अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 28) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

“ये तुम क्या कह रही हो बेटा, ये सही नहीं है। घर के सारे लोग परेशान हो जाएंगे बेटा फिर कोयल और संभव भी यही हैं। अच्छा नहीं लगेगा ये सब।” विनया की बात सुनते ही लेटी हुई अंजना उठ कर बैठ गई।

“इसमें बुराई क्या है माॅं। हम सब तो होंगे ही यहाॅं, कोई दिक्कत नहीं होगी।” विनया भी उठ कर बैठ गई थी और फुसफुसाते हुए कह रही थी।

“लाइट ऑन मत कीजिए माॅं।” अंजना के हाथ को रोकती हुई विनया कहती है।

“नहीं ऐसा मैं नहीं कर सकूॅंगी बेटा। अभी तुम्हारी छोटी उम्र है बेटा, तुम अपनी गृहस्थी संभालो। मैं नहीं चाहती कि मेरी तरह तुम्हारी गृहस्थी भी बिखरे। इसलिए तुम अपने और मनीष का रिश्ता मजबूत करने पर ध्यान दो…ऊं।” विनया की ओर ममता भरी नजरों से देखती अंजना कहती है।

इस गहराती रात्रि में अंजना ने विनया को माँ की भूमिका में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। वह विनया से कहती है कि वह चाहती है कि वह अपने परिवार के साथ खुश और सुरक्षित रहे और उसे उसकी गृहस्थी को संभालने के लिए समर्पित रहना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि अंजना अपनी बहू को दुनिया के विभिन्न पहलुओं के प्रति सजग बनाए रखने के लिए प्रेरित कर रही है और उसे एक मजबूत और सुरक्षित जीवन जीने के लिए साहसिक कदम उठाने कह रही है। वह न केवल यह चाहती है कि विनया अपने जीवन के प्रति जिम्मेदार बने बल्कि उसे एक महिला के रूप में सशक्त और स्वतंत्रता से जीने के लिए प्रेरित करती है। इस दृष्टि से अंजना ने विनया को एक अगले मार्ग पर अग्रसर करने के लिए उत्साहित किया है और उसे उसके सभी सपनों की पूर्ति के लिए पग बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही है।

माॅं, आपके बिना कैसी और कौन सी गृहस्थी। आप और पापा तो इस घर गृहस्थी के पिलर हैं। अंधेरे में भले ही विनया के चेहरे के भाव स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। लेकिन अंजना के प्रति अपने भाव व्यक्त करती हुई उसकी ऑंखों को चमक बढ़ गई थी, जिसे अंजना भी अंधेरे में भी महसूस कर रही थी।

विनया की आँखों की चमक, अंजना के चेहरे पर सान्त्वना और दोनों के बीच की गहरी समझ ने दिखाया कि सास–बहू के रिश्ते में एक नई ऊर्जा का संबंध निरंतर प्रवाहित हो रहा है। उनके बीच की साझेदारी, समर्थन और प्रेम की शक्ति घर में एक सुरक्षित और सजीव माहौल बनाने लगा था। इस पल में विनया और अंजना का संबंध एक नए स्तर पर पहुॅंच रहा था।

“माॅं, कहीं आपको मेरे इस आइडिया की असफलता का डर तो नहीं है। क्या इसी कारण तो आप मना नहीं कर रही हैं। नहीं तो कौन सी नारी मायके जाने को मना करती है। हमारे इस जमाने में भी जब लड़के भी और लड़की भी किसी और प्रदेश में जाकर रहते हो। बड़ी बड़ी पोजीशन पर चली गई हो, लेकिन मायके का नाम लेते ही वही की होकर रह जाती है और सुलोचना बुआ कह रही थी कि एक युग बीत गया आपको अपने मायके गए हुए। यही आकार सब मिल जाते हैं, लेकिन आपका भी तो मन करता होगा ना वो हवा, वो पानी, धूल, वो मिट्टी, वो आसमान का एक टुकड़ा, वो यादें फिर से दिल से उतार लेने का, फिर से बच्ची अंजना बनकर अमिया की डाल पकड़ कर झूम जाने का। यहाॅं भी तो कई बार आप उदास होने पर अपने घर के बाहर जो आम का पेड़ है, उसके नीचे उसकी डाल पकड़ कर ऐसे खड़े रहना, जैसे किसी अपने का हाथ पकड़ कर उदासी बाॅंट रही हों.. है ना माॅं।”

विनया रात्रि की निस्तब्धता को तोड़ती बार–बार अंजना से सवाल पूछती अपने विचारों और आईडिया की सफलता के बारे में स्वीकृति और समर्थन प्राप्त करने का दृढ़ प्रयास कर रही थी।

“तुम्हें अमिया की डाल का झूला, ये सब क्या सुलोचना ने बताया।” अंधेरे में भी विनया ने महसूस किया कि अंजना के दृग उन दृश्यों का फिर से रसपान करने लगे और पूछते हुए भी अंजना की आवाज थरथरा गई थी।

