घर..एक यात्रा कोने से कोने तक – रंजू अग्रवाल ‘राजेश्वरी’ : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : घर मे चहल पहल थी । महिलाओं बच्चों की चटर- पटर ,बर्तनों की खटर -पटर और डीजे पर फिल्मी धुनों की धमड धमड । इन सबके बीच सुशीला जी शांत अपने बिस्तर पर लेटी थीं ।आज उनकी पोती की शादी थी। हर तरफ खुशी का माहौल ।अपनी अस्वस्थता की वजह से सुशीला जी दूर से ही सब देखने को मजबूर थीं । 

“अरे ,बारात आ गयी ।”  किसी बच्चे की आवाज आते ही सभी महिलाएं बच्चे मुख्य द्वार की ओर दौड़ पड़े ।और इधर सुशीला जी के मन मस्तिष्क ने अतीत की दौड़ लगा डाली ।

टूटे डब्बों और थाली चम्मच को पीट कर जो धुन निकलती थी वो आज के समय मे डीजे की धुन से कम नही थी ।उसी धुन के बीच मे किसी बच्चे की जोर से चिल्लाने की आवाज से सब सजग हो जाते ।

“बिल्लो दीदी… गुड़िया की बारात आ गयी ।”

“अरे देखो तो रानी ने अपना गुड्डा क्या खूब सजाया है।”

“अरे मिन्नी ,अपने घर से बताशे नही लायी क्या ?”

“सुशी दीदी ,ये देखो गुड़िया की चुनरी ।मां की साड़ी के आंचल से फाड़कर बनाई है ।”

और इस तरह घर की सीढ़ी के नीचे बने छोटे से कोने में गुड़िया की पूरी शादी निपट जाती ।

सीढ़ी के नीचे का कोना जब मां ने खेलने के लिए उसके नाम किया तो उसे लगा ,जैसे उसे अपनी एक अलग दुनिया दे दी गयी हो ।झट से अपने सारे खिलौने लाकर वहीं सजा दिए ।सीढ़ी के नीचे का छोटा सा तिरछा कोना ही मानो उसका संसार बन गया था ।समय बीतता गया ।एक दिन माँ ने उसे बुलाया और कमरे के एक कोने की ओर इंगित करते हुए बोलीं …

“ले सुशी ,दादी के कमरे में तुम्हारे पढ़ने की मेज लगा दी है ।आगे सबका आना जाना लगा रहता है इसलिये तुम्हारी पढ़ाई में दखल पड़ता होगा ।और हाँ चाहो तो दादी की अलमारी में अपने कपड़े भी रख लेना ।” 

सुशीला के तो पैर ही जमीन पर नही पड़ रहे थे ।उस जमाने मे किसी को अलग से पढ़ने का स्थान और मेज मिल जाना किसी रईसी से कम नही था ।उसने जल्दी से मेज पर सिंधी कढ़ाई वाला मेजपोश बिछाया ।पुराने डिब्बे पर पतंगी कागज चढ़ा कर कलमदान बनाया और उसे एक कोने में सजा दिया ।किसी पत्रिका के पन्ने पलटते हुए देवानन्द की तस्वीर पर नज़र पड़ी तो सामने की दीवार पर उसे भी चिपका दिया ।सुशीला इतने चाव से यह सब कर रही थी मानो उसे एक नया घर मिल गया हो । छोटा सा अपना घर ।दूसरे दिन बहुत उत्साहित होकर उसने स्कूल में अपनी सहेलियों को अपने नए घर के बारे में बताया । 

बारहवीं के परीक्षाफल आते ही मां पिताजी को उसकी शादी की चिंता सताने लगी ।उस जमाने मे लड़कियों का इतना पढ़ लेना किसी कलेक्ट्री से कम नही था ।

पास के कस्बे में सुशीला की शादी हो गयी ।ससुराल पहुंचते ही जब अपने कमरे में कदम रखे तो जैसे मायका छूटने के गम भूल चुकी थी ।बड़े से गुलाबी दीवारों वाले कमरे में एक तरफ बड़ा सा पलंग ,उससे सटी  श्रृंगार मेज और सामने की दीवार से सटी लोहे की अलमारी ।लोहे की अलमारी ….हाँ ,उस समय गोदरेज की अलमारी भी किसी संपन्नता की निशानी से कम नही था ।एक पल को सुशी को अपनी आंखों पर यकीन नही हुआ ।”ये …इत्ता बड़ा कमरा !!!!! ये सच में क्या मेरा ही है ?”

