बरसात – उमा वर्मा

मनीषा दिल्ली से रांची के लिए सफर कर रही है ।दो महीने से अपने परिवार के साथ थी।बहुत अच्छा लगा ।सावन का महीना है और झमाझम बारिश भी हो रही है ।ये बरसात ना ,कितने अच्छी  बुरी यादें लेकर आई है ।बचपन में स्कूल जाती और पानी बरसता तो जान बूझ कर पानी में भीगती ।मुँह खोल कर पानी की टपकती बूँद को महसूस करने की बात ही कुछ और थी ।उस दिन भी स्कूल के लिए निकली ही थी कि बरसात शुरू हो गई ।और मनीषा ने मंजू के साथ खूब  छपाछप किया था ।

घर आइ तो माँ ने खूब खबर ली थी ।”” कहाँ घूम रही थी अब तक, देखो तो पानी में सारे कपड़े भीग गये हैं “” दूसरे दिन जबरदस्त बुखार  हो गया ।माँ का गुस्सा चरम पर था।वह तो पापा ने ही बचाव किया ।इलाज चलता रहा।लेकिन माँ ने बात ही बन्द कर दिया था ।वह एक दिन की बात नहीं थी ।मनीषा को पानी में भीगने की आदत हो गई ।और माँ से डांट सुनने की।दुसरे साल नानी घर जाने की तैयारी होने लगी थी ।नाना जी आकर ले गये ।

देहात का रहन सहन ही कुछ ऐसा था कि मनीषा को खूब अच्छा लगता ।चक्की में गेहूं और सत्तू पिसाता ।ओखल मे धान कुटाई होती ।बहुत अच्छा लगता उसे ।नौकर चाकर  बहुत थे वही लोग सारे काम करते ।सत्तू पीस रही मंगला से उसने एक मुट्ठी चना मुँह में लिया ही था कि नाना जी की फटकार लगी ।”” तुम ने  सारे चने जूठे कर दिए,अब क्या  खाक भंडार में रखाएगा”” बाप रे नाना जी का गुस्सा ।

उसने तो सोचा ही नहीं था ।हद तो तब हो गई जब फिर उस दिन खूब मुसलाधार बारिश होने लगी थी और मनीषा घर के आँगन वाले कोने में खूब भीगती रही थी तभी  नाना जी का पदार्पण हुआ “” ए लड़की, चल तुझे अभी पहुँचा दू।भीग भीग कर तबियत खराब करेगी तो माँ बाप कहेगा मेरी बेटी पर किसी ने ध्यान नहीं दिया “” दूसरे दिन वह पहुंच गयी अपने घर ।


बड़े गुस्से वाले थे नाना।नानी जब से गुजर गयी तभी से उनका स्वभाव बदल गया था ।बात बात पर नाराज हो जाते।पर मजाल जो किसी मे उनकी बात काटने की हिम्मत ही नहीं थी ।मनीषा को ट्रेन में नींद भी नहीं आ रही थी ।अपने बचपन को जीती हुई सफर चल रहा था ।सच में बचपन हर गम से बेगाना था ।मस्ती भरा ।दादाजी के यहाँ सावन में झूले लग जाते ।फिर हम जोली सहेलियां आ जाती और खूब बारहमासा गाती थी सब ।अब की पीढ़ी क्या जाने बारहमासा क्या  होता है ।

होठों पर एक मुस्कान तैर गई उसके ।कम उम्र में शादी हो गई थी ।पांच पांच  लड़की घर में थी तो समय पर सब को निभाना भी तो था ।मनीषा तो दो ही बहन थी तीन उसकी बुआ थी।अच्छे  घर में शादी हुई थी ।खूब घूमने जाती, सिनेमा जाती ।पिकनिक चलता ।सब कुछ ठीक चलने लगा था की एक दिन बारह बजे का शो देखकर लौट रही थी ।स्कूटर थोड़ी दूर चला कि सामने से बस आ गया और फिर एक जोरदार टक्कर से वह दूर जा गिरी।

बरसात की अँधेरी रात थी वह तभी से उसे बरसात में निकलने से डर लगता है होश आया तो एक बूथ पर जाकर अस्पताल में एम्बुलेंस के लिए फोन किया ।पति देव  को अधिक चोट लगी थी ।उन्हे एडमिट कराया और घर लौटी।दरवाजे पर मा खड़ी थी “” तुम इतनी रात को अकेले क्यो? दामाद जी  कहाँ है? “” एक साथ इतने सवाल, वह घबरा गयी ।”” माँ, उन्हे अस्पताल में भर्ती कराया गया है, चोट लगी थी “”।

माँ का रोना धोना शुरू हो गया ।फिर अस्पताल दौड़ा दौड़ी  शुरू हो गई ।पूरे एक महीने तक इलाज चला ।पति ने कसम खिलाया कि अब बरसात में नहीं निकलना है ।उम्र के इस पड़ाव पर भूली बिसरी यादें ही तो जीवन का सहारा होती हैं ।खुशियाँ ही तो सिर्फ नहीं थी उसके जीवन में ।बहुत को खोया भी तो है  बरसात में ।अपनी दादी, अपनी दोस्त, वीणा दीदी, अपनी एक और प्यारी सखी को भी ।बचपन की पानी में उछलकूद, जवानी में मेहंदी का लगाना, इस उम्र में दोस्त को खोना  सब कुछ बरसात ने ही दिया है ।फिर भी बरसात बहुत अच्छा लगता है मनीषा को।अरे, सुबह हो गई ।ट्रेन पहुचने ही वाली है ।रात भर वह न जाने क्या क्या याद करती रही ।उटपटांग बातें ।जीवन भी तो ऐसा ही है उटपटांग ।एक मुस्कान तैर गई उसके होठों पर ।वह तो बस अपने मन की बात लिखना चाहती है ।लिखना उसका जीवन है ।

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