गँवार – डाॅ संजु झा  : Moral Stories in Hindi

अमेरिका में बसे हुए अक्षय जैसे ही दफ्तर से घर आता है,वैसे ही उसके फोन की घंटी बज उठती है।फोन पर चाचा का नाम देखते ही उसका मूड खराब हो जाता है,फिर भी अनमने ढंग से फोन उठाता है।चाचा रमेश जी कहते हैं -” बेटा!तुम्हारी माँ इस दुनियाँ में नहीं रहीं,तुम पिता की मृत्यु समय तो नहीं आ सके,कम-से-कम इस बार आकर मातृॠण से मुक्त  हो जाओ।”

माँ की मौत की खबर से अक्षय सन्न रह जाता है।अचानक से उसके शरीर में कंपन होता है।माँ की ममतामयी छवि,स्पर्श की गर्माहट उसके रुह को भिंगो जाती है।

उसे इस हालत में देखकर उसकी पत्नी  नीना पूछती है -” अक्षय!क्या हुआ?”

अक्षय -” नीना!माँ गुजर गई। जाना होगा।”

नीना -” चलो!अच्छा हुआ। उस गँवार  औरत के जीने से क्या फायदा था!”

अक्षय आग्नेय नेत्रों से पत्नी की ओर देखने लगा।उसके दोनों बच्चे सहमकर माँ के पीछे छिप गए।

अक्षय आहत मन से धम्म से कुर्सी पर बैठ गया।पलभर में माता-पिता का प्यार उसके दिल में मचलने लगा।माता-पिता के प्यार और अपनेपन  को तो वह लगभग दस वर्ष  पूर्व  पूर्णतया भूल चुका था।माँ से गाहे-बगाहे औपचारिक बातें हो जाया करतीं थीं। पिता के गुजरने के बाद  भी उसने कभी भी माँ की भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की।परदेस की व्यस्तता और चकाचौंध भरी जिन्दगी ने उसके आँखों पर पट्टी बाँध दी।अमेरिका आने के दस वर्ष तक तो वह अकेले ही माता-पिता से मिलने भारत जाता था,परन्तु समय के साथ उसकी प्राथमिकता विदेश में बसने की हो गई। पिछले दस वर्षों में लगभग वह अपना वतन और अपने माता-पिता को लगभग भूल ही चुका था।

 उसके पिता एक मामूली सरकारी नौकर  थे और उसकी माँ सीधी-सादी गृहिणी।पिता काम के सिलसिले में प्रायः बाहर ही रहते थे,परन्तु  माँ अल्पशिक्षित होते हुए  भी  दीये की तरह विपरीत परिस्थितियों में तेज झोंके से जूझते हुए  अपनी संपूर्ण  ओजस्विता से अपने संतान के व्यक्तित्व के संपूर्णता के यज्ञ में स्वंय को होम करती रही।  जब अक्षय ने आई.आई.टी की परीक्षा पास की तो उसके पिता ने मजाक करते हुए अपनी पत्नी से कहा -” रमा! तुम्हारे बेटे को देखकर  कौन कह सकता है कि तुम अनपढ़ गँवार  हो?तुमने बेटे को इतने अच्छे संस्कार और इतनी अच्छी शिक्षा दी है!”

पति की बातें सुनकर रमा जी बस मुस्कराकर रह गईं।

समय के साथ  अक्षय की पढ़ाई पूरी हो गई। बेटे को देखकर माता-पिता खुद को गौरवान्वित महसूस करते।अक्षय ने अपनी पसन्द की लड़की नीना से शादी कर ली।माता-पिता बेटे की खुशी में ही खुश थे।आरंभ में अक्षय अपने देश में ही नौकरी कर रहा था।वह अपने माता-पिता को अपने पास रखकर उन्हें जमाने भर की खुशियाँ देना चाहता था,परन्तु उसकी पत्नी नीना को गँवार  सास-ससुर के साथ रहना गवारा नहीं था।सास-ससुर के रहते हुए उसे अपनी आजादी में खलल महसूस  होती।नीना हमेशा सास-ससुर के साथ उपेक्षित व्यवहार करती।एक दिन काम करते हुए उसकी सास  रमाजी के हाथ से एक कप टूटकर गिर पड़ा।नीना ने उन पर चिल्लाते हुए कहा -” अरे गँवार!तुझे क्या पता कि यह कितना महँगा सेट था।मेरे पिताजी ने इसे बाहर से विशेष रूप से मेरे लिए मँगवाया था।एक भी काम ढ़ंग से नहीं कर सकती।दिनभर गँवारों जैसा सिर पर पल्लू समेटती रहती है।”

