जब बहु…. बेटी बन जाती है – अनु अग्रवाल

 

“सुनो जी….. बाबूजी अक्सर माँजी के साथ शाम को सैर करने जाया करते थे…..माँ जी के जाने के बाद बाबूजी का उदास चेहरा मुझसे देखा नहीं जाता……आप दुकान से जल्दी आ जाते हो तो  बाबूजी को सैर पर ले जाया करो…. हो सकता है उन्हें अच्छा लगे…….निहारिका अक्सर अपने पति अर्पण से कहती।

तुम ही ले जाया करो बाबूजी को सैर पर…….दुकान से आने के बाद थक जाता हूँ बहुत- अर्पण

हाँ….. मैं तो ले जाऊं……लेकिन शाम का वक्त दीया बत्ती करने का…रात का खाना बनाने का…बच्चों के टयूशन का और सबसे बड़ी बात मोहल्ले वाले भी बातें बनाएंगे……….

यूँ मुझे बाबूजी के संग सैर पर देखकर- निहारिका ने चिंता भरे स्वर में कहा।

निहारिका के परिवार में……वो उसका पति…..दो बेटे……और उसके ससुर साथ मे रहते हैं। सास का देहांत अभी 2 महीने पहले ही अचानक से उठे सीने में दर्द की वजह से हो गया। थोड़े पुराने ख्यालात के जमीन से जुड़े लोग हैं आसपास…..निहारिका एक कुशल गृहिणी, आज्ञाकारी बहु, अच्छी पत्नी और एक बेहतरीन माँ है। घर में ससुर से सदा घूँघट में रहती है लेकिन उनका ख्याल बिल्कुल एक छोटे बच्चे की भाँति रखती है। दिल से मानती भी उन्हें पिता ही है।

फिर एक दिन…….

अर्पण जब दुकान से लौटा तो घर पर ताला लगा देखकर चौंक गया……तभी उसने देखा निहारिका बाबूजी का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे घर की तरफ ही आ रही थी।….कुछ औरतें उन्हें देखकर काना-फूसी कर रही थीं।

अपनी तरफ घूरती आँखों को निहारिका ने भी महसूस किया…..




“क्या हुआ आंटी जी….कोई परेशानी है आपको”- निहारिका ने सवाल दाग दिया।

“ये मेरे पापाजी हैं…..बीमार हैं……ठीक से चल नहीं सकते….रास्ते भूल जाते हैं……इन्हें खुली हवा की जरूरत है…..तो अगर मैं इन्हें सैर पर लेकर गयी तो…..आप सबकी खुसर फुसर क्यों शुरू हो गयी?”

सभी औरतें दरवाजे बंद करके झट से अंदर हो गईं।

निहारिका के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान के साथ-साथ संतुष्टि के भाव भी आ गए। आज उसने समाज की दकियानूसी सोच का “विरोध” कर दिया था।

अर्पण ये सब देखकर अपनी पत्नी पर गर्व महसूस कर रहा था।

निहारिका ने अर्पण को चाबी दी और तीनों घर के अंदर चले गए…..बाबूजी सम्भलकर….सीढ़िया हैं आगे- निहारिका ने बाबूजी को संभालते हुए कहा।

“हाँ…….. मैं ठीक हूँ मेरी बच्ची… .सच में……आज मुझे बहुत अच्छा लगा…तुम्हारी माँ के साथ बिताए पल भी जी लिये मैंने वहाँ……और आज से सिर पर घूँघट लेने की जरूरत ना है तुझे….आज से बेटी है तू मेरी… खुश रह …..”- बाबूजी ने निहारिका के सिर पर हाथ रखते हुए कहा।

आज बाबूजी के चेहरे पर कितने दिनों बाद मुस्कान आयी है…..वो भी सिर्फ तुम्हारे कारण…मुहल्ले वालों की परवाह किये बिना तुम बाबूजी को सैर पर ले गईं। इस घर के लिए तुम्हारा समर्थन वाकई काबिले तारीफ है।

 निहारिका….नाम तो मेरा अर्पण है लेकिन इस घर पर तुमने अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। थैंक्यू मेरी जीवनसाथी बनने के लिए- अर्पण ने निहारिका का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।

निहारिका मुस्कुरा जाती है।

“तो दोस्तों…..  निहारिका ने अपने ससुर के लिए समाज के विरुद्ध जाकर सही किया या नहीं? कमेंट में बताइएगा जरूर।

एक नयी कहानी लेकर जल्दी ही हाजिर होती हूँ।

#विरोध 

आपकी ब्लॉगर दोस्त-

अनु अग्रवाल।

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