संस्कारहीनता से सामाजिक अवनति” : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi  :    “अम्मा आपको कहां जाना है?” रेलवे स्टेशन की एक बेंच पर गुमसुम बैठी बूढ़ी काकी से एक टेलीविजन न्यूज रिपोर्ट ने पूछा…ये लोग कारोना काल में महानगर के स्टेशनों पर लोगोंं की परेशानियों को रिकॉर्ड कर रहे थे… फटे पुराने बैग को अपने कमजोर हाथों से उठाकर बूढ़ी काकी बैंच के दूसरी ओर खिसक  गई। 

     “काकी आप डरो मत ” हम टेलीविजन वाले लोग हैं। आपकी परेशानी को टी वी पर दिखाएंगे… उनकी बात सुनकर बूढ़ी काकी आकाश की ओर ताकने लगी… रिपोर्टर ने फिर पूछा -“बोलो काकी! आपको कहां जाना है?” थोड़ी देर बाद मौन को तोड़ते हुए काकी बोली-” बेटा! टीवी पर न दिखाने का वायदा करो तो मैं सब बताती हूं … “हाँ बताओ काकी! हम जानना चाहते हैं, हम नहीं दिखाएंग़े”

            मेरा नाम कमला देवी है। उत्तर भारत के छोटे से कस्बे में रहती हूं… दो बेटे हैं…पति का देहांत हो गया है । मेरे पति छोटे छोटे कस्बों में लगने वाली हाटों में तौलिया, गमछा की दुकान लगाते थे। हम दोनों अधिक़ पढ़े लिखे नहीं थे, पर बच्चों को अच्छा पढ़ाना चाहते थे… बच्चे अच्छा पढ़ लिख जाए इसलिए मैंने भी लोगों के घरों में खाना बनाने का काम शुरू कर दिया… दिन रात मेहनत की… हमने न कभी अच्छा खाया न अच्छा पहना… बच्चों की अच्छी पढ़ाई कराना हमारे जीवन का लक्ष्य बन गया… मेरे पति एक दिन रात को कपड़ों को गठरी साइकिल पर बांधकर घर आ रहे थे तभी एक तेज गति से आते अनजान वाहन ने टक्कर मार दी और वहीं पर उनक़ी जीवनलीला समाप्त हो गई…  अब मेरे सामने विकट समस्या खड़ी थी… बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा?  मैंने हिम्मत न हारी कई और घरों में खाना बनाने का काम पकड़ लिया जिससे बच्चों की फीस में कोई अड़चऩ न आए…. पढ़ लिख़कर अब बड़ा बेटा कपड़े का व्यापार करता है और छोटा बेटा पुणे में नौकरी करता है। 

             दिन अचानक छोटे बेटे को बुखार आया… डेंगू बुखार था तबियत बहुत बिगड़ गई … मैं बेटे की देखभाल के लिए दौड़ी दौड़ी पुणे चली आई क्योंकि उसकी पत्नी भी नौकरी करती है घर में बेटे की देखभाल के लिए कोई और न था…अच्छी देखभाल, दवा और प्रभू की कृपा से एक महीनें में वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गया… 

           चार दिन पहले छोटा बेटा बड़े शहरों की मंहगाई का वास्ता देकर मुझे  टिकिट देकर घर जाने के लिए स्टेशन छोड़कर चला गया.. दीवाली की स्पेशल चलने वाली ट्रेन भी रद्द हो गई अब चार दिन से मैं लोगों की दया पर जिंदा हूं… गांव में बड़ा बेटा ,बहू पहले ही अपने पास नहीं रखना चाहते हैं, बड़ी बहू घर का सारा काम कराती है अब इन बूढ़ी हड्डियों में इतऩी ताकत नहीं हैं छोटी छोटी बात पर बहू बेटों की डांट सहन नहीं  होती है हर बात पर दुत्कारते है… अलग रहने के लिए न तन में ताकत है और न  धन में… बच्चों की जिल्लत की दो रोटी से अच्छी हैं स्टेशन पर लोगों की दया की दो रोटी…

             रिपोर्टर ने कहा काकी आप घबराओ मत हम कानून का सहारा लेंगे कानून में प्रावधाऩ है कि बच्चे अपने बूढ़े माता पिता की देखभाल करें । मैं अभी पुलिस को फोन करतीं हूं … तभी बूढ़ी काकी रिपोर्टर का हाथ अपने में लेकर बोली- बेटा! रिकॉर्डिंग शुरू कर करो मैं कुछ कहऩा चाहती हूँ… हाँ बोलो काकी… काकी बोली- बेटा!  मेरी इच्छा है कि मेरी मृत्यु पर मेरे संस्कारहीन बच्चे मेरे पार्थिव शरीर से हाथ न लगाएं…अनाथाश्रम के किसी बच्चे के हाथों मुझे मुखाग्नि दिलाई जाए मेरे संस्कारहीन बच्चों के लिए यही सबसे बड़ी सजा होगी…कभी न कभी उनका आत्मा अवश्य उन्हें धिक्कारेगी फिर वे माता पिता की छात्रछाया के लिए तड़फ़ेंगे.. 

            बात करते करते अचानक  बूढ़ी काकी रुक गई, लगा मानों शून्य में ताक रही हो फिर कुछ क्षण में ही काकी का शरीर एक ओर लुढ़क गय़ा देखा तो उसके प्राणपखेरू उड़ चुके थे…. ऐसा लग रहा था कि मानों काकी रिपोर्टर से कह रही हो बेटा !आज बच्चों की बढ़ती चाहतों पर मां बाप की दो रोटी भारी हैं आज समाज में बढ़ता हुआ यह रोग कहीं कैंसर न बन जाए इससे पहले  इसकी जड़ों को जड़  से निकालना होगा ही अन्यथा भारत के संस्कार धीरे धीरे धूमिल हो जाएंगे, ऐसे संस्कारहीन बच्चे संस्कारवान बच्चों को भी बदनाम कर देंगे.. समाज व्यवस्थित न रह पाएगा… देश को सामाजिक अवनति का सामना करना पड़ेगा…

स्वरचित मौलिक रचना

सरोज माहेश्वरी पुणे ( महाराष्ट्र) 

# संस्कारहीन

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