अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 5 ) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : “बेटा, एक बात और, तेरी सासु माॅं को जब लगेगा कि तुम उनके आगे पीछे घूम रही हो तो वो तुम्हें शंका की नजर से दिखेंगी कि जब उन्हें कोई पसंद नहीं कर रहा तो तुम क्यों। आखिर तुम्हारा स्वार्थ क्या है, ये सब वो सोचेंगी। तब हो सकता है वो अपनी बोली से अग्नि वर्षा करें, तुम्हारे हृदय को आहत करें। तब तुम्हें उनके व्यंग्य बाणों से खुद को संभालना होगा।” गाड़ी के अंदर बैठती हुई विनया से संध्या कहती है।

“ठीक है मम्मी, लेट्स सी।” कहती हुई विनया गाड़ी में बैठ गई।

“समझदार हो गई है हमारी बेटी।” ऑंखों में आ गए नीर को पोछते हुए श्याम जी कहते हैं।

“यही संवेदनशीलता तो उसे औरों से अलग खड़ा करता है।” संध्या बहू दीपिका के साथ घर के अंदर आती हुई कहती है।

“अंदर आने नहीं कहेगी।” रास्ते भर तरह तरह की परिस्थिति पर बातें करने के बाद भी सौरभ बहन के साथ मजाक करता हुआ पूछता है।

“भैया, फिर। अभी बस मैं और माॅं।” जवाब में ऑंखें तरेरती और मुक्का बनाकर दिखाती हुई विनया कहती है।

“विजयी भव: बालिके।” हॅंस कर गाड़ी स्टार्ट करता हुआ सौरभ कहता है।

अब सब कोई तैयार हो जाइए। अब तो मैं आप सब के दिमाग की घंटी भी बजाऊॅंगी और बाती भी जलाऊॅंगी।” घर के बाहर लगी घंटी पर उंगली लगाती हुई विनया के अधर पर मुस्कान खेल उठी।

“हमें तो लगा था अब तुम सुबह ही आओगी।” पति मनीष के साथ घर के अंदर आती हुई विनया के कान में मनीष की आवाज गई।

“नहीं, एक शहर में हैं आना जाना तो लगा ही रहेगा, यही सोचकर…” 

“तुम औरतों के यही चौंचलें मुझे पसंद नहीं है। जब देखो तब मायके चल देना। इतना ही था तो शादी की क्या जरूरत थी।” विनया के सारे शब्द अभी बाहर भी नहीं आए थे कि मनीष ने अपने सारे विचार उड़ेल कर रख दिए।

विनया आगे कुछ कहना तो चाहती थी लेकिन उसकी नजर अपनी सासु माॅं पर पड़ी जो अभी रात के खाए बर्तनों को टेबल पर से समेट रही थी। विनया मनीष को छोड़ सासु माॅं की ओर बढ़ गई।

“लाइए माॅं, मैं कर लेती माॅं।” कहती हुई विनया अपनी सासु माॅं अंजना के हाथ से बर्तन लेने लगी।

“नहीं ठीक है, मैं खुद ही कर लूॅंगी।” तल्खी का पुट लिए स्वर में विनया की ओर देखे बिना कहती है।

“आज तक तो अकेली ही सब ढो रही हैं ना माॅं, अब एक घर की दूसरी बहू भी आ गई है तो दोनों मिलकर करेंगी।” ये सुनकर अंजना के ढीले पड़ गए हाथ से विनया बर्तन ले लेती है और अंजना अकचका कर विनया की ओर देखने लगती है या यूं कहें उसकी कही बातों का मतलब पढ़ने की कोशिश करती है।

“बहू तुम्हारी मम्मी कैसी हैं अब।” जो सवाल सबसे पहले मनीष और अंजना को करना चाहिए था, वो सवाल कमरे से निकलते हुए ससुर जी करते हैं।

विनया भी थोड़ी अचंभित हो गई थी क्योंकि उसने सोचा था औपचरिकतावश ही सही मनीष मम्मी का हाल चाल तो जरूर लेंगे। अब तक तो कम से कम ये तो जान ही गए होंगे कि मम्मी गिर गई थी और उन्हें ही देखने विनया गई थी। लेकिन जब पापा की बात सुनकर मनीष ने पूछा कि क्या हुआ है मम्मी को तो विनया के लिए ये हैरत में डाल देने वाली बात थी। क्या घर का कोई सदस्य घर में ना हो तो तो ये लोग क्या उसके बारे में कुछ जानना भी नहीं चाहते हैं।

