परित्याग – आरती झा आद्या : hindi stories with moral

hindi stories with moral :  “सुनो जी, कब तक यहाॅं से वहाॅं डोलते रहेंगे। जब शादी के बाद चावल का कलश पैरों से छुआ कर आई थी तो वो भी किराए का ही घर था। तब सोचा था चलो कोई बात नहीं, अपना भी एक घर बनाएंगे। लेकिन अब भी वही हालात हैं। हर दूसरे साल सामान समेटो और कहीं और बसेरा देखो। बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है। क्यों ना अब अपना बसेरा बनाए।” राधा एक एक कर सारा सामान हॉल में रखती जा रही थी, उसी के मध्य पति उमाकांत से कहती है।

“हूं, कह तो तुम ठीक रही हो, लेकिन एक क्लर्क कितना भी पेट काट ले। घर के खर्चे, बच्चों की पढ़ाई, हारी–बीमारी, रिश्तेदारी में कहाॅं इतना बचा पाता है कि मन लायक घर बना सके।” उमाकांत पत्नी से सहमत होते हुए भी अन्य खर्चों के कारण चिंतित थे।

वो जो हमने जमीन लिया था, उसी पर धीरे–धीरे कर बनाना प्रारंभ कर दो। लोन भी ले लेंगे, एक कमरा बनते ही हमलोग वही शिफ्ट हो जाएंगे। किराया भी बचेगा और निगरानी में घर भी बन जाएगा। मैं तो अपनी बहू को अपने घर में ही ले कर आऊॅंगी। राधा भविष्य के सपने बुनती हुई वही पति के पास बैठ गई।

“कह तो तुम ठीक ही रही हो। लेकिन चार लोग एक कमरे में कैसे रहेंगे। दिक्कत होगी राधा।” उमाकांत राधा के साथ चर्चा करते हुए कहते हैं।

“मकान ना ईंट पत्थर का बनेगा, लेकिन घर तो खून, पसीना से ही बनता है ना और खून, पसीना बहाने में मेहनत तो लगती ही है और मेहनती लोगों को दिक्कतों का भी सामना करना ही पड़ता है। इससे क्या डरना जी, बस अब तुम मन मजबूत कर लो।” राधा सुझाव देती हुई कहती है।

“ठीक है जैसा कहो।” कहकर उमाकांत मन ही मन कार्य आगे बढ़ाने पर विचार करने लगे।

आज राधा का हृदय बल्लियों उछल रहा था। आज उसके घर का सपना ही सम्पूर्ण नहीं हुआ है बल्कि बड़े बेटे का विवाह भी तय हो गया था। अब उसकी बहू किराए के घर में प्रवेश नहीं करेगी। अपना घर होगा, अपनी इच्छा होगी। मन में ढ़ेर सारी बातें गुनती राधा दीवारों की छू छू कर यूं देख रही थी जैसे दीवार उसके मन की बातें समझ रहे हो और स्वीकृति दे रहे हो।

बेटे का विवाह हो जाए फिर तीनों पिता पुत्र मिलकर ऊपर भी मकान लेंगे तो सही रहेगा। कल को दोनों बच्चों का परिवार बढ़ेगा तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। आखिर माता पिता का ये तो कर्तव्य होता है कि कम से कम सिर छुपाने के लिए एक ठोस आधार बच्चों के लिए खड़ा कर दें। राधा की ऑंखों ने कई सपने एक साथ संजो लिए। 

जैसे जैसे राधा ने चाहा था, सब कुछ वैसा ही होता गया। दोनों बेटों की शादी हो गई, दोनों के दो दो बच्चे हो गए, जिम्मेदारियों के साथ साथ दोनों भाइयों में मेरा–तेरा भी बढ़ गया। छुट्टी में आए दोनों भाई ने माता–पिता से पूछे बिना मकान के साथ साथ माता पिता के महीनों के भी बंटवारे का निर्णय ले लिया।

“ये क्या कह रहे हो तुमलोग। तुम हमलोग का या इस मकान का क्या बंटवारा करोगे? बंटवारा तुम दोनों का होगा और हम करेंगे। हमने अपने बच्चों का सोच कर ये मकान बनाया था कि उन्हें स्थायित्व मिले। तो अपने बच्चों के स्थायित्व के लिए तुम्हें कर्मठ होना होगा। हमलोग तो खुद ही तुमलोग को और तुम्हारे परिवार के लिए सोच रहे थे। लेकिन वो हमारी मूर्खता थी,

जो तुम दोनों भाइयों के सौजन्य से वक्त रहते समझ आ गया है। अब ऊपर या नीचे हमारा पूर्ण अधिकार रहेगा। हम जब चाहे जहाॅं चाहे उठ बैठ सकते हैं, घूम सकते हैं, खा–पी सकते हैं। तुम दोनों को यदि दिक्कत हो तो अपना आशियाना कहीं और देख लो और हाॅं, जहाॅं तक हमारे महीनों के बंटवारे की बात है तो हम करते हैं बंटवारा तुम दोनों के महीनों का। शुरू के छह महीने बड़े तुम हमारे पास आ सकते हो और अंत के छह महीने छोटे तुम हमारे पास आ सकते हो। लेकिन जब भी हमारे घर आओगे, हमारे अनुसार रहना होगा, कोई चालाकी कोई हेकड़ी नहीं चलेगी और उन छह महीनों में दूसरे बेटे से हमारा कोई संबंध नहीं रह जाएगा।” बच्चों की बात सुनकर उमाकांत को झटका लगा था, लेकिन उन्होंने खुद को संभालते हुए तत्काल निर्णय ले लिया और राधा बार बार ऑंचल से ऑंसू पोछ रही थी।

पापा, हमसे”….

“ना हमें तुम दोनों की कोई सफाई नहीं सुननी है। ये देखो रहे हो तुम्हारी माॅं कहलाने वाली इस औरत ने खून,पसीना सींच कर इस मकान को घर बनाया और यह घर, घर ही बना रहे, फिर से मकान नहीं बने, इसकी जिम्मेदारी मेरी है। इसलिए तुम दोनों का परित्याग बहुत जरूरी है। तुम दोनों जिस मानसिकता के साथ आए हो, तुमदोनों के परित्याग के बाद ही अब ये घर घर रह सकेगा। जाओ और अब तुमलोग भी अपने घर का निर्माण करो।” बड़े बेटे की बात को काटते हुए उमाकांत पत्नी राधा का हाथ अपने हाथ में लेकर उसके ऑंसू पोंछ कर कहते हैं।

और बेटे का बंटवारा…दोनों भाई पिता का निर्णय सुन हतप्रभ रह जाते हैं।

आरती झा आद्या

दिल्ली

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