होई है वही जो राम रची राखा – डॉ संगीता अग्रवाल   : Moral stories in hindi

“माँ,माँ,मैं भी पढ़ने जाऊंगी भैया की तरह”,नन्ही सोना ने बहुत देर से रट लगा रखी थी।

उसकी माँ लक्ष्मी थोड़ी देर सुनती रही फिर उसे डांटते हुए बोली:”कितनी बार कहा है लाली,तू मोड़ी है,और मोड़ियाँ हमारे घर पढ़ती नहीं।तुझे भी मेरी तरह चौका बर्तन ही करना है जिंदगी भर।”

सोना को उसकी कोई बात समझ न आती और वो जोर जोर से रोने लगती।

सोना अपने भाई से दो साल छोटी थी,जब से लक्ष्मी ने अपने बेटे का एड्मिशन शहर के स्कूल में कराया था,उसे बस लेने आती,उसकी चमकती स्कूल ड्रेस,नया बस्ता,ढेर सारी कॉपी किताबें नन्ही सोना को बहुत अच्छी लगतीं।

लेकिन न तो उसका भाई और न ही उसकी माँ उसे उन सबको छूने देते।कभी छिप कर वो उन्हें प्यार से सहलाती,पन्ने पलटती और रंग बिरंगे चित्र देख खुश होती।

आज भी लक्ष्मी पहले बेटे को स्कूल बस में बैठा कर सोना का हाथ पकड़ जल्दी जल्दी काम पर जा रही थी।सोना सुबक के रोती हुई  उसके साथ घिसटती जा रही थी

“बड़ी देर कर दी आने में ,लक्ष्मी!,मालकिन बोली,और तेरी बेटी क्यों रोती रहती है हरदम?”

“अरे, ये मेरे बेटे के संग पढ़ने जाने की जिद करती है,अब आप ही बताओ,इसे पढा लिखा के क्या करूंगी जब इसे बाद में काम ही करना है मेरी तरह”,लक्ष्मी बोली

“ये तो गलत बात है,तेरी बेटी की पढ़ने में रुचि है तो इसे भी भेजो,इसका सारा खर्च मैं उठाउंगी”, मालकिन बोलीं।

लक्ष्मी की आंखों में चमक आ गयी ये सुनकर,बोली,”अपने आदमी से पूछ कर बताऊंगी आपको,वो भी इसे पढाने के खिलाफ है न तो क्या कहूँ?”

अगले दिन लक्ष्मी आयी तो उसकी आंखें सूजी हुई,होठ थोड़ा कटा सा था,कहीं कहीं नील के निशान थे।

उसने बताया कल उसके मर्द ने शराब पीकर उसे खूब पीटा था और लड़की की पढ़ाई की बात सुन चीखने लगा था।उसका कहना था कि एक लड़के को पढा के बड़े तीर मार रही है जो अब लड़की  की पढ़ाई में भी पैसे बर्बाद करेगी।

ये तो कोई बात नहीं हुई?क्या वो खुदा है जो निर्णय लेगा इस बच्ची के भाग्य का,अगर उसकी तकदीर में पढ़ना लिखा है तो वो पढ़ के रहेगी,मालकिन तैश में बोलीं।

ऐसी बातें आप का सकती हैं मालकिन,हम गरीब नहीं,हमारे तो भाग्य विधाता हमारे घरवाले ही होते हैं,आज कहा तो हड्डियां तोड़ दी मार कर,कल को मेरी बेटी को भी पीटेगा वो कसाई।

मालकिन को उसपर बड़ा तरस आया कि इन औरतों की भी कितनी कठिन जिंदगी है,सारे दिन काम करते खटती हैं,रात में आदमियों से पिटती हैं,बेचारी ये छोटी बच्ची भी कल को ये ही सब दोहराएगी अपनी जिंदगी में।

उसने लक्ष्मी को कुछ दिनों बाद एक सुझाव दिया कि तू अपनी लड़की को मुझे दे दे,मैं इससे घर का काम पहले सिखाऊंगी ,फिर करवाउंगी और साथ ही साथ खुद पढ़ाऊंगी भी।इसकी कमाई हर महीने तुम लोगों को देती रहूंगी।

पहले तो लक्ष्मी घबरा गई कि ये बात ठीक है या नहीं ?पर बहुत सोच के उसने हामी भर दी,वो जानती थी कि उसका पति कितना क्रूर है,कहीं पैसे के लालच में बेटी को बेच ही न दे,कम से कम मालकिन के साथ वो सुरक्षित तो रहेगी।

उसने अपने पति को फुसला लिया ये कहकर कि मालकिन उसे नौकर बना के रखेंगी और काफी अच्छा पैसा देंगी,पैसे के लालच में वो चुप रहा,उसे तो पीने  से मतलब था जिसके लिए पैसा चाहिए था।

