कुंडी रिश्तों की -श्वेत कुमार सिन्हा

फैमिली कोर्ट में जज साहब अपने चैम्बर में बैठे आरव और वर्षा की दलीलें ध्यान से सुन रहे थें। आज उनदोनों की आपसी सहमति से तलाक की आखिरी सुनवाई थी। जज साहब ने दोनों पति-पत्नी को समझाने का काफी प्रयास किया कि तलाक न लें और अपनी डेढ़ साल की शादीशुदा ज़िंदगी को एक और मौका देकर देखें। पर सम्बंध-विच्छेद की क़गार पर खडे ये पति-पत्नी अपनी अलग ही धून अलाप रहे थें।

आज बाहर काफी ज़ोरों की आंधी-बारिश हो रही थी, मानो आकाश भी मोटे-मोटे आँसू बहा रहा हो! तेज़ हवा की वज़ह से जज साहब के चैम्बर का दरवाजा रह-रहकर जोर की आवाज के साथ बंद हो जाया करता, जिसे वहाँ खड़े एक प्रहरी ने पकड़ रखा था।

“देखिए, आज अंतिम मौका है। तलाक हो जाने के बाद फिर कुछ नहीं किया जा सकता। मैं फिर से कहुंगा कि आपदोनों अपनी शादी को थोड़ा समय दें और एक-दूसरे को अच्छे से समझने की कोशिश करें। यूं तैश में आकर रिश्ते खत्म कर लेना सही नहीं।” – जज साहब ने पति-पत्नी को समझाते हुए कहा।

पर आरव और वर्षा अपना निर्णय लेकर आए थें और जज साहब की बातों का उनपर कोई असर होते नहीं दिखा।

“जज साहब, मैं प्यार में अंधी हो गई थी जो इस गलत इंसान से शादी कर बैठी। हमदोनों का कोई मेल नहीं! नहीं रहना मुझे इसके साथ। बस आप हमारी तलाक मंजूर कर दें। मैं इसकी शक्ल भी देखना नहीं चाहती।” – वर्षा ने सम्बंध-विच्छेद का गुहार लगाते हुए कहा।


“हाँ, जज साहब। जब ये मेरे साथ रहना ही नहीं चाहती तो मुझे भी इसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करनी। इसे जो चाहिए, मैं देने को तैयार हूँ।”–आरव ने तलाक के लिए अपनी रजामंदी देते हुए जज साहब की तरफ देखकर कहा।

“मुझे इस इंसान से एक फुटी कौड़ी भी नहीं चाहिए। बस आप हमारी तलाक करा दें।”– वर्षा ने अपनी बात दुहरायी।

तभी एक –फटाक़- की आवाज़ के साथ जज साहब के कक्ष का दरवाजा बंद हो गया। हवा तेज़ चलने की वज़ह से शायद वह अटक गया था।

जज साहब, आरव और वर्षा के साथ भीतर ही बंद हो गए थें। बाहर कर्मचारियों में हड़कम्प मची थी, जिसकी आवाज भीतर तक सुनी जा सकती थी। वे सब अटक चुके दरवाजे को खोलने का लगातार प्रयास कर रहे थें, जिससे तलाक की सुनवाई थोड़ी देर रुक गई थी। भीतर से जज साहब ने आवाज़ देकर उन्हे रोकने का प्रयास किया। पर उनकी आवाज बंद दरवाजे से बाहर न जा सकी।

जज साहब अपनी कुर्सी पर बैठ दरवाजे के खुलने का इंतज़ार करते दिखे। आरव और वर्षा ने बंद दरवाजे पर निगाह डाली और फिर एक-दूसरे की तरफ देख आंखों-आंखों में कुछ बातें की।

जज साहब के सामने सिर झुंकाकर दोनों उठे और दरवाजे तक आए, जो अटक जाने के कारण बंद हो चुका था। तलाक के लोलुप पति-पत्नी ने बंद दरवाजे को नजदीक से निहारा तो जोर के झटके से बंद होने के कारण उसके माथे पर लगी कुंडी भीतर तक अटकी दिखी, जिसके वजह से वह खुल नहीं पा रहा था।

कुंडी शायद काफी पूरानी रही होगी, जिसकी वजह से वह दरवाजे की चौखट में घुसकर अटक चुकी थी। आरव और वर्षा ने कुंडी की तरफ देखा और उनकी निगाह एक-दूसरे पर आकर अटक गई। उन्हे इस बात का एहसास ही न रहा कि वे दोनों जज साहब के सामने खड़े हैं।

अटकी हुई वह कुंडी दोनों पति-पत्नी को उनकी बीती ज़िंदगी में लेकर चली गई, जब दोनों के परिवारवाले काफी मान-मनौवल के बाद उनकी शादी के लिए तैयार हुए थे और वर्षा अपने प्रियतम आरव की दुल्हन बनकर ससुराल में पहली बार अपना क़दम रखी थी।