यूं तो अब ससुराल ही उसका नया घर था ,फिर भी अपने कमरे का लगाव कुछ और ही होता है। सुशीला नए घर ,नए रिश्तों में रच बस गयी ।धीमे धीमे समय बीतता गया ।घर की पूरी जिम्मेदारी अब सुशीला के कंधों पर थी ।उसने बहुत मेहनत और लगन से घर और रिश्तों को सजाया संवारा ।

चंद वर्षों बाद  बेटे की शादी हुई ।घर का सबसे अच्छा कमरा बहु के लिए खाली कर दिया गया ।समय कब पंख लगाकर उड़ा पता ही नही चला और एक दिन …..वो चल बसे ।अर्थार्थ सुशीला के पति चल बसे ।

“माँ आप इतने बड़े घर मे अकेले कैसे रहेंगी ।आप हमारे साथ शहर चलिये ।”  बहू ने कहा 

 बेटे ने भी जब उसकी हाँ में हाँ मिलाई तो उसे लगा बच्चे ठीक ही तो कह रहे हैं ।और वह उनके साथ शहर चली गयी ।

कस्बे के बड़े से घर को छोड़कर शहर के डिब्बी नुमा घर मे रहना उसे रास नही आ रहा था लेकिन उसके अलावा कोई चारा भी नही था ।समय के साथ पोते पोती बड़े होते गए तो उनकी जरूरतें भी बढ़ने लगी ।

“मम्मी ,दादी को कहीं और शिफ्ट कर दो न “,  पोती ने कहा ।

“क्यों?” बहु ने चौंकते हुए पूछा ।

“नही मम्मी ऐसी कोई बात नही है ।दरअसल हम लोगों को देर रात तक पढ़ना होता है न ,तो लाइट जलाने की वजह से दादी की नींद खराब होती है ।”  पोते ने बहन की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ।

सुशीला ने सबकी बातें सुन ली ।सच ही तो कह रहे है बच्चे ।इतना छोटा सा घर ।उन्हें भी तो पढ़ने के लिए सुकून चाहिए ।और वैसे भी उसे कमरे की जरूरत ही क्या है ।एक अटैची कपड़े ही तो उसकी कुल संपत्ति है ।

“अरे बहु ,बच्चे ठीक कह रहे हैं ।ऐसा करो सीढ़ी के नीचे पूजा घर के पास इतनी जगह तो है ही कि मेरी चारपाई आ जायेगी ।तुम मेरी व्यवस्था वहीं कर दो ।”

“पर मांजी ,कोई आएगा तो क्या कहेगा ?सास को कहां सुलाती है।”

“अरे कोई क्या कहेगा ,इससे हमें क्या ।तुम बस मेरी चारपाई यहीं लगा दो ।देखो पूजा घर ,स्नान घर सब पास में है ,मुझे तो बहुत आराम हो जाएगा ।बच्चों की पढ़ाई में खलल नही पड़ना चाहिए ।

सुशीला की जिद के आगे बेटे बहु को भी झुकना  तो पड़ा पर मन ही मन माँ की समझदारी पर खुश भी हो रहे थे ।

सालों बीत गए ।पोते पोती बड़े हो गए ।आज उसी पोती की शादी थी  । 

उधर …..पूरा परिवार बारात की अगवानी में व्यस्त था इधर सुशीला जी सोच रहीं थी कैसे एक कोने से शुरू हुआ सफर फिर एक कोने पर आकर रुक गया है ।समय  बदलने के साथ किस तरह इंसान  के अधिकार क्षेत्र भी बदलते हैं ,जिसे हम सबको स्वीकार करना ही है । शायद यही नियति है ।

रंजू अग्रवाल ‘राजेश्वरी’

गोरखपुर

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