अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 27) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

“हह..हह..हह”…. विनया को अंजना के गले लगते देख और अंजना को उसकी पीठ सहलाते देख बड़ी बुआ के मुॅंह में धरा निवाला गले में जाकर अटक गया था क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि अभी अंजना विनया को खुद से अलग करके रसोई की ओर बढ़ जाएगी। लेकिन ये क्या अंजना तो उसे और जोर से भींचते हुए पीठ सहलाने लगी।

“माॅं…माॅं…क्या हुआ आपको”….बड़ी बुआ के बगल में बैठा उनका बेटा संभव अंजना और विनया के मिलन के दृश्य को मुस्कुराते हुए पी ही रहा था कि अपनी माॅं के श्वास के अटकन को देखकर शीघ्र खड़ा होकर उनकी पीठ सहलाने लगा 

और मनीष जल्दी से गिलास में पानी उड़ेल बुआ की ओर बढ़ाता हुआ चिंतित स्वर में कहता है “बुआ, अचानक क्या हो गया आपको”…बुआ की ऑंखों में पानी भरा हुआ था, जिसने उनके कपोलों को ढक लिया था।

“मिलन रास नहीं आया।” कोयल संभव और मनीष को चिंतित देख बुदबुदाती है। 

“क्या रास नहीं आया।” मनीष जो की कोयल के थोड़े निकट खड़ा था, उसकी आधी अधूरी बात सुनकर पूछता है। 

“मिलन रास नहीं आया भैया, आपके यहाॅं ऐसे दृश्य देखने की आदी नहीं हैं मम्मी जी, खासकर मामी जी कोई प्यार दे, ये तो आपलोग भी नहीं कर सके ना कभी।” सभी जानते थे कि कोयल बेबाक बातें ही करती थी और अभी भी उसने बेबाकी से मनीष के सामने उसके घर का रेखाचित्र खींच कर उसके हाथ में रख दिया था।

कोयल पहले ऐसी हरगिज नहीं थी, छुई मुई सी कम बोलने वाली लड़की थी। उसकी इन्हीं गुणों पर रीझ कर संभव ने उससे विवाह की जिद्द की थी और अपनी माॅं के खिलाफ जाकर उससे शादी की थी, जिसका नतीजा था कि उसकी माॅं दोनों को अलग करने के तिकड़में उत्पन्न करने लगी और संभव को यकीन हो गया कि उसकी पसंद गलत थी लेकिन कोयल परिस्थिति और बुआ दोनों को समझ कर उनके खिलाफ बगावत का झंडा ले खड़ी हो गई और मोबाइल से उनके कारनामों के वीडियो बनाती चली गई। लेकिन जब विनया ने ये सब जाना और संपदा ने भी उसे यही उपाय अपनाने कहा तो विनया ने एक सिरे से इसे नकार दिया क्योंकि वो चाहती थी कि अंजना को उसके पति और उनका बेटा दिल से तरजीह दे और इसके लिए वो वीडियो का सहारा ना लेकर उनके दिल पर वार करना चाहती थी।

“क्या भाभी, कुछ भी बोल देती हैं। सबके खुश रहने से बुआ को तो खुशी ही होती है।” अब तक बुआ खुद को संभाल चुकी थी और अभी अपने अपने स्थान पर खाने के लिए बैठ गए थे और मनीष कोयल की ओर देखकर उसकी बात काटते हुए कहता है।

“हाॅं, तभी विनया के लिए आप दवा भी नहीं ला सके।” कोयल हॅंस कर मनीष को छेड़ती हुई कहती है।

“वो तो, वो तो”…मनीष को तत्काल कोई जवाब नहीं सूझा।

“छोड़िए….डिनर खत्म कीजिए और समय से सो जाइए, नहीं तो कल ऑफिस के लिए देर हो जाएंगे।” कोयल बात समाप्त करती हुई कहती है।

मनीष, अपने कमरे में बैठा लैपटॉप का सामना कर ऑफिस के कामों में लगा हुआ था। उसके हाथ त्वरितता से बटन दबा रहे थे और वह दिनभर की घटनाओं को और कोयल की बातों को भी याद कर रहा था। साथ ही विनया की आँखों में छुपा तूफान भी मनीष के दिल को झकझोर रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि वह तूफान उसके सभी विचारों को काबू में कर रहा था। उसने महसूस किया कि उसका दिल जैसे किसी अनजान शक्ति के सामने थम गया हो, जो उसे खुद से भी अलग कर देने का प्रयास कर रही थी।