अंजना और विनया के बीच का इस क्षण में भरपूर भावनाओं और संवेदनाओं का संघटन हो रहा था। अंजना की आँखों में अपनी जीवन की कई महत्वपूर्ण क्षणों की झलकें थीं, जिन्हें विनया ही उसके साथ साझा कर रही थी। 

विनया अंजना की ओर देखकर रहस्यमयी अंदाज में कहना प्रारंभ करती है, “ना आपकी बेटी ने बताया माॅं कि आप कबूतरों के पीछे भागने की कहानी उन्हें सुनाया करती थी। आम की डाल पकड़ कर झूलती रहती थी। गर्मी की दोपहर जब पूरा घर सोया होता था तो आप चारदीवारी फाॅंद कर मटर की छीमी तोड़ कर खाती थी और फिर पेट दर्द से पूरे घर को परेशान कर देती थी।”

“संपदा ने बताया, उसे याद है ये सब, मुझे तो लगा था।” अंजना की आवाज में एक आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता थी।

अंजना की आवाज में उमड़ती आश्चर्यजनक प्रसन्नता ने दिखाया कि वह संपदा के शब्दों में छिपी यादों की तह को महसूस कर उसका हृदय समंदर की लहरों की तरह हिलोरें ले रहा थी। अंजना की आवाज में बचपन की मुलाकातों की ताजगी छू रही थी। उसकी ध्वनि में छिपी खुशी और आनंद उसे बचपन की यादों के माहौल में ले जाने का आभास करा रही थी। 

“माॅं, सच कहूॅं तो आपके बच्चों को सब याद है, बस आपके ऑंचल की छाॅंव की कमी है। संपदा दीदी के सिर पर जैसे ही ये छाॅंव पड़ी, तूफानों ने अपना रास्ता बदल लिया और दीदी काले बादलों के बीच से निकल कर सही सलामत आपके आगोश में समा गई, उसी तरह जिस दिन आप अपने ऑंचल में अपने बेटे को ले लेंगी तो वो और दीदी आपके आजू बाजू में बैठे दुनिया की बाजा बजा देंगे।” विनया अंजना को उसके मातृत्व का अहसास कराती हुई कहती है।

अंजना के अंदर भावनाओं का उछाल एक समृद्धि से भर गया था, जो उसके बच्चों के साथ होने वाले पुनर्मिलन की कल्पना से परिपूर्ण था। उसकी आँखों में हर्ष, उत्साह और प्रेम की चमक थी। अंजना के अंदर अपने बच्चों का उसके अगल बगल बैठे होने की कल्पना मात्र से एक सिहरन सी हो गई, जिसे अंजना का हाथ पकड़े बैठी विनया ने भी महसूस किया और वह मुस्कुरा कर जानबूझकर पूछ उठी, “क्या हुआ माॅं, ठंड लग रही है क्या?”

“बेटा, तुमने जो स्वप्न दिखाया, उसकी कल्पना से ही मैं रोमांचित हो उठी। अगर सच में कभी ऐसा हो गया तो क्या मैं बर्दाश्त कर सकूॅंगी। दोनों जब छोटे थे ना, तो ऐसे ही हर वक्त मेरे बगल में ही होते थे और तुम्हारे पापा जी इस बात पर हॅंसते रहते थे कि इन दोनों की सम्पूर्ण दुनिया तो तुम्हारी गोद ही है। क्या समय था वो भी, अब तो लगता है मैं कहीं किसी मोड़ पर इन सबसे छूट गई और”…. अतीत के ताने बाने में खुद को उलझाती अंजना के शब्द मुॅंह में रह गए और नेत्रों से गंगा यमुना की बरसात होने लगी।

जब कुछ देर बाद अंजना के रोने का गुबार रुका और वो अपने साड़ी के ऑंचल के कोन से ऑंखों को पोछने लगी, तब विनया एक आशा भरी नजर से अंजना को देखती हुई कहती है, “माॅं, फिर से वो दिन वापस आ जाएंगे। आप थोड़ी हिम्मत तो दिखाइए। हमें भी तो अपनी व्यथाओं को समाप्त करने के लिए कुछ जिम्मेदारी उठानी ही होगी ना। लड़ाई झगड़ा ना तो आपके स्वभाव में है, ना ही मेरे…लेकिन ये घर ये परिवार तो हमारा है ना। इसे आधार देना, इसकी नींव बनना हमारा कर्तव्य है ना माॅं। उसने बहू के रूप में अपने उत्साह और साहस को दिखाते हुए कहा कि जीवन में हमें कभी-कभी मुश्किलाएं आती हैं, लेकिन उससे भागना समाधान तो नहीं है ना, हम मिलकर उसका सामना तो कर ही सकते हैं।”

अंजना के ऑंसुओं की बूंदें नीले रंग की साड़ी के ऊपर गिर रही थीं, जैसे बर्फ गिर कर पिघलने के लिए आतुर हो रहा हो। उसके चेहरे पर दिखाई देने वाली आभा, उसके ऑंसुओं के दाग से चेहरे पर गई लकीरें नए उम्मीदों की मुस्कान की ओर संकेत कर रही थी। विनया ने भी उसके साथ सहभागिता का इजहार किया और उनका मिलन स्वार्थ से विलग भावनाओं के साथ घिरा था। यह नया आरंभ उनके बीच साझेदारी और समर्थन की एक नई दृष्टि दिखा रहा था, जिसने इस परिवार को मजबूती और एकता की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकेत दिया।

