माता-पिता का प्यार – के कामेश्वरी  : Moral Stories in Hindi

प्रणति और हरिप्रसाद मध्यम वर्गीय परिवार के थे । हरिप्रसाद सरकारी स्कूल में गणित पढ़ाया करते थे । उनकी शादी के दो साल बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम आदित्य रखा ताकि सूर्य की तरह वह चमकता रहे । उसी समय उन्होंने सोच लिया था कि अपने बेटे को बहुत पढ़ा लिखाकर ऊँचाई पर पहुँचा देंगे । अपने ही स्कूल में उसे दाख़िला दिला दिया । 

आदित्य भी पढ़ाई में बहुत होशियार था हर कक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता रहा । जब वह बारहवीं कक्षा में था तभी से वह आई आई टी की कोचिंग में जाने लगा । 

ईश्वर की कृपा से उसका आई आई टी में सेलेक्शन हो गया । वहाँ से उसने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर ली और हैदराबाद में ही एक बहुत बड़ी कंपनी में नौकरी भी पा लिया । माता-पिता भी खुश थे कि वह हमारे साथ ही रहेगा। 

जब आदित्य की नौकरी लग गई तो उसके लिए रिश्ते आने लगे। माता-पिता ने उसे बहुत सारी लड़कियों के फ़ोटो दिखाए। उनमें से एक लड़की तीनों को पसंद आ गई थी । उसे देखकर पसंद कर शादी भी कर दिया । अंजलि शादी करके ससुराल में पहुँच गई थी वह भी नौकरी करती थी इसलिए प्रणति ही सारे काम कर लेती थी । उसे लगता था कि मेरी बेटी होती थी तो मैं उससे काम कराती थी क्या नहीं ना फिर अंजलि से क्यों कराऊँ। 

अंजलि की एक बात उसे अच्छी नहीं लगती थी कि वह घर में छोटे छोटे कपड़े पहन कर घूमती रहती थी। उसे लगता था कि अपने कमरे में जैसे भी रहे पर बाहर तो बड़ों का लिहाज़ रखना चाहिए ।

एक दिन उसने देखा कि अंजलि छोटे कपड़ों में जैसे ही बाहर आई हरिप्रसाद वहाँ से चले गए थे । उसने अंजलि से कहा बेटा मैं नहीं कहती हूँ कि साड़ी पहनो पर कम से कम घर में सूट तो पहन लिया करो। इस बात पर उसे इतना ग़ुस्सा आया था कि आदित्य से कहकर वह घर से बाहर अलग घर लेकर चली गई । पति पत्नी दोनों को बुरा लगा था कि एक ही शहर में बेटा अलग रह रहा है । शुरू में हफ़्ते में फिर पंद्रह दिन फिर महीने में एक बार फोन करता था । उसे देखने के लिए उनकी आँखें तरस जाती थी । इसी तरह दस साल बीत गए फिर पता चला कि उसका तबादला दिल्ली हो गया है और वह वहीं पर शिफ़्ट हो गया है । 

जहाँ कहीं भी हो खुश तो हैं सोच लिया था । इसी गम में हरिप्रसाद की मृत्यु हो गई थी । ताज्जुब की बात यह थी कि आदित्य अकेले ही आया और सारे कार्यक्रम निपटा कर चला गया । एक बार भी नहीं पूछा माँ आप अकेले कैसे रहेंगी मेरे साथ चलिए । ख़ैर !!

प्रणति इतने बड़े घर में अकेली नहीं रह पा रही थी घर काटने को दौड़ रहा था । उसने निश्चय किया कि घर को किराए पर दूँगी । उसने अपने सामान एक कमरे में रख दिया और बाक़ी के कमरे किराये पर चढा दिया । तीन किराएदार थे । कल ही एक ने ख़ाली किया था और लोगों की लाइन लगी हुई थी । एक तो घर का किराया कम ऊपर से शहर के बीचोंबीच स्थित था । 