काम के बीच-बीच में उसका मन विचलित हो रहा था और उसे लगा कि वह अपने आत्मा के साथ कुछ नया महसूस कर रहा है, जैसा कि उसने खुद से पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसके दिल में एक अजीब सी ऊर्जा भरी हुई थी। समय के साथ मनीष का दिल उस तूफान के साथ गहराइयों में डूबता जा रहा था, जिसे विनया उसके साथ साझा कर रही थी। कमरे में चल रहे धीमे संगीत के महौल में, उसके दिल की सारी चिंगारी विनया के साथ मिलकर आत्मा को बहुत अधिक छूने की कोशिश कर रही थी और वो बैचेन होकर लैपटॉप बंद कर अपना सिर सोफे पर टिका लेता है और सोच रहा होता है कि विनया के कमरे में आते ही वो उससे पूछेगा कि आखिर उसके मन में चल क्या रहा है।

“माॅं, क्या आज मैं आपके कमरे में ही सो जाऊॅं।” विनया अंजना के कमरे में बैठती हुई पूछती है।

“हाॅं, बेटा सो जाओ, संपदा जरा तेल ले आओ। विनया के बालों की मालिश कर दूॅं।” अंजना विनया को स्वीकृति देकर संपदा से कहती है।

“आपके तो मजे हो गए भाभी”…. ऑंखों को मटकाती हुई संपदा कहती है।

“माॅं, इस बालिके पर भी अपनी कृपा दृष्टि डालें।” अंजना के बगल में बैठी विनया उसके कंधे पर सिर रखती हुई कहती है।

अंजना की ममता और सखापन का सुंदर सा दृश्य उत्पन्न हो गया था, जब वह विनया के गाल पर हाथ रखकर कह रही थी, “पहले ले तो आओ, दोनों की मालिश हो जाएगी।” यह दिखा रहा था कि दोनों के बीच एक गहरी आत्मीयता और समर्थन का संबंध विकसित होने लगा था। अंजना का हाथ विनया के गाल पर रखना, विचारों और भावनाओं को बिना शब्दों के एक दूसरे के साथ जोड़ रहा था, जहाॅं अंजना ने विनया के साथ अपने संबंध को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए एक बहुत खास तरीके से प्रस्तुत किया। इस सुदृढ़ संबंध का मौजूद होना दर्शाता था कि वे एक दूसरे के साथ सहजीवनी भावना और समर्थन में बढ़ रहे थे। यह क्षण बता रहा था कि संबंध विकसित होते समय कभी-कभी शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मोमेंट्स और भावनाएं ही काफी होती हैं।

“ये लो मम्मी, शुरू हो जाओ, अपनी लाडली बेटी की चंपी करो। मालिश, तेल मालिश”… गाती हुई संपदा तेल का कटोरा अंजना की ओर बढ़ा देती है।

“अरे मेरी प्यारी मम्मी, बचपन में जब भी मेरी और भैया की तुम चंपी करती थी तो याद है तेल गर्म कर लेती थी कि इससे पूरे शरीर को आराम मिल जाएगा।” तेल हाथ में लेते ही अंजना सवालिया नजरों से संपदा को देखती है, जिस पर संपदा अपना बचपन याद करती हुई कहती है। इस मोमेंट में, अंजना और संपदा के बीच एक मिठा और जीवंत भाव दिख रहा है, जहाॅं बचपन की सुंदर यादें उन्हें मुस्कराहट और प्यार से भरा हुआ महसूस करा रही हैं।

संपदा का उन बीते क्षणों को याद रखना और स्मरण करना अपनी मम्मी के साथ एक प्यार भरे और आत्मीय संबंध की मिसाल प्रस्तुत कर रही है। उनकी यादें बचपन की चंपी के लम्हों से भरी हुई हैं और अंजना ने उन्हें आराम और सुख देने के लिए तेल से चंपी करने का एक प्यारा और देखभाल का तरीका बताया था। इस संवाद में अंजना की भावनाएं साफ़ हैं और संपदा के साथ इस मीठे और नोस्टाल्जिक पल को याद करके भावुक हो जाती है। अंजना ने तेल लेते ही उस चंपी के पलों को दोबारा जीने की भावना को साझा किया है। इस पल में अंजना और संपदा के बीच की मिठास और संबंध का आभास होता है, जो उनके बचपन के सुंदर और आत्मीय क्षणों में छुपा हुआ है। तेल के संवेदनशील मोमेंट में उनकी आंचलिकता और सहजपन से भरी यह यादें उनके संबंध को और भी मजबूती देती है। इस दृश्य में अंजना और संपदा के बीच की यह साझेदारी और समर्थन से भरी भावनाएं विनया को एक प्रिय और जीवंत याद का हिस्सा बना रही थी।

