अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 30) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

“रातों रात ऐसा क्या कर दिया भाभी आपने कि भैया के सुर बदले बदले हैं, जो भैया बुआ को किसी से बांटना नहीं चाहते थे, संभव भैया से भी नहीं। संभव भैया तो इस बात से काफी दिन नाराज भी रहे थे और आज मेरे भैया पर इस जादू की पुड़िया ने ऐसा क्या जादू कर दिया कि”…..संपदा कॉलेज जाने से पहले फिर से एक बार विनया के पास आकर फुसफुसाती हुई मुस्कुरा कर कहती है।

“वो कहते हैं ना दीदी, जब कोई चीज दिल से चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने में जुट जाती है, बस यही हुआ है दीदी। आप कॉलेज जाइए, मैसेज पर बात किया जाएगा।

“संपदा, विनया को आराम करने दो, रात भर प्लान ए, प्लान बी करती जगी रही है।” अंजना सबके नाश्ता कर टेबल से उठने के बाद विनया के लिए सूप लिए कमरे में आती है और संपदा को बतियाते देख नाराजगी से कहती है।

“ओह हो मेरी प्यारी मम्मी, रखिए आप अपनी बहू–बेटी का ध्यान। मैं चलूॅं कॉलेज।”

“वाह मम्मी, आपने ध्यान दिया, बहू–बेटी।” संपदा दरवाजे से मुड़ कर आती हुई अंजना से कहती है।

“क्या बहू–बेटी, साफ साफ कभी बोलेगी ये लड़की।” अंजना विनया की ओर सूप का बॉल बढ़ाती हुई संपदा को संबोधित करती है।

“अरे मम्मी, भाभी आपकी बहू हैं और प्यार आपसे बेटी की तरह करती हैं तो आप उन्हें बहू–बेटी बोला करें ना। भाभी का आज से नया नाम बहू–बेटी।” संपदा कहकर गुनगुनाती हुई कमरे से बाहर निकल गई।

“सच ही कहा संपदा ने, प्यार तो तुम मुझे बेटी की तरह ही करती हो। तो बताओ बहू–बेटी कहें तुम्हें।” अंजना विनया संग अब बेतकल्लुफ हो गई थी।

“प्यार तो प्यार होता है माॅं, क्या बहू क्या बेटी, ये तो दुनिया ने बना दिया। आप जो चाहें कहें, मुझे कोई ऐतराज नहीं है। बस प्यार यही वाला चाहिए।” हाथ में पकड़े सूप के बॉल की ओर इशारा करती विनया अपने चेहरे पर खुशी और आदर भरा मुस्कान बिखेरती हुई उस प्यार भरे पल का आनंद ले रही थी। विनया ने माँ से एक सरल और सच्चे भाषा में प्यार की महत्वपूर्णता को साझा किया।

विनया सूप के बॉल के हवाले से इशारा करती हुई कहती है, “यही सामान्य और रोज़मर्रा की घटना जीवन को सुंदरता से भर देती है माॅं।” विनया सूप का सिप लेकर उंगली से स्वादिष्ट का चिन्ह बनाती हुई कहती है।

और अंजना की मुस्कान से जाहिर हो रहा था कि छोटी-छोटी प्रशंसाएं जीवन को सजीवता और सुंदरता से भर देती हैं। उस छोटी सी मुस्कान से स्पष्ट हो रहा था कि अंजना ने विनया की बातों को समझा और स्वीकार किया है। उनकी मुस्कान में एक प्रकार की संतुष्टि और समझदारी की भावना थी, जो छोटी-छोटी प्रशंसाओं और सामान्य अनुभवों में छिपे हुए सुंदरता को महत्व देती है। उनकी मुस्कान से झलक रहा था कि उन्होंने विनया की दृष्टिकोण को समर्थन किया और जीवन की छोटी छोटी खुशियों में जीवन को सुंदर बनाने के लिए तैयार हैं। इस तरह की मुस्कान ने उस समय को एक गहरे अनुभव में बदल दिया।

“मामी, मैं, मम्मी और कोयल और मौसी शहर भ्रमण के लिए जा रहे हैं। आप भी चलेंगी।” संभव कमरे में आता हुआ विनया और अंजना पर नजर डालता हुआ कहता है।

“तबियत कैसी है विनया अब तुम्हारी।” कोयल गोलू को लिए कमरे में आते ही विनया की तबियत पूछती है।