शोर सुनकर अक्षय पूछता है -“नीना! क्या हुआ?क्यों माँ पर चिल्ला रही हो?कप टूटने से तूफान  तो नहीं आ गया।कप ही तो था,फिर आ जाऐंगे।”

नीना ने और जोर से चिल्लाते हुए कहा -” अक्षय! तुम्हारे गँवार माता-पिता को बहुत बर्दाश्त कर लिया,पर अब और नहीं!अपने माता-पिता की तरफदारी बन्द करो।आज तुम्हें फैसला करना होगा कि  इस घर में तुम्हारे माता-पिता रहेंगे या मैं!”

अक्षय -” नीना!अभी शांत हो जाओ,बाद में बातें करेंगे।”

नीना -” बाद में क्यों?मुझे अभी जबाव चाहिए। “

दूसरे कमरे में बैठे अक्षय के माता-पिता सारा तमाशा देख और समझ रहे थे।रमाजी कप टूटने से खुद को

गुनाहगार समझकर  हिचकियाँ लेकर रोएँ जा रहीं थीं।जब अपमान का बाँध टूटकर उसके पिता सोमेश जी के  हृदय को क्षत-विक्षत करने लगा,तब कमरे से बाहर आकर उन्होंने कहा -“बहू!शांत हो जाओ।अपने गुजारे के लिए  हमारी पेंशन ही काफी है।हमलोग कल सुबह अपने गाँव चले जाऐंगे।”

अक्षय भी  इसमें ही माता-पिता की भलाई समझकर चुपचाप रह गया।अगली सुबह अक्षय के माता-पिता अपने गाँव चले गए। बीच-बीच में अक्षय अपने माता-पिता से मिलने गाँव जाता था।नीना को गँवार सास-ससुर का चेहरा देखना भी गवारा  नहीं था।कुछ समय बाद  अक्षय  दूर देश अमेरिका में अपने भविष्य निर्माण की नींव रखने चला गया।वहाँ की सपनीली दुनियाँ ही अलग थी।वहाँ जाकर धीरे-धीरे सबकुछ भूलने लगा।

बेटे अक्षय के अमेरिका चले जाने से दोनों पति-पत्नी का शरीर मानो खोखला-सा हो गया।बेटे के साथ उनकी आत्मा चली गई हो।उन्हें न तो खाने की सुधि रहती,न ही सोने की।पुत्र वियोग में दोनों की तबीयत काफी खराब रहने लगी।ऐसे समय में  सोमेश जी के छोटे भाई रमेश और उनका परिवार उनकी देखभाल करने लगा।दोनों भाईयों के चुल्हे दो से एक हो गए।  उनके बीमार  होने पर भाई-भतीजे उन्हें शहर ले जाकर डाॅक्टर से इलाज करवाते।

 

अपना बेटा अक्षय तो पूर्णतया विदेशी रंग में रंगकर माता-पिता को भूल ही चुका था।माता-पिता की आँखें रोज बेटे की  एक झलक देखने को आतुर रहतीं।रमाजी की आँखें हमेशा आँसुओं से गीली रहतीं,फिर  भी बेटे की यादों का उजास उनके मन को किसी मन्दिर  के गर्भगृह  की जलती लौ की तरह आलोकित किए  रहती।संतान का मोह  दुनियाँ का सबसे अबूझ रिश्ता है।संतान निर्मोही हो जाती है,परन्तु  माता-पिता का मोह अटूट रहता है।

समय के साथ बेटे के प्रति सोमेशजी का मोह कम होता जा रहा था।उनके दिल बार-बार यह सोचकर कचोटता कि जिस बेटे की खातिर उन्होंने कभी भाई-भतीजों की परवाह  नहीं की,आज वही लोग उनके बुढ़ापे की लाठी बनकर खड़े हैं। एक दिन पश्चाताप करते हुए  सोमेश जी ने अपनी पत्नी से कहा -” रमा!तुम बहुत भोली हो,अगर मुझे कुछ हो गया तो खुद को कमजोर मत समझना।मेरे भाई-भतीजे तुम्हें सम्मान के साथ रखेंगे।”

रमा जी -” अपना बेटा तो निर्मोही हो गया।क्या मैं जिन्दगी भर इनलोगों पर बोझ बनकर रहूँगी?उनकी निःस्वार्थ सेवा का मूल्य मैं कैसे चुकाऊँगी?”

