जन्मों का संबंध (भाग 1)- पुरुषोत्तम : hindi stories with moral

hindi stories with moral : सुरभी घर की दुलारी थी और हो भी क्यों न चार भाई-बहनों में सबसे छोटी जो थी। सभी उसपर लट्टू रहते थे। सारिका सबसे बड़ी, अभी हाल में उसकी शादी हुई थी। शादी के बाद जब से मायके आई थी तबसे ससुराल वाले जिद लगाये हुए थे कि बहु को भेजा दे। पहले तो लड़के वालों को लड़की पसंद कराने के लिए जमीन-आसमान एक करना पड़ता था, सौ-सौ एब निकाले जाते थे; लेकिन एक बार जो शादी हो जाए दुल्हन को दो-चार दिन भी मायके ठहरने देने में गैर लगता है। लेकिन दो-चार दिन करते-करते सारिका छः महीने से मायके में थी। माँ-पिताजी अब और कितना टाल-मटौल करते आखिर उन्हें बेटी को उसके ससुराल भेजने पर राजी होना पड़ा।

लेकिन सुरभी का क्या करे वह तो अपनी प्यारी दीदी जिसके साथ हर सुबह और शाम देखी थी, हर दोपहर और रात बतियाया करती थी वह दीदी को उससे दूर कहीं ओर भेजे जाने के नाम पर तुनक उठी थी। आखिर कर उसे माँ ने बड़ी दुलार से मनाया और कहा कि सब दिन के लिए थोड़े ही जा रही है और फिर जाने से पहले जीजाजी उसे शहर घुमाने ले जाएंगे और सिनेमा भी दिखाएंगे। सुरभी अब इतनी भी बच्ची नहीं थी कि न समझ पाए कि जो ससुराल चली जाए वह वहीं की होकर रह जाती है। लेकिन  सिनेमा के नाम से सुरभी चहक उठी। किशोर हो रही सुरभी के मन में कब से था कि वह शहर जाकर सबके साथ सिनेमा देखे। और अभी तो शंकर टाॅकीज में सबसे सुपरहिट फिल्म लगी थी ‘मैंने प्यार किया’। दोनों बहनें छत पर बैठकर कबूतरों को दाना डालते हुए खुब जुगलबंदी करती- कबूतर जा-जा-जा, कबूतर जा-जा-जा, पहले प्यार की….।

बिदागरी की घड़ी आ गई थी लेकिन विदा कराने आया था प्रमोद का भाई प्रकाश। गुम-सुम प्रकाश आने के साथ भाभी के माता-पिता के चरण छुए और उसके कमरे में पलंग पर चुपचाप जाकर बैठ गया। न किसी से बोलना न बतियाना। प्रमोद जीजा को छुट्टी नहीं मिली तो उसके बदले उसके भाई को रस्म के लिए पठा दिया गया, अभी जो विदाई नहीं होती फिर शुभ दिन जल्दी नहीं था। सुरभि को न जाने क्यों अपने साथ हो रहे धोखे का अहसास हुआ। दीदी भी जा रही है और सिनेमा भी नहीं, जीजा के साथ घुमना फिरना भी नहीं। उसका किशोर मन प्रतिकार कर उठा। उसने न आव देखी न ताव। सीधा पहुँची प्रकाश के पास।

“तुम यहाँ आये हो दीदी के लिवाने न। जाओ सबके तरफ से मैं कहती हूँ कि दीदी तुम्हारे साथ नहीं जायेगी। भैया क्या बाबुल के पैर दबा रहा है जो तुमको भेज दिया।”

“प्रकाश के लिए यह बिलकुल अप्रत्याशित था। तीखे नैन नक्श के आगे उसकी जुबान सटक कर रह गई।

“सुरभि क्यों बेचारे पर बरस रही है अभी तो आया है हाथ-पैर धोने के लिए पानी क्या देगी उलटे? थके-हारे बेचारा आकर अभी सुस्ताया भी नहीं है।” माँ ने पिछे से मुँहफट बेटी को झिड़की लगायी।

“माँ मैंने एक बार जो कह दिया तो कह दिया। दीदी इस अनबोले के साथ नहीं जाएगी बस।”

“दीदी नहीं वो तो तुझे लेने आया है बोलो तो तुम्हें भेज दूँ इसके साथ।”

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जन्मों का संबंध (भाग 2 ) – पुरुषोत्तम : hindi stories with moral

–पुरुषोत्तम

(यह मेरी स्वरचित और मौलिक रचना है।)

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