“ओह सॉरी विनया।” संभव कोयल के पूछने पर अपनी गलती समझता हुआ विनया से कहता है।

“आज तो ऐसा लग रहा है जैसे संभव का पुनर्जन्म हुआ है। इनके चेहरे पर छाई नूर देख रही हैं मामीजी और ये नूर आया है आपके साहबजादे की इनायत से, माॅं–बेटे की घुम्मी घुम्मी में मैं हड्डी हो जाऊॅंगी।” कोयल गोलू को एक कंधे से दूसरे कंधे पर डालती हुई अंजना से हॅंसती हुई कहती है।

“कोयल बहू मैं नहीं जाऊॅंगी।” तो खाने के टेबल पर प्रस्ताव देते समय ना तो मनीष ने उसका नाम लिया था और ना ही कोयल ने अभी उसका कोई जिक्र किया। मंझली बुआ को यह अपमान के समान लगा और वो आहत होकर बैठक से ही जोर से कहती हैं।

मंझली बुआ का मन, जिसे यह अपमान महसूस हुआ है, आहत और उदास हो रहा है। उनकी आंखों में व्यक्त हो रहा दर्द और उदासी बता रहा है कि उसे यह अहसास हुआ है कि उसका समर्थन और मौजूदगी सबके लिए नगण्य है। उनकी भरी हुई आँखों में छुपा हुआ दुख और आत्मविश्वास की कमी का असर दिखाई दे रहा था, जिसने अपमान को महसूस करते हुए उनके मन को घेर रहा था।

“क्यों मौसी जी!” कोयल आश्चर्य से अंजना की ओर देखती कमरे से बाहर निकल गई।

“मैंने मनीष से टिकट के लिए कहा है। मैं घर जाना चाहती हूॅं।” मंझली बुआ कह ही रही थी कि….

“क्यूं घर क्यों, मुझे दिक्कत होगी और मुझसे बिना पूछे कैसे।” बड़ी बुआ सुनते ही हड़बड़ा कर कमरे से बाहर आती हुई बहन से जोर कहती है।

“दीदी वो वहाॅं सबको दिक्कत होती है। यहाॅं तो सब कोई हैं, फिर कोयल भी है ही तो आपको कोई दिक्कत नहीं आएगी।” बड़ी बहन से हमेशा दबी दबी रहने वाली मंझली बुआ किसी तरह बोल सकी। 

“वाह रे दिक्कत, अचानक से कैसे प्रकट हो गई। संभव फोन लाओ, जब तक मैं यहाॅं हूॅं, कहीं नहीं जा रही है ये।” संभव की ओर देख कर बड़ी बुआ कटुता भरे स्वर में कहती है।

बड़ी बुआ की चेहरे पर अचानक से उतरी हुई चिंगारी और उनके स्वर में कटुता से भरी आवाज़ ने वातावरण को सभी के लिए तत्काल एक अकेलापन में परिवर्तित कर दिया। उनकी बड़ी, तेज आंखें संभव की ओर देख रही थीं, जैसे कि उनमें से आग निकल रही हो। उसके शब्दों में छिपा हुआ अधूरा गुस्सा और आक्रोश बड़ी बुआ के दूसरों को कंट्रोल करने की भावना को दिखा रहा था। 

उनके आस-पास की स्थिति, लोग और घटनाएं उनके नियंत्रण में रहें। उन्होंने हमेशा दूसरों के परिवर्तन को अपनी इच्छा के अनुसार प्रबंधित किया था और अभी मंझली बुआ बिना उनसे पूछे जाने का निर्णय ले लेना, उन्हें उनके अधिकार को समाप्त करने के समान लग रहा था। उन्होंने मंझली बुआ को बिना पूछे जाने उनके अधिकारों को छीनने का निर्णय लेते हुए, अपने स्वार्थ की प्राथमिकता को दिखाया। इस परिस्थिति में उनकी चीखें और उनकी आवाज़ उनके नियंत्रण से बाहर हो रही थीं, जिससे वह अपनी बहन पर बेतहाशा चीख रही थी।

“माॅं, आप शांत हो जाइए। अभी तत्काल तो मौसी नहीं जा रही हैं और इनका भी तो घर है ना।” संभव माॅं को चुप कराता हुआ कमरे से निकल कर आए अपने मामा जी की ओर देखता है।

संभव से नजर मिलते ही मामा जी निर्विकार भाव से पलट कर फिर से अपने कमरे में ही चले गए। संभव चाहता था कि वो अपनी बहन को समझाएं लेकिन उनकी निशब्द चुप्पी जीत गई थी। उनके इस अकेलापन भरी यात्रा में उनकी विचारशीलता उन तक ही सीमित रहती थी। 

