकल जाया करते थे। अब वक्त बेवक्त मौसम की मार तो कोई जानता नहीं तो शर्मा जी भला कैसे जानते। ऐसे ही बेवक्त मौसम की मार से ही धोखा हुआ हो नहीं तो मजाल है कि हवाखोरी किसी भी वजह से टल जाए ।

एक दिन पार्क में टहलते हुए कूं कूं कूं कूं की धीमी आवाज उनके कानों में पड़ी। शर्मा जी ठिठक गए फिर ध्यान केंद्रित किया कि यह आवाज कहां से आ रही है उस दिशा में कदम बढ़ाने लगे। थोड़ी ही दूरी पर एक नन्हा सा पिल्ला ना जाने किस वजह से घायल पड़ा था। आस पास नजर दौडायी पर उस पिल्ले की मां नजर नहीं आयी। घर लौटते समय उन्होंने पिल्ले को भी साथ ले लिया । उसकी मरहम पट्टी कर खाने को रोटी डालकर घर के एक कोने में बिठा दिया। धीरे धीरे वह पिल्ला ठीक हो गया और घर के बाकी सदस्यों से भी घुल मिल गया। घर में शर्मा जी के पत्नी के अलावा उनके बेटे बहू भी थे। जिनके दो छोटे बच्चे थे । उन दोनों बच्चों के लिए तो खेलने के लिए घर पर ही साथी मिल गया था। तीनों मिलकर घर और बाहर धमाचौकड़ी मचाया करते। घर में रौनक हो जाया करती थी ।

एक सुबह शर्मा जी सब्जियां लाने बाजार गए जब लौटे तो उन्होनें सीने में दर्द महसूस किया आवाज लगाने ही वाले थेकि जमीन पर गिर पड़े धड़ाम की आवाज सुन घर के सभी लोग दौड़ पड़े उनकी ओर जल्दी से ऐंबुलेंस बुलायी गयी और शर्मा 1 जी को अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर ने चेकअप किया तो पता चला कि वो कोरोना से संक्रमित हो गये हैं। कुछ दिन अस्पताल में ही उनका इलाज चला फिर सावधानी बरतने की हिदायत देकर उन्हें उनके ही घर के एक खाली कमरे में क्वारटींन कर दिया गया

शर्मा जी बेचारे समझ ही नहीं पाये कि उन्हें किस बात की सजा मिली है। प्रधानाचार्य के पद से अवकाश प्राप्त हुआ था अतः एक अच्छे शिक्षक के गुण उनमें कूट कूट के भरे थे। प्रकृति के साथ सौहार्द बरतने की शिक्षा वह अपने हर छात्र को दिया करते। फिर वो कैसे इस बीमारी के चपेट में आ गये। यह सोच सोच कर मायूस हो जाते। उन्हें मालूम था इस प्रश्न का उत्तर मिलना मुमकिन नहीं।



शर्मा जी इस बात से ज्यादा मायूस थे कि बीमारी भी ऐसी लगी कि किसी से बोलना बतियाने तक पर पाबंदी और तो और घर वालों ने भी मुंह फेर लिया। सारे रिश्ते नाते की परीक्षा की घड़ी आ गयी थी। पड़ोस की काकी ने एक पूरा दिन बीत जाने पर शर्मा जी की पत्नी से उनका हाल पूछा तो पता चला कि कोई उन्हें संक्रमित हो जाने की डर से खाना भी देने नहीं जाता। पड़ोस कि काकी ने शर्मा जी की पत्नी को धिक्कारते हुए बहुत खरी खोटी सुनाई थी कि तुम बीवी होकर उन्हें कैसे भूखा सोते देख सकती हो, क्या इस दिन के लिए सात फेरे लिए थे. अरे शर्मा जी तो दस बीस दिन में ठीक हो ही जायेंगें तब तुम कौन सा मुंह लेकर जाओगी उनके सामने। अब शर्मा जी की पत्नी का मन ग्लानि से भर उठा तो उस दिन शर्मा जी के लिए भोजन लेकर दरवाजे तक गयी और वहीं से खाना सरका दिया। क्योंकि संक्रमित हो जाने का भय उनके मन से निकला नहीं था पर थोड़ी देर के लिए पत्नी धर्म याद आ गया था । शर्मा जी ने खुद को बड़ा तिरस्कृत समझा पर जिंदा रहने के लिए खाना भी जरूरी था गीली आंखों को सुखाया और खाना खा लिया ।

कुछ दिन बीत जाने पर जांच के लिए फिर से अस्पताल गये तो डाक्टर ने सकारात्मक जांच की पुष्टि के लिए वहीं रोक लिया। दो दिन बाद जब शर्मा जी अस्पताल से बाहर आए तो देखा कि उनका प्यारा पिल्ला वहीं इंतजार कर रहा था । शर्मा जी के आंखों से अविरल अश्रु धारा बह चली। शर्मा जी ने उसे साथ लिया और चल पड़े वहां जहां उन्हे अपमान न सहना पड़े। वह अपने घर नही लोटे

कुछ दिनों बाद अखबार में उनके नाम का पोस्ट छपा कि जो व्यक्ति शर्मा जी का पता बतायेगा उसे इनाम में चालीस था हजार रूपये मिलेंगे शर्मा जी के मुख पर जहरीली मुस्कान उभर आयी। यह वही रकम थे जितनी उनकी पेंशन थी। अखबार को एक तरफ कर पिल्ले पर प्यार से हाथ फिराया और आंखे बंद कर सोचने लगे, सगे संबंधियों को पालने से अच्छा है पिल्ले को पालना। कम से कम इन्हें तो मोल भाव नहीं आता । ये रूपये के लिए रिश्ता नहीं निभाते ।बस प्यार करते हैं और प्यार चाहते हैं।

इंसान को अपने उन करीबियों से दूर रहना चाहिए जो आप से नहीं आपके पैसों से मोह रखते हों।

 समाप्त 

#तिरस्कार 

आरती मिश्रा, वाराणसी।

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!