अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 2 ) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : “चाय पिएंगी बुआ।” विनया सुलोचना से पूछती है।

“नेकी और पूछ–पूछ, इतनी भाषणबाजी के बाद कुछ तो इनाम मिलना ही चाहिए मुझे।” सुलोचना हॅंस कर कहती है।

“पर कैसे ठीक करुॅं सब कुछ”…मन में सोचती विनया अपनी सास अंजना के कमरे की ओर देखती हुई रसोई की ओर बढ़ गई।

“बुआ माॅं को भी बाहर बुला लाइए ना, बालकनी में बैठ कर तीनों साथ चाय पीते हैं। मुझे तो बिना बोले हाथ के इशारे से ही मना कर देती हैं।” चाय की ट्रे लिए सुलोचना के पास खड़ी विनया कहती है।

“कोशिश करती हूॅं बेटा, पर उम्मीद मत पालना अभी कुछ भी।” अपने अनुभव से कहती हुई सुलोचना अंजना को बुलाने चली गई।

“भाभी आज आपकी ननद का बेसमय चाय पीने की इच्छा हो गई। आपकी बहू चाय भी तो आपकी तरह ही स्वाद वाला बनाती है। चलिए ना तीनों साथ में बालकनी में गर्मी की गर्म हवा के साथ गर्म गर्म चाय का मजा लेते हैं।” सुलोचना अंजना के मना करने पर भी बार बार इसरार करती रही।

“आइए आइए माॅं”…विनया सुलोचना के साथ अंजना को आते देख खुशी से झूम उठी।

“मुझे माफ कीजिए दीदी, आपलोग चाय पीजिए।”  चाय के एक प्याले को उठाकर कमरे की अंजना अपने कमरे में चली गई।

बुआ…विनया का स्वर भीग गया था।

“कोई बात नहीं बच्चे, इतने दिनों का अवसाद एक दिन में नहीं जाएगा न, बस तुम हार मत मानना। अडिग रहना।” विनया के भीगे स्वर को सुलोचना सांत्वना के बोल से ऊर्जित कर रही थी।

“बुआ आप भी जा रही हैं, मैं कैसे संभालूंगी।” सुलोचना का बैग जमाती हुई विनया व्यथित हो गई।

“बेटा मैंने पहले भी कहा था, अभी फिर कह रही हूॅं, अपने घर को और उस घर के सदस्यों को, उनके व्यवहार को जितनी अच्छी तरह एक गृहलक्ष्मी समझती है, उतना तो खुद के व्यवहार को उस घर के सदस्य भी नहीं समझते, तो इस घर को सजाने संवारने का कार्य अब तुम्हारे नाजुक कंधों पर है।” सुलोचना विनया के कंधे पर हाथ रखती हुई दिलासा भरे स्वर में कहती है।

“बुआ, करना तो है ही लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा है।” विनया परेशान होती हुई कहती है।

“समझती हूॅं मैं, अभी छह महीने ही तो हुए हैं तुम्हारे इस घर में आए और ये सब झेलना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूॅं, जब भी जरूरत हो तुरंत कॉल करना मुझे।” सुलोचना बैग के साथ कमरे से बाहर निकलती हुई कहती है।

“क्या खुसुर पुसुर चल रही थी आप दोनों में।” संपदा करीब आती हुई पूछती है।

“तुम तो आई नहीं बैग जमाने तो बहू ही जमाने लगी।” सुलोचना संपदा के दोनों गाल खींचती हुई कहती है।

“दीदी ये आपके लिए, हाथ में घर की बनी मिठाई और नमकीन भरे थैले लिए हुए अंजना खड़ी थी।

क्या भाभी, कितनी बार आपको मना किया है, ये सब मत किया कीजिए। किचन में भी आने नहीं देती आप, अकेले लगी रहती हैं।” सुलोचना अपनी भाभी के दोनों हाथ पकड़ कर डबडबाई ऑंख लिए कहती है।

“बुआ, ट्रेन का टाइम हो रहा है।” मनीष कहता है तो अंजना सुलोचना की बात पर सिर्फ उसके सिर पर हाथ फेर देती है।