सोमेश जी-” रमा!तुम उसकी चिन्ता मत करो।अपना बेटा तो परदेस से वापस लौटने से रहा।कुछ दिनों में वकील से बात कर अपनी सारी जायदाद भाई-भतीजों के नाम कर दूँगा।”

 पति के विचारों से रमा जी ने भी  सहमति जताई। परन्तु सच ही कहा गया है कि आनेवाला कल किसने देखा है!सोमेश जी की मंशा धरी- की- धरी रह गई। अगले चन्द दिनों में ही वे भगवान को प्यारे हो गए। उनकी इच्छा अधूरी ही रह गई। पिता की मृत्यु पर भी काम का बहाना कर अक्षय नहीं आया।सारे क्रिया-कर्म भाई-भतीजों ने ही पूरे किए। सबसे बड़ी बात इस विपत्ति की घड़ी में रमाजी को भी इन्हीं लोगों ने सँभाला।धीरे-धीरे रमाजी सँभलने लगीं।सचमुच औरतें सहनशील होती हैं।रिश्तों के खोखलापन और खालीपन को पी जाती हैं।किसी को कुछ नहीं बतातीं।

 धीरे-धीरे अब रमा जी अपने देवर और उसके परिवार में ही अपने गुम हुए सुख को तलाशने लगीं।एक दिन रमाजी ने वकील को बुलाकर पति की अधूरी इच्छा पूरी कर दी।अपनी सारी जायदाद देवर रमेश जी के नाम कर दी।

माँ की मृत्यु की खबर सुनकर अक्षय परिवार  समेत स्वदेश आया।चाचा के अपनेपन और सहयोग से सारा क्रिया-कर्म आसानी से निबट गया।उसके बाद  अक्षय ने अपने हिस्से की जमीन बेचनी चाही,तो उसे असलियत पता चली।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी सीधी-सरल माँ इतना बड़ा कदम उठाकर उसे सम्पत्ति से बेदखल कर सकती है!सम्पत्ति से बेदखल की बात सुनकर  नीना ने आँगन में निकलकर जोर-जोर से चिल्लाते हुए कहा -“अक्षय!तुम्हारी गँवार माँ में इतनी हिम्मत कहाँ थी कि खुद इतना बड़ा कदम उठाती?इनलोगों ने बहला-फुसलाकर सारी जायदाद अपने नाम करवा ली है।”

अक्षय  चाचा के परिवार के अपनत्वपूर्ण व्यवहार से मन-ही-मन में उद्वेलित हो रहा था।चाचा के खिलाफ कुछ बोलने में उसकी वाणी अवरुद्ध होकर साथ छोड़ रही थी।नीना का चिल्लाना जारी था।

अक्षय के चाचा रमेश जी ने शांत करते हुए कहा -” बहू!झूठ-मूठ का तमाशा कर मरने के बाद भी भाभी का अपमान मत करो।वे भोली जरुर थीं,परन्तु गँवार नहीं!सही-गलत की उन्हें समझ थी।अगर अपनी सम्पत्ति वापस लेना चाहो,तो मुझे कोई एतराज नहीं है।”

चाचा की बातों से क्षणभर में अक्षय को एहसास हो गया कि इसी चाचा ने बचपन में उसे बाँहों के झूले में झुलाया था।उसके माता-पिता से छुपकर  उसकी हर जिद्द पूरी किया करते थे।अपने बच्चों से ज्यादा प्यार  और दुलार किया करते थे। चाचा के प्यार की संचित निधि आज उसकी संपत्ति की तुला पर भारी पड़ रही थी।

अक्षय ने भावविह्वल होते हुए कहा -” चाचा! आपकी बात बिल्कुल सही है।गँवार  माँ नहीं थी,गँवार तो  हम थे जो माता-पिता की भावनाओं को नहीं समझ सकें।आज आपके निस्वार्थ प्यार पर भी शक कर रहें हैं!आपलोगों के अपनेपन से बढ़कर कोई  सम्पत्ति नहीं है।आपके प्यार  और अपनेपन को सदैव दिल में बसाकर रखेंगे। हमें भी एहसास  होता रहेगा कि अपने वतन में हमारा भी कोई  हमदर्द  रहता है।

यही प्यार  एक दिन हमें स्वदेश वापस खींच लाएगा।

नीना भी अपनी गलती मानकर उनलोगों से क्षमा माँगती है।चाचा परिवार  के साथ अक्षय के परिवार को भींगे नयनों से अमेरिका के लिए  रवाना करते हैं।अक्षय को महसूस  होता है कि एक बार फिर  वह अपने वतन में बहुत कुछ छोड़कर  परदेस जा रहा है।

समाप्त। 

लेखिका-डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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