विचित्र किंतु सत्य – प्रीती सक्सेना

 बहुत साल पहले करीब 47 साल पहले की बात है, मेरे पापा बिलासपुर छत्तीसगढ़ में तहसीलदार के पद पर पदस्थ थे, मैं पांचवी क्लास में पढ़ती थी, पापा पास के गांव में टूर पर गए हुए थे, पापा के एक परम मित्र थे एक सरदार जी, जो अक्सर पापा से मिलने आते थे, उनकी खासियत यह थी कि एक छोटा सा बैग हमेशा उनके हाथ में रहता था।

शाम को हम सभी घर के बड़े से कंपाउंड में खेल रहे थे, कि अचानक सरदार अंकल दिखे, मुझसे पूछा पापा कहां हैं मैंने बता दिया की पापा इस गांव में टूर पर गए हैं और खेलने में व्यस्त हो गई।

उधार रात को पापा सरकारी रेस्ट हाउस में जहां लाइट भी नहीं, सिर्फ एक चौकीदार, जो लालटेन जलाकर पापा के कमरे के बाहर पहरा दे रहा था , पापा के कमरे में भी लालटेन जल रही थी, अचानक पापा ने देखा, सरदार अंकल उनके सामने बैठे हैं, पापा को बहुत ताज्जुब हुआ की ये यहां अचानक कैसे आ गए, पूछने पर बोले यात्रा पर जा रहा था, आपसे बिना मिले कैसे जाता तो आ गया , काफी बाते होती रहीं  , पापा बाथरूम से आए तो देखा कमरा खाली है, ताज्जुब हुआ सरदार जी गए कहा, कमरा अंदर से बंद, खिड़कियां अंदर से बंद, पापा को घबराहट भी होने लगीं, उन्होने दरवाजा खोला बाहर आकर देखा चौकीदार था, जो उठकर खड़ा हो गया, उससे पूछा, अभी अभी एक सरदार जी गए न यहां से, उसने हाथ जोड़कर कहा, साहब यहां तो न कोई आया न ही कोई गया, मैं तो अभी जाग रहा हूं ,.



अब तो पापा की हालत खराब होने लगी की न ही मैने सपना देखा न ही मैं सोया फिर ये सब हुआ क्या? खैर किसी तरह रात बिताई और बिलासपुर वापस लौटे, आते साथ उन्होने सरदार जी के बारे में पता लगाया , उनके साथ हम सब भी और अब आप सभी भी चौंक जायेंगे ये जानकर कि कल शाम को सरदार जी का देहांत हो गया था और वो अपनी मृत्यु के बाद अपने अभिन्न मित्र से मिलने गए थे, मेरे पापा लंबे अरसे तक बहुत शॉक्ड रहे, पापा को ये भी ध्यान आया की जब सरदार जी पापा से मिलने आए तो उनका बैग उनके साथ नहीं था, पापा के पूछने पर उन्होंने बात बदल दी थी।

मैं नहीं जानती कितने पाठक इस संस्मरण पर यकीन करेंगे, पर मेरे दिवंगत पिता ने हम सभी भाई बहनों को ये वाकया सुनाया था, जो आज मैंने आप सबको सुनाया।

प्रीती सक्सेना

इंदौर

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