मालकिन और उनके पति बहुत भले थे,कितने वर्षों से वो इनके यहां काम कर रही थी।

धीरे धीरे उसकी बेटी भी पढ़ना सीखने लगी और अब उसके रंग ढंग भी बदलने लगे थे,वो अच्छे कपड़ो में,पौष्टिक खा कर बहुत सुन्दर दिखने लगी थी।

एक दिन मालकिन ने बताया कि उनके हसबैंड का ट्रांसफर दूर शहर में हो गया और जल्दी ही वो यहां से चले जायेंगे।

पल भर को लक्ष्मी को लगा कि उसकी बेटी उससे दूर हो जाएगी पर उसके अच्छे भविष्य की खातिर उसने दिल पर पत्थर रख उनके साथ ही भेज दिया।

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आज लक्ष्मी को अपनी बेटी को देखे 15 साल से भी ज्यादा हो गए थे,शुरू शुरू में तो मालकिन कुछ साल उसे उससे मिलवाती रहीं थीं पर फिर शायद वो कहीं विदेश जा रही थीं जब उसे काफी सारे रुपये देकर वो लोग चले गए थे।

लक्ष्मी का पति किसी से झगड़े के चक्कर मे कुछ वर्ष से जेल की सज़ा काट रहा था और उसका बेटा बहु उससे बहुत बुरा व्यवहार करते थे। उसने बेटे की पढ़ाई में कितना रुपया फूंका पर वो अव्वल दर्जे का आवारा,पियक्कड़ और कामचोर बना,उसकी सारी आदतें अपने बाप पर गयी थीं और जबसे उसकी बहु भी आ गयी थी,वो दोनों मिलकर लक्ष्मी को बहुत सताते।

लक्ष्मी बीमार रहने लगी थी,लगातार खांसी रहने से और बुखार न टूटने के कारण वो काफी बूढ़ी दिखने लगी थी।अकेले में होती तो खूब रोती और सोचती कि मैंने अपनी लड़की से कभी अच्छा व्यवहार न किया और आज मैं उसकी शक्ल भी नही देख सकती।पता नहीं मैडम के साथ वो कैसी होगी?

उस दिन सुबह वो अपनी अंधेरी कोठरी में छोटे से खटोले पर पड़ी पड़ी खांस रही थी और अपने भाग को कोस रही थी कि उसके घर के बाहर कोई बड़ी गाड़ी रुकी।

उसने अधखुली आंखों से देखा कि बड़ी सुंदर सी लड़की,गोरी,लंबी,सिल्क की साड़ी पहने गले में आला लटकाए उसे देखने आई है,वो आश्चर्य में डूबी उसे टकटकी लगाए देखने लगी कि ये किसने आखिर मेरे लिए आज डॉक्टर बुलाया है।

लड़की ने उसका परीक्षण किया और कुछ दवाइयां लिखीं।

वो मंत्रमुग्ध हो उसे देखे ही जा रही थी और यंत्रवत जो पूछा जा रहा था,उसका जबाव दे रही थी।

थोड़ी देर में एक अन्य महिला अंदर आयी और लक्ष्मी ने अपने दिमाग पर जोर डाल कर खुशी में चिल्लाते हुए से कहा:”मालकिन आप?लक्ष्मी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।

कांपती आवाज में उसने अपनी बेटी के लिए पूछा

मालकिन ने मुस्कराते हुए कहा: “अपने खून को नही पहचानी तुम?”

लक्ष्मी फटी आंखों से उस डॉक्टर को निहारने लगी,”क्या??ये मेरी सोना है”,उसे विश्वास नही हो पा रहा था।

दोनों माँ बेटी लिपट के रो रहीं थीं,आज लक्ष्मी की बेटी अपनी पढ़ाई के दम पर अपने पैरीं पर खड़ी थी और इस काबिल हो चुकी थी कि अपना और अपनी माँ का अच्छे से ख्याल रख सके।

उसके पिता ने लाख कोशिश की थी उसे अनपढ़ बनाए रखने की लेकिन उसकी किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था,उसे पढ़ना था,डॉक्टर बनना था और अपनी मां का ख्याल रखना था।इस सब काम के लिए बानक बनी मालकिन लेकिन आज  लक्ष्मी देख रही थी उस विधाता के खेल जिसकी रचना अभेध होती है।लक्ष्मी का बाप,अपने लड़के को सब कुछ देकर भी आवारा बनने से न रोक सका जबकि उसके सौतेले व्यवहार के रहते भी उसकी बेटी सोना,पढ़ लिख कर मशहूर डॉक्टर और एक अच्छी इंसान बन चुकी थी।

डॉ संगीता अग्रवाल

वैशाली,गाजियाबाद

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