विनया ने उस रात अपनी सास और ननद के बचपन के साथ साथ खुद के बाल्यावस्था के अनमोल पलों को उनके साथ साझा करते हुए उनकी मालिश का आनंद लिया। अंजना की ममता ने उन्हें एक सुरक्षित और प्यार भरे माहौल को महसूस कराया, जहाॅं वे एक दूसरे के साथ हृदय से जुड़ सकती थीं।

उस रात, विनया ने अपनी सास और ननद के साथ एक आदर्शवादी और दिलचस्प माहौल में बचपन की यादों का साझा करने का सुअवसर पाया। उसने खुद के बचपन की सुखद और हंसीभरी कहानियों को अपनी सास और ननद के साथ बांटते हुए एक अनूठा और जीवंत जीवन जी रही थी।

अंजना की ममता ने उन्हें एक सुरक्षित, स्नेहपूर्ण और आत्मीय माहौल में बांध दिया, जहां विनया ने अपने परिवार के सदस्यों के साथ एकजुट होकर बचपन का आनंद लिया। एक बीते समय के प्रिय लम्हों की यादें जिस तरह ताजगी से साझा किया जा रहा था, वह परिवार के बीच एक सजीव और सुखद माहौल को बढ़ावा देने का भी उत्तम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा था। अब घर की औरतों के बीच की परिधि बड़ी हो रही थी, 

घर की औरतों के बीच की परिधि का बढ़ता हुआ दायरा महत्वपूर्ण हो गया था, जो एक सहज और नई शक्ति की और बढ़ने का संकेत दे रहा था। महिलाओं के बीच की परिधि का बढ़ना नए विचार और समर्थन की दिशा में एक सकारात्मक संदेश दे रहा था।

“आह हा, मजा आ गया मम्मी।” संपदा सिर की चंपी के बाद खुश होकर कहती अंजना के हाथ चूम लेती है। 

“पता है भाभी, जब मैं छोटी थी ना तो चंपी के बाद इसी तरह मम्मी के हाथ चूम लेती थी।” संपदा थोड़ी झेंपती सी विनया से कहती है।

“यही तो होता है माॅं–बेटी का प्यार दीदी।” विनया अंजना की ओर प्यार से देखती हुई कहती है।

यह दृश्य विनया और अंजना के बीच एक प्यार भरे और आत्मीय संबंध को दर्शा रहा था। विनया का प्यार और आदर अंजना के प्रति स्पष्ट रूप से प्रकट हो रहा था, जो एक माँ और बेटी के बीच गहरे और सजीव संबंध को उजागर करता है। विनया की भावनाएं और उसकी आँखों में प्यार से भरी झलक, इस घड़ी को विशेष बना रही थी, जिससे स्पष्ट होता है कि माँ-बेटी के बीच का यह संबंध कितना महत्वपूर्ण और गहरा होता है।

“भाभी, थैंक्यू आपने एक बार फिर से मुझे मेरी मम्मी से मिलवा दिया। जीवन के सारे महत्वपूर्ण पलों को हमने यूं ही जाया कर दिया।” संपदा के पीछे पीछे विनया भी कमरे से बाहर पानी लेने आती है, तो संपदा उसके दोनों हाथों को थामती हुई कहती है।

इस प्रभावशाली पल में, संपदा को आभास होता है कि उसने विनया को सिर्फ भाभी के रूप में नहीं, माँ की भूमिका में, एक बहन के रूप में अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण पलों को साझा कर सकती है। विनया का आगमन संपदा के लिए एक अद्वितीय संबंध की ताजगी और नई ऊर्जा लेकर आया था, जिसे वह बड़े आदर और स्नेह से स्वीकार करती है।

संपदा विनया के साथ एक सजग संबंध को अभिव्यक्त करने में उत्साहित होती है और उसका हाथ पकड़ना एक सजीव प्रतीक है जो इस संबंध की मजबूती को साकार बनाता है। वाक्य “जीवन के सारे महत्वपूर्ण पलों को हमने यूं ही जाया कर दिया” द्वारा यह स्पष्ट होता है कि इन दोनों ने एक दूसरे के साथ सभी सुख-दुःख साझा किए हैं और इस संबंध को एक महत्वपूर्ण भूमिका में रूपित किया है। यह पल महसूस कराता है कि परिवार में साझेदारी और समर्थन से भरे रिश्ते हमेशा महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