“तो आप मायके जा रही हैं।” विनया का भाव सशंकित था क्योंकि जिस दृढ़ता से अंजना ने मना किया था, उससे विनया आश्वस्त नहीं थी कि अंजना इस विचार पर सहमति देगी।

“नहीं, ये किसने कहा।” अंजना चिहुंक कर कहती है।

“नहीं ये सार्थक प्रयास नहीं होगा बेटा, क्योंकि वापस तो यही आना है ना और तुमने कहा ना समस्या से भागना समाधान नहीं है। कितने दिन के लिए जाना होगा, पंद्रह दिन, एक महीना, दो महीना, उसके बाद…मैं तुम्हारे साथ हूॅं बेटा, इसलिए हम कोई और उपाय सोचें क्या।” अंजना विनया को उसके विचार के बारे में विस्तृत कर बताती हुई साफ़ तौर से जाहिर करती है कि उसका साथ और समर्थन विनया के साथ है।

अंजना की मुश्किल समस्या के सामने विनया ने एक साहसी और सहानुभूति भरे तरीके से उसके साथी बनने का आदान-प्रदान किया। अंजना के शब्दों में निहित आशीर्वाद और समर्थन ने विनया को एक सुरक्षित साथ का अहसास कराया,  जिससे समस्या का समाधान ढूँढ़ने की क्षमता में वृद्धि हुई। इस प्रकार, विनया ने सहानुभूति और साहस की भावना को सुंदरता से जोड़कर अंजना को दिखाया कि परिवार के सदस्यों के बीच समर्थन और मोहब्बत का महत्व कितना ज्यादा होता है।

“ओके माॅं, अब प्लान बी पर गौर फरमाइए।” विनया आलथी पालथी कर बैठती हुई अंजना से कहती है।

“प्लान बी”… अंजना के स्वर में आश्चर्य था।

“जी माॅं”… विनया कहती है।

“कोई प्लान व्लान नहीं, दिन भर बुखार से तपी हो और अब ये सब। चुपचाप सो जाओ अब।” अंजना एक सिरे से उसकी बात नकारती उसकी गोद से तकिया लेकर यथास्थान रखती हुई कहती है।

“बस प्लान बी सुन लीजिए क्योंकि आसानी से आप ये भी नहीं मानने वाली।” कहती विनया की आवाज धीमी होती चली गई।

“नहीं”… अंजना अड़ते हुए कहती है।

“प्लीज माॅं”.. विनया ऑंखें झपकाती हुई कहती है।

“ओह हो, बस प्लान बताना है, उस पर कोई चर्चा नहीं होगी।” अंजना आदेशात्मक स्वर में कहती है।

ठक, ठक, ठक…विनया अपनी बात प्रारंभ करती, उसी समय अंजना के कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई।

“संपदा दीदी होंगी।” कहती विनया कमरे की बत्ती जलाती झट से उठकर दरवाजा खोलती है और सामने मनीष को खड़ा देख हतप्रभ सी हो जाती है।

“जी आप”, बहुत मुश्किल से उसके मुॅंह अस्पष्ट स्वर निकलता है।

कुछ चाहिए था क्या बेटा, विनया को किंकर्तव्यविमूढ़ देख अंजना बिस्तर से उतरती हुई मनीष से पूछती है।

“नहीं वो मैं देखने आया था कि विन”… एक नजर विनया पर डाल बिना बात पूरी किए मनीष वहाॅं से हट कर अपने कमरे की ओर चला गया।

 

“जाओ बहू, देखो उसे कुछ चाहिए था क्या”… मनीष के हटते ही विनया को दरवाजा बंद करते देख अंजना कहती है।

“सुबह पूछ लिया जाएगा। अभी तो हमें अपने प्लान पर एकाग्र होने की जरूरत है।” विनया बोलती हुई बिस्तर पर बैठने लगी।

“नहीं, तुम अभी के अभी पूछोगी। मैंने जो सब गलती की है, तुम्हें नहीं करने दूॅंगी। पति पत्नी को जैसे ही अहसास हो कि अभी तुरंत दोनों में से किसी को किसी जरूरत है तो सारी दुनिया एक तरफ और जिसका हाथ पकड़ा है वो एक तरफ होना चाहिए। जाओ तुम।” अंजना फिर से दरवाजा खोलती हुई कहती है।

“पर माॅं, आपकी इस बात पर मेरा एक सवाल है।” विनया बोलती हुई एक उंगली नचाती हुई कहती है।

“कई सवाल पूछ लेना, अभी जाओ।” एक तरह से विनया को कमरे से धकेलती हुई अंजना कहती है।

“अभी गई, अभी आई।” कहकर विनया अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

“पागल लड़की।” अंजना मुस्कुरा कर बुदबुदाती हुई दरवाजा बंद कर बिस्तर पर बैठती विनया के उकसाए मायके की याद में को जाती है।

आरती झा आद्या

दिल्ली

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