“अच्छा बहू, ध्यान रखना।” ऑंखों ही ऑंखों में सुलोचना विनया को हिम्मत देती है।

“माॅं क्या कर रही हैं, मैं हेल्प करती हूॅं।” धूप में छत पर कपड़े डालने जा रही अंजना के हाथ से कपड़ों भरी बाल्टी लेने की कोशिश करती हुई विनया कहती है।

नहीं, बोल कर अंजना छत पर जाने के लिए सीढ़ियों की ओर बढ़ गई। अंजना के इस कठोर बर्ताब से विनया का मन मुरझा गया और वो अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी।

“नहीं विनया, माॅं के व्यवहार का क्या बुरा मानना। उन्होंने जो पाया है, वही तो सामने वाले को देंगी ना।” अपने सिर पर चपत मारती विनया धम धम करती सीढियां चढ़ने लगी। 

उसके आने का अहसास होने के बाद भी अंजना बिना मुड़े अपने काम में लगी रही। विनया भी बिना एक शब्द बोले अंजना के साथ साथ बाल्टी से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगी और उसी तरह बिना एक शब्द बोले कपड़े डाल नीचे आकर दोनों अपने अपने कमरे में आ गई।

ऐसे कैसे काम चलेगा, माॅं के अंदर की बातें जब तक बाहर नहीं आएंगी, मैं कैसे समाधान निकलूंगी। मनीष और संपदा से कुछ कहना ही बेकार है। पता नहीं कैसे कोई अपनी माॅं से कटा कटा रह सकता है। मैं तो अपनी मम्मी से एक दिन बात ना करूॅं तो अधूरा अधूरा सा लगता है। मम्मी से बात करती हूॅं, क्या पता वही कुछ बताएं। सोचती हुई विनया अपनी मम्मी को कॉल करने लगी।

“हैलो हाॅं भैया, आपने कॉल लिया। आप अभी घर पर कैसे और मम्मी कहाॅं हैं।” भाई सौरभ को कॉल पर देख विनया आश्चर्य से पूछती है।

“मम्मी गिर गई हैं, इसलिए मैं छुट्टी पर हूॅं।” सौरभ बताता है।

“और आपने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा।” विनया नाराजगी से कहती है।

“अरे बाबा, इतनी भी चोट नहीं है, आराम फरमा रही हैं बहू के साथ।” सौरभ हॅंसते हुए कहता है।

“मैं अभी आ रही हूॅं भैया।” विनया बोल कर कॉल कट कर अंजना के कमरे की ओर दौड़ पड़ी।

अंजना के कमरे के दरवाजे पर पहुॅंच कर विनया ठिठक गई। अंजना आलमीरा खोल कर अपने सारे कपड़े निकाल कर बिस्तर पर रखकर फिर से हाथ फेरती तह कर रही थी। वो अपने काम में इतनी तल्लीन थी कि उसे दरवाजे पर विनया के आने का भी पता नहीं चला।

माॅं…विनया धीरे से दरवाजे पर से ही आवाज देती है।

विनया की आवाज पर अंजना सिर उठाकर उसी तरह बैठी बैठी सवालिया निगाहों से उसे देखती है। उसके चेहरे पर आए भाव ये बयान कर रहे थे कि विनया का इस समय आना और उसके कार्य में या यूं कहें कि विचारों में खलल डालना उसे पसंद नहीं आया।

“माॅं वो मम्मी गिर गई हैं, मैं अभी जाना चाहती हूॅं। भैया कह रहे थे ज्यादा चोट नहीं है। मैं रात तक आ जाऊॅंगी।” विनया अंजना के निगाहों में सवाल देखकर खुद के आने का सबब बताती है।

“बाहर बैठक में तुम्हारे पापा हैं, उनसे पूछ लो।” कहकर अंजना फिर से अपने काम में मशगूल होती विनया पर से नजर हटा लेती है।

अगला भाग

अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 3 ) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

आरती झा आद्या

दिल्ली

अंतर्मन की लक्ष्मी भाग 1 

 

1 thought on “अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 2 ) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi”

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!