“चलो ठीक है चोट नहीं आई, नहीं तो बेवजह का तमाशा होता रहता।” मनीष सब ठीक है सुनकर विनया का दामन काॅंटों से भर देता है।

और संपदा ने तो कमरे से बाहर निकलना भी जरूरी नहीं समझा था। भिन्न परिस्थिति से आने के कारण ये सब उसके लिए आश्चर्य पर आश्चर्य दे रहा था। ऐसा नहीं था की रिश्तेदारी में या आस पड़ोस या समाज में उसके अपने घर के विपरीत व्यवहार या स्वभाव के लोग नहीं देखे थे। लेकिन फिर भी इतनी दूरियाॅं हो सकती हैं, ये उसकी कल्पना के परे था। उसके घर के वातावरण को देखकर उसकी सहेलियाॅं भी कभी कभी उसकी किस्मत से रश्क कर बैठती थी, जिसे वो ये कहकर हॅंसी में टाल देती थी कि खुद का व्यवहार ठीक रखो तो सब ठीक रहता है। लेकिन यहाॅं विनया को अपना यह तर्क किसी काम का नहीं लग रहा था। उसे सासु माॅं ही नहीं सभी अवसाद से ही घिरे दिख रहे थे। एक दूसरे से नजरें चुराना और दिल की बात ना कर पाना मुख्य वजह है, फिलहाल उसने यही समझा था।

इसी उहापोह उधरबुन को वो गुन रही थी और अंजना अपने लिए प्लेट में खाना निकाल रही थी। प्लेट में खाना देखते ही विनया के पेट के शेर चीते उधम मचाने में लगे थे। उसे याद आया कि इन चर्चाओं के बीच उसने पकौड़े भी नहीं खाए थे और मायके से रात में आई है तो सासु माॅं सोच रही होंगी कि वो भोजन करके ही आई होगी।

अंजना के रसोई से निकलने से पहले उसने जल्दी से फ्रिज खोल कर देखा और गूंथा हुआ आटा और उबला आलू देख खुश हो गई। जितनी तेजी से उसने फ्रिज खोला था, उतनी ही तेजी से वो आटा और आलू के बर्तन को किचेन कैबिनेट पर रखती है। इन सबके पीछे उसका मकसद मात्र इतना था कि अंजना ये जाने की वो बिना डिनर किए आई है और जब तक विनया पराठें बनाती है, तब तक वो उसका इंतजार कर लें। अभी हर हाल में विनया डिनर अंजना के साथ ही करना चाहती थी। इतने दिनों में उसने कई बार कोशिश की थी लेकिन अंजना के द्वारा दी गई ठंडी प्रतिक्रिया उसे भी ठंडी कर जाती थी लेकिन आज मम्मी पापा के नसीहतों ने उसमें एक गर्माहट भर दिया था।

“ये सब अभी क्यों निकाल रही हो।”और अंजना की प्रतिक्रिया शुष्क स्वर में आई , जिसे सुन विनया का मन झूम उठा, चली माॅं ने नोटिस तो किया।

“फिर से मुझे सब अंदर रखना पड़ेगा। यूं भी रात में दस बार उठ कर आना पड़ता है मुझे, पता नहीं मैंने क्या क्या बाहर छोड़ा होगा।” विनया के कुछ बोलने से पहले ही फ्रिज में रखने के आलू के बर्तन को अंजना ने उठा लिया।

“माॅं, माॅं, पराठा बनाना है, मुझे जोरों की भूख लगी है।” विनया कटोरा लेती हुई अंजना के हाथों को जानबूझकर थामती हुई कातर स्वर में कहती है।

विनया के इस तरह हाथ थाम लेने पर क्रोधित दृष्टि से विनया को देखती अंजना हाथ खींच कर कटोरा कैबिनेट पर रख कर अपना प्लेट उठाकर किचन से बाहर निकल गई।

आरती झा आद्या

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