*स्पष्ट वादिता* : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi :  नीरज की अभी छह महिने पूर्व शादी हुई थी, और उसे आज उसके ससुराल बुलाया गया था। नीरज का ससुराल बहुत पैसे वाला था, और रोमा उनकी इकलौती, लाड़ली बेटी थी। नीरज बेहद खूबसूरत,लम्बापूरा नौजवान था। जो देखता, देखता ही रह जाता। प्रभावशाली व्यक्तित्व था उसका।

नीरज और रोमा एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। रोमा साधारण नैन नक्श की, साधारण सी लड़की थी। रोमा मन ही मन नीरज से प्रेम करने लगी थी, नीरज इस बात से अनभिज्ञ था। पढ़ाई पूरी करने के बाद नीरज की बैंक में नौकरी लग गई। रोमा ने अपने मन की बात अपने पापा मम्मी से कही। अपनी बेटी की खुशी के लिए वे रिश्ता लेकर गए।

सबको रिश्ता पसंद आया और शादी हो गई।  रोमा ससुराल में सिर्फ पन्द्रह दिन रही और उसके पिता उसे मायके लेकर आ गए। घर के रिवाज के अनुसार पहली बार नीरज के पिता सतीश जी रोमा को लेने गए, तो माता पिता ने कुछ        बहाना बना लिया और उसे ससुराल नहीं भेजा। बोले -‘हम कुछ दिन बाद रोमा को आपके घर भेज देंगे।’ 

         नीरज जब उसके ससुराल पहुँचा तो उसका बहुत स्वागत सत्कार हुआ। फिर रोमा के पिता बसन्त बाबू ने कहा- ‘बेटा  मैंने आपके लिए एक फ्लैट बुक किया है, आप उसे देख लीजिए। आप और रोमा उसमें रहैं, उसमें सारे सामान की व्यवस्था मैं कर दूंगा।’ उनकी बातें सुनकर नीरज सन्न रह गया,उनके विचार जानने के लिए वह बोला ‘और मेरे माता- पिता, बहनें।’

वे तुरन्त बोले – ‘वे इसी शहर में तो हैं, कभी-कभी जाकर मिल लेना।’ नीरज को उनकी बातों पर बहुत गुस्सा आ रहा था मगर वाणी को संयमित कर उसने बस यही कहा-‘न मुझे आपके पैसे चाहिए न आपकी सम्पत्ति। मैं जैसा हूँ, जिस हाल में हूँ खुश हूँ आपके सामने हूँ। मैंने शादी के पहले भी अपनी स्थिति छुपाई नहीं थी।

आपको स्पष्ट कहा था, कि मैं मध्यमवर्गीय परिवार का हूँ। मेरी दो बहिने हैं जिनकी जिम्मेदारी मुझपर है, पिता वृद्ध है। आपकी बेटी सुख सुविधा में रही है। वह सारा ऐश्वर्य मैं उसे नहीं दे पाऊँगा । हॉं इतना विश्वास जरूर दिलाता हूँ कि, उसे इस घर में सभी का प्यार मिलेगा। वह इस घर की लक्ष्मी है,और यह सम्मान उसे मिलेगा।

मेरा घर परिवार एक खुली किताब की तरह है, जो स्थिति है आपको बता दी थी। उस समय आपने यही कहा था, कि मेरी बेटी सब एडजस्ट कर लेगी। आप शादी के लिए तैयार हो जाओ। और शादी के बाद आपका यह रूप……?अगर आपकी बेटी मेरे साथ आना चाहे,और आप उसे भेजने के लिए तैयार हो तो, मेरा दिल और मेरे घर के दरवाजे उसके लिए खुले हैं।

मैं घर की लक्ष्मी को ले जाने के लिए तैयार हूँ। आपसे अनुरोध है पैसो की बात कर मेरे स्वाभिमान को आहत न करें। आपने यह बात मेरे आगे कही, कृपया मेरे माता पिता के आगे मत कहियेगा। मैं आपसे फिर कह रहा हूँ…..मुझे न आपके पैसे चाहिए न आपकी सम्पत्ति। आप अपनी बेटी को भेजे न भेजे निर्णय आपका है। मैं जा रहा हूँ।’ रोमा जो अबतक सारी बातें सुन रही थी, उससे रहा नहीं गया। नीरज की स्पष्टवादिता उसे बहुत अच्छी लगी।

उसके माता पिता ने उसे जबरजस्ती घर पर रोक रखा था, उन्हें उम्मीद थी कि नीरज उनके प्रस्ताव को मान जाएगा और बेटी सुख से रहेगी। रोमा ने कहा -‘रूक जाओ नीरज मुझे छोड़कर मत जाओ, मैं हर हाल में तुम्हारे साथ हूँ। ‘ फिर वह अपने पापा से बोली -‘पापा अब मेरा घर वही है, मैं नीरज के साथ जा रही हूँ।

आज मैं भी आपसे यही कह रही हूँ कि मुझे न आपके पैसे चाहिए न आपकी सम्पत्ति। हो सके तो हमें आशीर्वाद दीजिये कि हमारा दाम्पत्य जीवन सुखमय हो।’ बसन्त बाबू और शीला जी ने बेटी को आशीर्वाद दिया और वो नीरज के साथ अपने घर चली गई। 

प्रेषक-

पुष्पा जोशी

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित

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