विनया और अंजना भी अपने कमरे से बाहर निकल आई थी, लेकिन दोनों में से किसी ने भी माॅं–बेटे की बातों में पड़ने की उत्सुकता नहीं दिखाई। संभव समझता था कि उसकी माॅं के व्यवहार के कारण कोई भी कुछ बोलना पसंद नहीं करता है। वो भी अपनी माॅं के व्यवहार अक्सर दुखी हो उठता था। लेकिन थी तो वो उसकी माॅं ही, सोच कर संभव उन्हें समझाने का प्रयास कर रहा था।

“अच्छा ठीक, अभी तुरंत तो मौसी नहीं जा रही हैं ना, अभी तो आप हमारे साथ भ्रमण पर चलिए।” संभव मौसी से लाड़ जताता हुआ कहता है।

“नहीं बेटा, मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है। वैसे भी तुमलोगों के बीच मैं तो हड्डी ही रहूंगी ना।” कोयल की ओर देखकर मंझली बुआ कहती है।

“ओह, हो तो ये बात है। मौसी का नाम नहीं लिया गया, इसलिए नाराज हैं। वही तो मैं सोचूं, दोनों एक ही थाली के चट्टे बट्टे है। अचानक इतनी अक्ल कैसे आ गई इन्हें।” कोयल सोच कर मुस्कुराती है और प्रत्यक्ष में कहती है, मौसी, “वो आप गलत समझ रही हैं, मैं तो संभव की टांग खिंचाई कर रही थी इसीलिए आपके बारे में नहीं कह सकी। चलिए चलिए, अब उठिए, तैयार हो जाइए। ठंड का मौसम है, रात जल्द हो जाएगी।” कोयल संभव की गोद में गोलू को देकर मंझली बुआ को हाथ पकड़ कर खड़ी करती हुई कहती है।

“माॅं, आज घर में कोई नहीं है और मुझे आपसे कल की अधूरी बातें पूरी करनी है।”सब काम निपटा कर ऑंचल से हाथ पोछती कमरे में आती अंजना से विनया कहती है।

“फिर वही सब बातें। बेटा तुम अपनी गृहस्थी पर ध्यान दो।” तह किए कपड़ों को जगह पर जमाती हुई अंजना कहती है।

“इस गृहस्थी को आपकी अहमियत समझ आते ही मेरी गृहस्थी की गाड़ी भी सरपट दौड़ने लगेगी। ये सब मैं आपके लिए थोड़ी ना, खुद के लिए कर रही हूं। बैठिए इधर।” अंजना के हाथ से कपड़े लेकर बगल में रखती हुई विनया अंजना को भी हाथ पकड़ कर बिस्तर पर बिठाती है।

“टू द प्वाइंट बात ये है माॅं कि आप कुछ दिनों के लिए बीमार हो जाइए।” विनया एकदम से कहती है।

“क्या!” अंजना के चेहरे पर पहेली नहीं सुलझ रही का भाव आ गया था। उसके चेहरे पर चौंके हुए आश्चर्य और हैरानी की छवि छाई थी, जैसे कि उसने कुछ अत्यंत अजीब या अनप्रत्याशित सुना हो। उसकी आंखें जिज्ञासा, हैरानी और एक प्रकार की संशयात्मक आश्चर्य से भर गई थी, जिसमें विश्वास और संदेह की मिश्रित भावना स्पष्ट रूप से उभर रही थी।

हाॅं, बिल्कुल सही सुना आपने, “कब से बीमार नहीं हुई हैं आप।” अपने कलाई में डाले चूड़ी से खेलते हुए विनया पूछती है।

“बीमार का क्या है बेटा, वो बीमारी ही थी, जिसने मुझसे मेरे बच्चों को दूर कर दिया। पति के सामने ही तो थी, उन्होंने भी देखा था कि मेरा चलना बोलना खाना सब दूभर हो गया था। फिर भी वो दूसरों के कहे में आकर उसे मेरा नाटक करार दिया और दूसरों ने बच्चों के कान में ये मंत्र फूंका कि मुझे बच्चों से ज्यादा खुद की स्थिति को ध्यान में रखती हूं, इसलिए तो उन्हें बच्चों का हाल चाल लेना पड़ता है और सब कुछ बदल गया। बच्चों का क्या कहूं, जब पति ही सामने देखते हुए भी कान के कच्चे निकले।” अंजना के चेहरे पर अतीत की परछाईं ने डेरा जमा लिया था। उसकी आंखों में जब वह बीते कल की यादों में खोई हुई थीं, तो वहां उसके भीतर की तकलीफ़, रोष, और आत्म-समीक्षा की गहराईयों को महसूस किया जा सकता था। उसके चेहरे का हर अंश उसके अतीत के अदृश्य संघर्ष को बयान करता था, जैसे कि उसने कई सारे जज्बातों को एक समय में महसूस किया था। वह अपने आत्म-सत्य को स्वीकार करने की कठिनाईयों का सामना कर रही थी।

