अंतर्मन की लक्ष्मी ( भाग – 19) – आरती झा आद्या : Moral Stories in Hindi

“ये सुबह सुबह क्या मनहूसियत फैला रखी है तुमने बहू और संपदा तुम क्या इसे गले लगाए खड़ी हो। घर ना हुआ अजायबघर हो गया है।” अपने कमरे से बाहर आकर बड़ी बुआ कुर्सी खींच कर बैठती विनया और संपदा की ओर देखती हुई कहती है।

“फिर से वही सब ड्रामा शुरू हो गया। हमारी किस्मत में इन दोनों सास बहू का घर बसाना ही लिखा है। अपना कब सोचें।” मंझली बुआ भी सिर पर हाथ रखती हुई एक साथ अंजना और विनया दोनों को उलाहना देती है।

“घर बसाना या बसे बसाए घर को उजाड़ना” अंजना मंझली ननद के ऊॅंचे स्वर को सुनकर बड़बड़ाती है।

“मम्मी अब मुझसे बरदाश्त नहीं हो रहा है। इन आठ महीनों में ऐसा लगने लगा जैसे मैं खुद अपना अस्तित्व विस्मृत हो गई हूॅं। मुझे तो यहाॅं रिश्तों में कोई गरमाहट महसूस ही नहीं होती है मम्मी।” छत पर दिसंबर की सर्द शाम में शॉल ओढ़े विनया अपनी मम्मी संध्या से अपने अंतस की तपन बताने की कोशिश कर रही थी।

“नहीं मम्मी, इस घर में एक संपदा दीदी ही तो हैं। इतनी कोशिश कर रही हूॅं लेकिन संपदा दीदी के अलावा कोई कुछ समझ ही नहीं रहे हैं। क्या करूं मैं मम्मी। हार रही हूं मैं मम्मी। कभी कभी इच्छा होती है सब समेट कर घर चली आऊॅं, लेकिन जब माॅं की ओर देखती हूॅं तो लगता है थोड़ा और धैर्य रख लूॅं, लेकिन माॅं घर को घर बनाने की जिम्मेदारी केवल औरतों की है, पुरुष का क्या? जब तक औरत तिरस्कृत होती रहे, घर का अस्तित्व है और यदि वो इसके विरुद्ध खड़ी हो जाए, तो घर का अस्तित्व नहीं रह जाता, क्यों माॅं।” इतने दिनों का मन में उठ रहे गुबार को, गुस्से को विनया संध्या के सामने उड़ेल रही थी। ये सर्द, ठंडी हवाएं भी उसके इस ताप को शांत नहीं कर पा रही थी। उसकी पीड़ा उसके शब्दों को मर्मांतक बना रही थी।

“बेटा तुम्हारे सारे सवाल सही हैं। लेकिन वहाॅं क्या है ना बहनों के प्रेम में पड़े धृतराष्ट्र हैं और ऑंखों पर पट्टी बाॅंधे गांधारी हैं बेटा, जो ये जानते हुए भी गलत कौन है, गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और तुम्हें ही कृष्ण बनाना पड़ेगा उस घर के लिए बेटा।” संध्या विनया को समझाती हुई कहती है।

“लेकिन मम्मी, मैं कृष्ण नहीं हूॅं, आम इंसान हूॅं मैं। माॅं तो सुबह प्रह्लाद मामा जी के साथ ही थोड़ी बहुत बोलती हैं, उसके बाद काम के साथ साथ जो चुप्पी धारण करती हैं, वो दूसरे दिन ही खुलती है। मैं उन्हें कैसे बताऊॅं कि मैं उन्हें उनका वो एलबम वाला अतीत वापस देना चाहती हूं, जिसे वो देख कर हाथ फेरती रहती हैं।” विनया संध्या से अपनी सहनशीलता और अपने भावनात्मक आँधी को साझा करती रुआंसी हो उठी थी।

“देख बेटा हमने पहले ही कहा था कि उन्हें पिघलाना इतना आसान नहीं होगा। उन्होंने अपने इर्द गिर्द अब एक कड़ा आवरण बना लिया है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए आसान नहीं होगा। एक काम कर बेटा, कई दिन हो गए तो कुछ दिन के लिए यही आ जाओ।” संध्या उसके रुआंसे आवाज को सुनती हुई उधर से कहती है।

