जिज्जी-मीनाक्षी चौहान

मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है, उसका मेरे घर में यूँ आना-जाना। महीने में एकाध चक्कर लगा ही लेती है। माँ-बाबूजी बड़े खुश हो जातें हैं उसके आने पर। अपनी बेटी जो नज़र आती है उसमें, उन दोनों को लेकिन मैं ………..मैं उसे अपनी बहन नहीं मानता और क्यूँ मानूँ ? बहन तो मेरी एक ही थी जिसे मैं जिज्जी कहा करता था जो अपनी शादी के कुछ महिनों बाद ही एक एक्सीडेंट में हम सब को छोड़ कर चली गयी।

माँ-बाबूजी के लाख समझाने पर ही जीजाजी ने इससे ब्याह रचाया। चार महीने हुए हैं इसे जीजाजी की पत्नी और माँ-बाबूजी की बेटी बने हुए। जब देखो तब आ धमकती है हमारे यहाँ।  ये मेरे माँ-बाबूजी भी ऐसे हैं कि कोई कसर नहीं छोड़ते उसकी आवभगत, लेन-देन में ………और वो भी खूब जान छिड़कती है इस घर पर। पिछली दफा श्री कृष्ण-यशोदा की बड़ी सी पेंटिंग उठा लायी, सामने वाली खाली दीवार के लिए। माँ ने पैसे देने चाहे तो तपाक से बोलती है, “ये मेरा भी तो घर है।” कर लो क्या करोगे अच्छी जबर्दस्ती है उसकी।

इसी हफ्ते माँ ने बताया, “तू मामा बनने वाला है।”  मैं तो बड़ा खुश हुआ। मामा बनने पर नहीं ……….अब कुछ महीनों के लिए यहाँ के चक्कर लगने जो बन्द हो जायेंगे उसके, डॉक्टर ने आराम की सलाह दी है उसे।

आज जन्मदिन है मेरा। माँ-बाबूजी बीमार ताऊ जी को देखने गाँव गये हुए हैं। पहली दफा जन्मदिन पर यूँ अकेला बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। साफ़-सफाई करके निपटा ही था की डोर बैल बजी, खोला, देखा वो सामने खड़ी थी। अहिस्ता-अहिस्ता अंदर आयी और धीरे से सोफ़े पर बैठ गई। “माँ-बाबूजी तो गाँव गये हैं।” गुस्सा आ रहा था पर दिखा नहीं सकता था और खुशी वो तो चेहरे पर आ ही नहीं सकती थी।


“हाँ-हाँ, पता है मुझे। आज तेरा जन्मदिन है ना। सोचा तू अकेला होगा, मन नहीं माना तो चली आयी।” जन्मदिन की  मुबारकबाद देते हुए अपने पर्स में से बॉक्स से कलाई घड़ी निकाल कर मुझे पहना दी।

“ये घड़ी……..इसकी क्या जरुरत थी? मुझे नहीं चाहिए। ये तो बहुत महँगी है।”

“तुझे क्या? तेरे जीजाजी से कुछ नहीं लिया। तीन महीनों से पैसे जोड़ रही थी इस घड़ी के लिए।…….. माँ ने भी तो वादा किया था ना तुझे ये वाली घड़ी देने का। मैनें दी या माँ ने एक ही बात है और सुन ये टिफिन में तेरी पसंद का खाना बना के लायी हूँ टाईम से खा लेना।”

” पता है तुम्हें, मेरी जिज्जी भी बिल्कुल ऐसी ही थी।” बोलते-बोलते मेरी आँखो में आँसू आ गए।

“मैं भी तो तेरी जिज्जी जैसी ही हूँ,पगले।” मेरे बहते आंसुओ को पोछते हुए उसकी छुअन में अपनी बहन के स्पर्श की कोमल अनुभूति साफ़-साफ़ महसूस कर रहा था।

“जिज्जी जैसी नहीं तुम मेरी जिज्जी ही हो।” पहली दफा उसे जिज्जी बोल रहा था……..मुँह से भी और दिल से भी।

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