इस समय प्रतीत हो रहा था जैसे उसका चेहरे किसी मुखौटा के भीतर छुपा था, लेकिन वहां से उसकी मुखर आभासी भावनाएं बोल रही थीं, जैसे कि वह खुद को खोती हुई और उन क्षणों की पुनरावृत्ति को पूरी तरह गहराईयों से महसूस कर रही थी।

“और अब यही अस्वस्थता आपको आपका सब कुछ लौटाएगी।” अंजना के चेहरे के भाव को आत्मसात करती विनया की ऑंखें भी अश्रु से भर उठी थी और वो रूंधे गले से पूरे आत्मविश्वास के साथ अंजना के हाथ पर अपना हाथ रखती हुई कहती है।

“आपको कुछ नहीं करना है, बस कल सुबह आपको बिस्तर नहीं छोड़ना है। शरीर में दर्द नाम का भी कोई चीज होता है।” विनया के चेहरे पर रहस्य की हॅंसी खिल गई थी।

उसकी हॅंसी बता रही थी की वह किसी मुश्किल को भी खुद को हंसी में ढालने का सामर्थ्य रखती है। उसके चेहरे की यह हंसी अंजना को एक सुगम और सकारात्मक वातावरण में ले जाने की कोशिश थी, वो कह रही थी की इस जहां में समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन हंसी और एक दूसरे के समर्थन समाधान मिलना भी संभव है और पॉजिटिव और मोटिवेटिंग संदेश के साथ अंजना को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।

“लेकिन, जब सबको पता चलेगा तो…और ऐसे भी स्त्रियों का अस्वस्थ होना गुनाह ही तो माना जाता है और इसके बाद उन्हें किसी भी स्त्री का बीमार होना नाटक ही लगेगा। नहीं, नहीं बेटा,  मेरे कारण किसी और को दिक्कत हो, ये मैं नहीं चाहती।” अंजना जो अभी तक विनया की बात ध्यान से सुन रही थी, कुछ सोचती हुई अचानक बोल पड़ी।

“तो क्या इतने सालों में कभी आपके शरीर ने “बस, अब और नहीं” नहीं कहा क्या, कहा तो होगा। कभी सर्दी जुकाम में आपके मन ने चाहा होगा कि कोई गर्म चाय ही बना दे या कोई काढ़ा ही बना दे या कोई एक बात पूछ ही ले।” विनया अंजना के इनकार पर लगभग अपना सिर धुनती हुई कहती है।

“हाॅं, कई बार इच्छा हुई सारे काम त्याग कर बस बिस्तर पर पड़ी रहूं या नीचे अमिया के नीचे चाय के प्याली के साथ अपनी मनपसंद किताब पढूं या आते जाते लोगों को देखती उन पर कुछ कहानियां गढ़ूं, लेकिन, ये सब संभव कहां हो सका।” अंजना सहमति जताती हुई कहती है।

“सब संभव होता, अगर आप खुद को साबित करने में नहीं लगी होती तो। क्या कभी किसी ने किसी नारी से कहा है कि तुम थक गई होगी, दो तीन दिन ही सही आराम कर लो और कोई क्यूं कहें, नारी खुद ही तो देवी दुर्गा बनी सारे हाथों से काम संभालने के लिए उत्सुक रहती है और कोई ना भी कहें तो भी हमें अपने शरीर के बारे में सोचने का अधिकार है माॅं। खैर बीती बातों पर मिट्टी डालिए और कल सारे काम त्याग कर बिस्तर पर रहिए। ये आप अपने लिए नहीं, पूरे घर की भलाई के लिए करेंगी और कभी कभी सबकी भलाई के लिए साम दाम दण्ड भेद भी अपनाना पड़ता है मेरी प्यार सासू मांजी।” 

विनया की मुस्कान में एक उत्साहपूर्ण और संवेदनशील भावना छिपी थी, जो उसके शब्दों में समाहित थी। उसने अंजना को नए दिन की शुरुआत के लिए प्रेरित किया और साथ ही उसे उसके इंसान होने का भी भान कराने का प्रयास करने लगी और अंजना विनया की बात का बिना कोई उत्तर दिए बिस्तर छोड़ कर तह किए कपड़ों को उनकी जगह दिखाने लगी।

“बस इसी तरह आपको बिना किसी को छेड़े उन्हें इनकी नियत जगह दिखानी है माॅं।” अंजना पर आशापूर्ण नजरें टिकाए विनया उसे समझाने का अथक प्रयास कर रही थी।

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दिल्ली

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