प्रणति खाना बना रही थी कि डोरबेल की आवाज़ सुनाई दी । उसे ग़ुस्सा नहीं आता था क्योंकि उसे मालूम था कि किराए के लिए मकान देखने कोई आया होगा । डोर ओपन करके देखा तो पति पत्नी खड़े हुए थे शायद नई नई शादी हुई थी । उन्हें देखा तो आदित्य की याद आ गई थी । बिना कुछ सोचे उन्हें घर किराए पर दे दिया । दोनों नौकरी करते थे कभी भी समय नहीं मिला उनसे बातें करने का लेकिन वे दोनों बात करने के किसी भी मौक़े को नहीं छोड़ते थे । उस थोड़ी सी बातचीत के दौरान ही पता चला कि दोनों अनाथ हैं । एक ही जगह रहते थे पढ़ लिख कर नौकरी ढूँढ कर उन्होंने शादी कर लिया है । 

यहाँ आने के बाद ही प्रियंका कनसीव हुई । प्रणति उसकी देखभाल करती थी । अपने घर में ही खाना बना कर खिलाती थी । उसी समय अनिव ने कहा कि माँ हम दोनों को माता-पिता नहीं हैं प्रियंका की डिलीवरी के समय आप हमारा साथ देंगी ना ।

प्रणति उनके साथ रहकर बहुत खुश थी उसने ख़ुशी ख़ुशी उनकी मदद की प्रियंका ने एक बेटी को जन्म दिया था जिसका नाम नीरजा रखा गया था । 

प्रणति ही उसकी देखभाल करने लगी। अनिव और प्रियंका निश्चिंत होकर ऑफिस जाने लगे । नीरजा उसे दादी कहकर बुलाती थी । अनिव और प्रियंका माँ कहकर संबोधित करते थे । प्रणति भी अब ऐसा महसूस करने लगी जैसे वह अपने बहू बेटे के साथ है । 

अनिव का प्रमोशन हुआ और उसका शहर के ही दूसरे ब्राँच में ट्रांसफ़र कर दिया गया था। उन्होंने प्रणति से कहा कि माँ हमें यह घर ख़ाली करना पड़ेगा। मैं रोज उतने दूर से आ जा नहीं सकता हूँ । अब और कोई रास्ता नहीं था इसलिए प्रणति का आशीर्वाद लेकर वे लोग चले गए थे । हाँ वे लोग वीकेंड में आकर प्रणति के साथ समय बिताकर जाते थे । प्रणति को अकेलापन महसूस नहीं होता था । जब वे आते थे तो दो दिन अच्छे से बिताते थे । 

एक वीकेंड जब वे आए तो उन्होंने बताया था कि प्रियंका फिर माँ बनने वाली है और आपके मदद की ज़रूरत है । प्रणति हाँ कह दिया था । अब अनिव के घर में ही रहने लगी। उन्हें बेटा पैदा हुआ । पाँच छह महीने उनके साथ रहकर अजय की देखभाल की ।  प्रणति ने सोचा अब मुझे अपने घर जाना चाहिए ।

उस दिन प्रणति रसोई में कुछ स्नेक्स बना रही थी कि नीरजा आई और कहने लगी दादी आप क्या बना रही हैं ।

नीरजा-  मै तेरे लिये स्नेक्स बना रही हूँ । जब तुम स्कूल से आओगी तो तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए चाहिए है ना । माँ अजय के साथ व्यस्त रहेगी इसलिए तुम्हारी पसंद की चीजें बना रही हूँ । माँ को तंग मत करना समझी । 

नीरजा- दादी आप यहीं रह जाओ ना हमें आपके साथ अच्छा लगता है। 

उसी समय अनिव और प्रियंका भी आ गए माँ हम अनाथ थे आपने हमें माँ का प्यार दिया है आप हमारे साथ रह जाएँगी तो हमें अच्छा लगेगा आपका आशीर्वाद हमें चाहिए। 

प्रणति ने कहा- देखो बच्चों अभी मैं स्वस्थ हूँ सब काम करने में सक्षम हूँ कल मेरी तबियत ख़राब हो जाएगी तो मैं तुम लोगों पर बोझ बन जाऊँगी है ना ।

उन्होंने माँ को गले लगाया और कहा कि आप हमारे लिए बोझ नहीं बन सकती हैं आप तो हमारे लिए ख़ुशियाँ लेकर आई हैं । प्रणति ने कहा दो दिन में आ जाऊँगी वहाँ कुछ काम है उसे पूरा कर लूँ ।

प्रणति घर गई और अपना थोड़ा सा सामान लिया और यह कमरा भी किराए पर देने का निश्चय किया और अपने बेटे बहू के घर की तरफ़ उसने कदम बढ़ा दिए । 

के कामेश्वरी 

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