“हूं मम्मी देखती हूॅं।” कहती हुई विनया गहरी साॅंस लेकर कॉल कट कर देती है।

“मम्मी कहती हैं कृष्ण बनो, लेकिन कृष्ण बनना क्या इतना आसान है। अधर्म के विरुद्ध युद्ध ठानना क्या इतना आसान है, कृष्ण ने जिनके लिए युद्ध ठाना, वो कृष्ण के साथ खड़े थे। लेकिन यहाॅं जिसके लिए मैने युद्ध ठाना, वो तो मुझसे ही अलग थलग रहती हैं। फिर कैसे न्याय अन्याय की बात की जाए और इन सब में मेरी जिंदगी कहाॅं है। मेरे जीवन का पथ कहाॅं है।” शोर मचाती सांय सांय बहती हवा के बीच भी विनया के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था और रेलिंग से लगी अपने जीवन के बारे में विचार करती खड़ी थी। 

विचारों के घोड़े पर सवार विनया यह नहीं जान सकी कि अंजना सीढ़ियों पर खड़ी उसकी बातें सुन मुड़ गई थी और अनजाने में सुनी हुई बात से उसके अंदर शक का नाग जो हर वक्त फन फैलाए विष वमन करता रहता था, वो सिर झुकाकर सोचने पर मजबूर हो गया था।

मम्मी, यहाॅं क्या कर रही हो। कॉलेज से आई संपदा विनया को खोजती हुई छत पर जा रही थी और अंजना को सीढ़ियों से उतरती देख पूछती है।

“कुछ नहीं।” बोलती हुई अंजना सीढियां उतरती चली गई और संपदा कंधे उचकाती भाभी, भाभी का शोर मचाती छत पर चली गई।

संपदा को शोर मचाती देख विनया मुस्कुरा पड़ी।

नहीं चीजें तो बदली हैं। पहले जहाॅं जोर से बोलना पाप की श्रेणी में रखा जाता है, वहाॅं अब संपदा के जोर से बोलना और हॅंसना आश्चर्य का विषय नहीं रह गया था और उसकी तरफ से अब अंजना को माॅं का मान मिलने लगा था। लेकिन मनीष और पापा जी को अंजना का महत्व किस तरह बताया जाए, ये सवाल विनया को मथता रहता था।

“भाभी कहाॅं खो गईं।” विनया के दोनों कन्धों को पकड़ कर झिंझोरते हुए संपदा कहती है।

“आं…आपके मुस्कुराते चेहरे में दीदी।” विनया संपदा के चिबुक को पकड़ कर हिलाती हुई कहती है।

आप बताइए आपकी खुशी का राज। आज तो कुछ ज्यादा ही चहक रही हैं। कोई मिल गया क्या?” विनया संपदा से पूछती है।

“क्या भाभी आप भी। नाटक में शकुंतला का मेरा किरदार फाइनल हो गया। सब आपकी वजह से भाभी।” विनया की बात पर संपदा थोड़ी शरमा कर कहती है।

संपदा से बातें करती विनया कपड़े लिए छत पर से आकर कपड़े तह कर सबके कमरे में पहुॅंचा कर अंजना के पास रसोई में चली गई। जबकि वो जानती थी कि कमोबेश आज भी वही हालात हैं, अंजना को विनया का रसोई में आना आज भी पसंद नहीं है। फिर भी विनया अंजना के पास हमेशा एक उम्मीद से जा खड़ी होती है और अंजना उसे अनदेखा कर देती है। अब विनया भी इस पुनरावृति से थकने लगी थी, उसकी इच्छा होती थी अब अंजना उसकी खिलाफत न करे। यूं तो अंजना की खिलाफत दिखती नहीं थी, जैसे सूरज बादलों की ओट में छुपा रहता है और ताप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है। उसी तरह अंजना अपनी भावनाओं के ओट से अपनी नागवारी दर्शा देती थी।

अभी जैसे ही विनया ने किचन में पाॅंव रखा, अंजना उसकी तरफ़ एकटक नजर से देखने लगी। मानो उसमें कुछ खोजने की कोशिश कर रही थी, उसके चेहरा कह रहा था वो कुछ जानना चाह रही है। अंजना को अपनी ओर इस तरह देखते देख विनया के पैर चौखट पर ही ठिठक गए।

“क्या हुआ माॅं, कुछ गलती हो गई क्या।” विनया एक पल अंजना के बोलने की प्रतीक्षा करने के बाद पूछती है।

“नहीं”, झेंपती हुई अंजना लाइटर लेकर गैस स्टोव को बिना किसी बर्तन के ही ऑन करने की कोशिश करने लगी। लेकिन लाइटर उसके हाथ से फिसल जा रहा था। बेमतलब वो बर्तनों को इधर से उधर कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसका मन कहीं उलझ कर उसकी सारी ऊर्जा को एक गठरी में बाॅंध कहीं कोने में रख आया हो। विनया अंजना की हरकतों को हैरान होकर देख रही थी।

