तू इस तरह मेरी जिन्दगी में शामिल है (भाग -1)- दिव्या शर्मा : Moral stories in hindi

“बांध दूँ जोबन चोली में मत छेड़ सजनवा होली में….अबे ओ…साले मर क्यों रहा है!!” पुल की रेलिंग से लटके शेखर को देख गाना भूल गुझिया जोर से चिल्लाई।अंधेरी रात में इस पुल पर अक्सर अपने ग्राहकों के इंतजार में खड़ी गुझिया आज की रात बेग्राहक रह गई क्योंकि बारिश ने आफत मचाए रखी थी।

“अबे ओ निकम्मे! तुझे ही कह रही हूँ।”

गुझिया ने झपट कर शेखर की बाँह को पकड़ लिया।वह अपनी बाँह छुड़ाने के लिए कंधे को जोर से झड़कने लगता है।

“ओ भूतनी के।सीधे ऊपर आ।” गुझिया ने उसकी बाँह पर नाखून गाड़ते हुए कहा।

“इस्स! पागल हो तुम? नाखून गाड़ दिए।खून निकल आया होगा पक्का।” आदमी ने मुँह खोला।

” ओ..ओ..जुबान है तेरे पास! इत्ती सी चोट से बिलबिला रहा है और जो नीचे जाकर चोट खाएगा उसका क्या?”

“मेरी मर्जी।तुम अपने काम से काम रखो।छोड़ो मेरा हाथ।” शेखर चिढ़ते हुए बोला।

“आएं हाएं…बोल तो ऐसा रहा है जैसे ब्याह करने के लिए तेरा हाथ पकड़ रही हूँ।अबे ओ…तू पहले ऊपर आ।” गुझिया ने जैसे उसे आदेश दिया।वह चुपचाप रेलिंग से ऊपर उतर गया और पीठ फेरकर खड़ा हो गया।

गुझिया उसकी पीठ को घूरती रही।

“मुझे ऐसे तो मत देखो।मुँह  पीछे करो अपना।” शेखर बिना गुझिया की ओर देखे बोला।

उसकी बात सुनकर गुझिया जोर से हँस पड़ी।

” हे भगवान…हा…हा…तू क्या लुगाई है जो शरमा रहा है! अरे घबराहट तो हमें होती है जब मर्द की आँख कपड़ों को फाड़कर हमारी छाती से उतर हमारी टाँगों पर टिक जाती है।तू क्यों घबरा रहा है?”

“हर मर्द औरत के जिस्म को नंगा नहीं करता।कुछ औरतें भी मर्द को रोज नं…।” बात को अधूरा छोड़ वह आगे बढ़ गया।

उसकी बात स़ुनकर गुझिया के कानों में सूंई सी चुभने लगी।वह उससे दूर जा रहा था।

अचानक वह उसके पीछे दौड़ पड़ी।

“ओ सुन…रूक जरा…मुझसे बात कर।”

गुझिया की आवाज सुन वह ठिठक गया और पलटकर गुझिया को देखने लगा।कुछ पल में गुझिया उसके नजदीक थी।

“तुमने मुझे रोक कर सही नहीं किया।मरने देती ।” वह दुखी सा बोला।

” पर तू मरना क्यों चाहता है! पैसा नहीं है या छोकरी छोड़ गई या बाप ने लात मारकर निकाल दिया? अबे बाप की बात का बुरा नहीं मानते।बाप है वो।” गुझिया उसे समझाते हुए बोली।

“काश मुझे मेरा बाप लात मारने के लिए जिन्दा होता…काश मेरा बाप मुझे बचा लेता।” शेखर ने आसमान की ओर देखकर कहा।उसकी आँखों में आई नमी गुझिया से छिपी नहीं रही।उसका हाथ शेखर के कंधे की ओर चला गया। गुझिया की हथेलियों की तसल्ली शेखर की पीड़ा को बहा ले गई।गालों पर ढुलकते आँसू छिपाने के लिए वह अपनी हथेलियों से चेहरा ढक लेता है और खुद को सयंत करने की कोशिश करता है।

“तू….नाम..तेरा नाम क्या है?”

गुझिया का सवाल शेखर के कानों में नहीं पहुंचा था शायद।वह दोबारा अपनी सवाल दोहराती है,

“ऐ..तू अपना बता या फिर बेनाम है!”

“शे..ख..र…अपने नाम के अक्षरों को तोड़ते हुए उसने जवाब दिया।

“मैं गुझिया…तेरा नाम तो बहुत अच्छा है।तेरे पास बीवी है?” गुझिया उसे बातों में उलझानी लगी।

“है…” शेखर कुछ धीरे बोला।

गुझिया इससे पहले की कुछ और पूछती शेखर सड़क के किनारे नीचे चुपचाप बैठ गया।गुझिया उसे देखती रही फिर करीब जाकर बैठ.गई।

अनजान आदमी जो उसका ग्राहक भी नहीं था आज गुझिया की रात का साथी बन गया।ऐसी रात जिसमें उसके कपड़ें नहीं उतर रहे थे।मन के रंगों और उस पर बने चित्रों को देखने की कोशिश हो रही थी।

आसपास उगी झाडिय़ों में एकाथ जुगनू जगमगा उठता।बादल आसमान में रूके हुए थे जो किसी के कुरेदने का इंतजार कर रहे थे शायद।गुझिया अपने बालों की लटों को उंगलियों से घुमाने लगती है।शेखर खामोश किसी दर्द के साथ बातें कर रहा था।

(किस दर्द से गुजर रहा है शेखर? गुझिया कौन है ? यह सब जानने के लिए पढिए अगला भाग)

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तू इस तरह मेरी जिन्दगी में शामिल है (भाग -2)- दिव्या शर्मा : Moral stories in hindi

 

दिव्या शर्मा

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