तिल का ताड़ बना दिया – विभा गुप्ता  : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :   ” क्या हुआ सुनील..तुम दोनों आज फिर से…।”

  ” तो क्या करुँ आँटी…सुमेधा के रोज के चिकचिक से मैं तंग आ गया हूँ।जी करता है कि अभी तलाक लेकर इससे नारकीय ज़िंदगी से छुटकारा पा लूँ..।” सुनील ने लगभग चीखते हुए कहा।

   ” तलाक!…नहीं बेटा, ऐसा नहीं कहते।सुमेधा बेटी…एक-दूसरे पर विश्वास करना बहुत ज़रूरी है।अगर कोई गलतफ़हमी है तो आपस में बात करके दूर कर लेना चाहिए वरना एक छोटी दरार को खाई बनने में देर नहीं लगती।” मंगला ने दोनों को समझाने का प्रयास किया तब सुमेधा तीखे स्वर में बोली ,” लेक्चर देना बहुत आसान आंटी है…, खुद पर तो बीती नहीं है तो आप क्या जाने…।”

  ” हाँ…मैं कैसे जान सकती हूँ..।” एक ठंडी साँस भरती हुई मंगला अपने कमरे में चली गई।मेज पर रखी फ़्रेम में लगी तस्वीर को वो निहारने लगी।तस्वीर उसके बेटे की थी, साथ में मयंक की भी…..मयंक…।

      मयंक मंगला के भईया के दोस्त थें,अक्सर ही घर में उनका आना-जाना लगा रहता था।लंबे कद और आकर्षक व्यक्तित्व के मयंक को वह कब दिल दे बैठी,उसे पता ही नहीं चला।मयंक भी उसे पसंद तो  करते ही थें।उनके जाॅब लगते ही माता-पिता की रज़ामंदी से दोनों ने विवाह करके अपना गृहस्थ जीवन शुरु कर लिया।

       हँसते-खेलते दोनों के दिन गुजर रहे थें।एक दिन दोनों एक दोस्त की पार्टी में गए।वहाँ मयंक को उसके बचपन की दोस्त निशा मिली।दोनों हँस-हँसकर बातें करने लगे जो मंगला को अच्छा नहीं लगा।उस वक्त तो चुप रही लेकिन घर आकर उसने मयंक से कहा कि वह किसी भी लड़की से बात न करे।उस वक्त तो मयंक ने उसकी बात मान ली लेकिन यह संभव नहीं था।ऑफ़िस के कई फ़ीमेल कलीग उसे राह या माॅल में मिल जाते थें तो उसे बातें करते देख मंगला घर आकर बहुत झगड़ा करती।अब तो मयंक को इसकी आदत-सी हो गई।कभी-कभी बहुत ज़्यादा प्यार भी इंसान के लिये बेड़ी बन जाती है।मयंक के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।

         इसी बीच मंगला प्रेग्नेंट हो गई।डाॅक्टर ने मयंक को घर का माहौल शांत रखने को कहा।मंगला का शक और गुस्सा बच्चे के लिये खतरनाक साबित हो सकता था।उसने इस बात का पूरा ख्याल रखा।मंगला ने एक बेटे को जनम दिया।दोनों अपने बेटे की परवरिश में व्यस्त हो गये।

    मयंक को एक मीटिंग अटेंड करने दिल्ली जाना पड़ा।तीन दिनों बाद जब वह वापस लौटा तो उसने देखा कि उसके बैग में कुछ सामान उसके कलीग तान्या का आ गया था।उसने सोचा कि कल ऑफ़िस जाते समय ले जाऊँगा, तभी तान्या आ गई और बोली कि आपके बैग में मेरा सामान…।

  ” हाँ-हाँ…मैंने अभी देखा है।अच्छा हुआ…तुम आ गई।” कहते हुए मयंक ने तान्या को सामान दे दिया।मंगला वहीं खड़ी थी, वह समझ गई कि तान्या मयंक के साथ थी और फिर उसके दिमाग ने वह सब सोच लिया जो हुआ ही नहीं था।

      दोनों की बीच बढ़ती तकरार देखकर मंगला की सहेली बीनू ने उसे समझाया, ” क्यूँ छोटी-छोटी बातों को बड़ा करके अपना घर तोड़ने पर तुली है।अभी भी समय है,तान्या के चैपटर को खत्म कर वरना…।”

  ” वरना क्या!…वो मुझे तलाक देंगे…उससे पहले तो मैं ही उन्हें तलाक दे दूँगी।कल ही मैं अपने लाॅयर अंकल से बात करती हूँ।” मंगला तैश में आ गई थी।

     मयंक समझ गया था कि अब मंगला को समझाना नामुमकिन है।उसने चुपचाप तलाक के कागजात पर हस्ताक्षर कर दिये।बेटे को लेकर मंगला अपने डैडी के पास चली आई।

   जब तक उसके डैडी जीवित थें,मायके में उसकी कद्र थी।फिर हमेशा रहने वाली प्यारी ननद भाभी को बोझ लगने लगती है। उसके हाथ तंग होने लगे।बेटे की पढ़ाई का खर्च निकालना उसके लिये मुश्किल होने लगा, तब मयंक ने कोर्ट के आदेश पर बेटे को अपने पास रख लिया।

      मंगला बिलकुल अकेली पड़ गयी थी।इसी बीच उसे एहसास हुआ कि उसने मयंक के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए था।पछतावे के आँसू बहाने में ही उसके दिन बीतने लगे।पिता ने उसके नाम एक फ़्लैट कर दिया था।उसी फ़्लैट के एक कमरे में वह रहने लगी और दो कमरों को किराये पर दे दिया।

    इसी तरह से दस बरस बीत गये।उसका पंद्रह वर्षीय बेटा कभी-कभी उससे मिलने आ जाता था लेकिन उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए ज़रा भी सम्मान न था।कैसे होता..‌‌..मंगला की ज़िद और अहंकार के कारण ही उसे अपने पिता से अलग रहना पड़ा था। 

       छह माह पहले ही सुनील-सुमेधा उसके यहाँ किरायेदार बनकर आये थें।पिछले दो महीनों से वह दोनों के बीच हो रही तकरार को देख रही थी।आज कुछ ज़्यादा हो गया तो उसने सुलह करानी चाही।छोटी-छोटी बातों को तूल देने और तिल का ताड़ बनाने का परिणाम वह भुगत रही है।वह नहीं चाहती थी कि सुनील-सुमेधा भी…।उसकी आँखें नम हो आईं।

  ” आँटी, हमें माफ़ कर दीजिये..।” सुमेधा की आवाज़ सुनकर वह चौंकी।

” हाँ आँटी…बीनू आँटी ने हमें सब बता दिया।हम आपसे माफ़ी माँगने आये हैं और आपसे प्राॅमिस करते हैं कि हम  अब कभी भी झगड़ा नहीं करेंगे।छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करके खुश रहेंगे।” कहते हुए सुनील ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये।

    ” मैं तो यही चाहती हूँ कि तुम दोनों हमेशा खुश रहो..।” मुस्कुराते हुए मंगला ने दोनों को अपने बच्चे की तरह सीने-से लगा लिया।पीछे खड़ी बीनू उन्हें देखकर भावविभोर हो गई।

                           विभा गुप्ता 

                             स्वरचित 

# रिश्तों के बीच कई बार छोटी-छोटी बातें बड़ा रूप ले लेती है।

# बेटियाँ वाक्य कहानी प्रतियोगिता 

 

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