घर में नववधू के आने से सभी खुश थें और पूरे परिवार में चहल-पहल का माहौल था। आरव भी अपनी मनचाही दुल्हन पाकर फुले नहीं समा रहा था, जिसका प्रतिबिंब वर्षा के चेहरे पर भी साफ-साफ झलक रहा था।

भीड़भाड़ वाले घर में नवदम्पत्ति को एकांत मिल पाना मुश्किल था और उनके भीतर दबी बेताबी को शादी में शामिल होने आयीं आरव की सभी भाभियों, मामियों ने ताड़ लिया था। आखिर वे सब भी कभी न कभी इस दौर से गुजर चुकी थी।

इस नवयुगल के मन की बेचैनी उनसे देखी न गई और मौका पाकर उन्होने एक कमरे को तैयार किया, ताकि इस नए जोड़े को एकांत मिल सके और दोनों एक-दूसरे के साथ थोड़ा समय बिता सकें।

अभी दोपहर के यही कोई तीन-सवा तीन बजे होंगे और खानापीना खाकर अधिकांश मेहमान और घर के सदस्य आराम फरमा रहे थें। इसिलिए सभी भाभी और मामियों की जमात ने यही समय ठीक समझा और आरव-वर्षा को किसी बहाने अपने साथ लेकर आए। फिर उनदोनों को कमरे के भीतर धक्का देकर कहा – “तुमलोगों के पास पंद्रह मिनट है, एक-दूसरे से अपनी मन की बातें करने की। दरवाजे की कुंडी भीतर से बंद कर लो। हमलोग यहीं आसपास पहरा दे रहे हैं। पर याद रहे, मात्र पंद्रह मिनट।” यह कहकर एक भाभी ने दरवाजे को बाहर से सटाते हुए वर्षा को भीतर से दरवाजे की कुंडी बंद कर लेने का इशारा किया।


सभी के सामने कमरे में यूं अकेले बंद होने पर दोनों यूवादंपत्ति मारे शरम के पानी-पानी हुए जा रहे थें। लेकिन यह वक़्त शरमाने का नहीं था। बल्कि शरम की सारी चादर उठा फेंकने का था, नहीं तो फिर ऐसा मौका दुबारा मिलने में न जाने कितने घंटे लगते या कुछ दिन। सहमी हुई वर्षा कमरे के एक कोने में खड़ी आरव को निहार रही थी। उसकी तरफ देख आरव ने छेड़खानी वाली मुस्कान भरी और दरवाजे की कुंडी चढ़ाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया। वर्षा भी अपना दिल थामें आरव को निहारती रही।

पर ये क्या! दरवाजे की कुंडी नदारद! वर्षा ने अपना सिर पिट लिया और लगी ठहाके लगाकर हँसने। इसपर बाहर से आवाज़ आयी-“धीरे। आवाज़ बाहर न आने पाये।”

“धत्त तेरे की!”– आरव ने कुंडी की तरफ अंगुली दिखाते हुए कहा, जैसे उसके धमकाने से कुंडी बंद हो जाए! फिर उसने कमरे में चारो तरफ अपनी निगाह फेरी। पर कहीं से कोई चारा न दिखा।

आरव को बेचैन देख वर्षा ने पास आकर उसका हाथ थामा और कमरे में मौजुद सोफे तक लेकर गई। फिर वहीं सोफे पर बैठ दोनों जीवनसाथी ने एक-दूसरे के साथ अपने दिल की सारी बातें बयां की और भावी ज़िंदगी से अपनी उम्मीद जाहिर की। एक-दूसरे की आंखो में खोए आपस में बतियाते एक घंटा कैसे निकल गया, पता ही न चला।

तभी बाहर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से दरवाजा पीटना शुरु कर दिया। जरूर यह मामी या भाभी ही होगी! आने दो, उनसे पुछते हैं कि कमरा तो दिला दिया पर इस बात की जाँच तक नहीं की कि दरवाजे में कुंडी है भी या नहीं।

आगे बढ़कर आरव और वर्षा ने एकसाथ हाथ लगाकर जोर से दरवाजा अपनी तरफ खींचा तो वह कडाक की आवाज़ के साथ खुल गया।

सामने कोर्ट के कर्मचारी पसीने से लथपथ और जज साहब के कोपभाजन का शिकार बनने को तैयार खड़े थें।

पर जज साहब के चेहरे पर मुस्कान थी। दरवाजा बंद होने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम मतभेद रूपी दरवाजे की जकड़ी हुई कुंडी खुल जाने की।

आरव और वर्षा अभी भी एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। वो प्यार जिसके सहारे दोनों ने आजीवन एक-दूसरे का दामन थामने की क़सम खायी थी, सोच रूपी जकड़ी हुई कुंडी के खुलते ही वह फिर से उनके दिलोदिमाग पर उभर आया था।

उनके खिले हुए चेहरे पढ़ने में जज साहब को सेकंड भी न लगा। आरव और वर्षा ने भी उनकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, जो उनके सम्बंध-विच्छेद नहीं बल्कि उनकी शादी के जन्म-जन्मांतर तक चलने का प्रमाण दे रहे थें।

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