“नहीं आप भी वही थी, माॅं की भावनाएं भी वही थी। बस आपने अपने ऑंखों पर अविश्वास का काला चश्मा चढ़ा लिया था और अब जब आपने अपनी स्वेच्छा से उस चश्मा को उतारा तो खुद ब खुद सब कुछ स्पष्ट और स्वच्छ हो गया दीदी।” विनया संपदा का हाथ और जोर से पकड़ती हुई कहती है। विनया ने संपदा के साथ यह मोमेंट साझा करके दिखाया कि परिवर्तन न केवल दृष्टि में होता है, बल्कि इससे उनके बीच का संबंध भी मजबूत हो जाता है। संपदा के दृष्टिकोण में उतार-चढ़ाव को देखकर विनया ने भी उसके साथ एक नये अनुभव की शुरुआत की है, जिसने उनके बीच एक और सौहार्द्र पूर्ण संबंध को पैदा किया है। इस पल ने दिखाया है कि प्रेम और समर्थन से भरा हुआ एक अद्वितीय बंधन कैसे नए रूप में प्रकट हो सकता है जब व्यक्ति झूठे अहम् को छोड़कर सच्चाई का सामना करता है।

“अच्छा भाभी, आज माॅं के कमरे में सोने का आपके मन में कैसे आया। भैया के रवैए के कारण”…

संपदा की बात बीच में ही रोकती हुई विनया कह उठती है, “नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, अभी तक आपके भैया के ऑंखों से वो काला चश्मा उतरा नहीं है, उनसे कोई उम्मीद करना मूर्खता ही है।” 

“तो फिर क्या हमारे प्लान पर विचार करने के लिए”…संपदा अपनी बात अधूरी छोड़ कर विनया की ऑंखों में देखने लगती है।

“हूं, दिन भर तो ये अवसर प्राप्त होता नहीं है, अभी फिर भी बात हो जाएगी। बस माॅं मान जाएं।” विनया गहरी सांस लेती हुई कहती है।

“प्लान ए या प्लान ब, किस पर बात करने वाली हैं आप।” रसोई में खड़े खड़े ही दोनों बात कर रही थी।

“क्या बात है, दोनों पानी के लिए कुॅंआ खोदने लगी क्या”…अंजना रसोई में आती हुई दोनों को बातें करते देख पूछती है।

“संपदा तुम्हें तो सोचना चाहिए, विनया की तबियत ठीक नहीं है और तुम इसे बातों में उलझाए हुए हो।” अंजना संपदा पर गुस्सा दिखाती हुई कहती है।

“भाभी दिल्ली अब दूर नहीं है।” अंजना के इस तरह ऑंखें तरेरते देख संपदा अंजना के बगल में खड़ी होती उसके कंधे पर हाथ रखती हुई कहती है।

“ले जाइए, अपनी छुई मुई बहू को।” अंजना के हाथ में विनया का हाथ पकड़ाती हुई संपदा कहती है।

“छुई मुई नहीं है ये, इतने दिनों में ये सब कुछ भूल कर सिर्फ हमारे बारे में सोच रही है, इस घर को खुशनुमा बनाने के लिए जतन कर रही है। हमने जो बिगाड़ा, ये बच्ची उसे सुधारने का प्रयास कर रही है और हम हैं कि नहीं सुधरेंगे की जिद्द पर अड़े हैं, तो ये बीमार नहीं होगी तो क्या होगी।” अंजना विनया के सिर पर हाथ फेरती हुई सजल नेत्रों से विनया को देखती हुई कहती है।

उसके वचनों में अंजना ने विनया की मेहनत और समर्पण की प्रशंसा की है और उसकी खुशियों और कठिनाइयों के साथ संघर्ष को साझा करने का समर्थन किया है। उसने विनया को यह संदेश दे दिया है कि माँ का प्यार और समर्थन शक्तिशाली होता है और इससे ही बच्चों को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने में मदद मिलती है और अंजना की बातों में अपने लिए प्यार और ममता देखकर विनया अपनी योजना की सफलता के प्रति आशान्वित होती संपदा की ओर देखती अंजना के साथ उसके कमरे की ओर बढ़ गई।

आरती झा आद्या

दिल्ली

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