“माॅं, परेशान हैं क्या, कोई विचार परेशान कर रहा है क्या आपको।” विनया अंजना के सामने खड़ी होकर पूछती है।

“भाभी, वो परसों दोनों बुआ आ रही हैं। जानती ही हैं उनके आते ही भैया हवा हवाई हो जाते हैं और फिर घर का माहौल”… संपदा किचन में आती हुई कहती है।

“अचानक” विनया भी ये सुनकर परेशान हो गई। जब भी आती हैं, उसे मनीष का नया रूप देखने मिलता है। उनके नहीं रहने पर जो मनीष कम से कम भले बोलता हो लेकिन बोलने में नम्रता रहती है, वो मनीष उनके बहकावे में किसी और लोग का मनुष्य प्रतीत होता है। वो समझ नहीं पाती है कि आखिर वो दोनों ऐसा क्या कहती हैं कि मनीष का बर्ताव निम्नतर स्तर पर चला जाता है।

विनया को याद हो आया दो महीने पहले मनीष ने उसे ऑफिस की पार्टी में चलने के लिए कहा था और बिना खबर दिए दोनों बुआ का उसी दिन पदार्पण हुआ और बन ठन कर तैयार विनया को बिना लिए ही मनीष पार्टी में चला गया था और विनया ठगी सी रह गई थी। उसके बाद की दो महीने उनके नहीं आने से घर में व्यापक स्तर पर शांति कायम हो गई थी और आज अचानक संपदा ने उनके आने का बॉम्ब फोड़ा था।

“हाॅं भाभी कह रही थी, टिकट तो हो ही गया था, बताना भूल गई थी।” संपदा बताती है।

ननदों के आने की खबर से अंजना के ऊपर अब कोई असर नहीं होता था क्योंकि उसके लिए उनका आना और घर में दहशत फैलाना आम सी बात लगती थी। अभी भी यही हुआ, उसे ना ही गम हुआ ना ही खुशी हुई। लेकिन संपदा के आ जाने से अभी वो अंदर ही अंदर राहत की साॅंस ले रही थी क्योंकि वो ननदों के आने की खबर से बैचेन नहीं थी बल्कि वो विनया और उसकी माॅं की वार्तालाप सुनकर बैचेन थी और ऐसी बैचेन थी की जुबान पर ताला जड़ा हुआ महसूस कर रही थी।

“संपदा एक कप चाय दे जाना।” इतने में कमरे से संपदा के पापा की आवाज आती है।

उनकी आवाज सुनते ही मानो अंजना में चेतना जाग्रत हुई थी और वो फ्रिज खोल दूध निकालने लगी थी। फिर कुछ सोचती हुई उसके हाथ रुक गए और वो मुड़ी, “बहू , चाय बना लो और संपदा तुम चाय दे आना।” पीली सूती साड़ी का पल्लू संभालती ऐनक के अंदर से विनया और संपदा को देखती हुई अंजना कहती है।

“माॅं, मैं”… विनया अंजना के मुॅंह से बहू सुनकर भाव विभोर हो उठी थी।

अंजना विनया की बात का बिना कोई जवाब दिए किचन से बाहर चली गई।

“भाभी, मुझे चिकोटी काटिए। ये सपना तो नहीं है, मम्मी आपको बहू बोल कर गईं हैं।” विनया से अधिक संपदा भाव विह्वल हो गई थी और विनया से कहती है।

“आ…भाभी, जरा धीरे”….

“अब चिकोटी तो चिकोटी होगी ना, गुदगुदी तो नहीं हो जाएगी।” संपदा के चीखने पर हॅंसती विनया संपदा को गुदगुदी करती हुई कहती है।

“आह, दीदी, आज पहली बार लग रहा है मैं एक सीढ़ी चढ़ी हूॅं।” विनया के चेहरे पर सुकून के साथ साथ उल्लसित भाव छाने लगा था।

“भाभी, ऐसा प्रेम विवाह में होता है, जब सास बहू को स्वीकार नहीं कर पाती है। आपकी तो अरेंज मैरिज हुई, फिर भी मम्मी ने इतना समय लगाया।” चाय का प्याला कपबोर्ड से निकालती हुई संपदा कहती है।

“दीदी, अजनबी ही तो थी ना मैं। बुआ ने मुझे पसंद किया था और माॅं का जो विगत अनुभव रहा है, उसे देखते हुए माॅं मुझे बहू कैसे मान सकती थी। आपके भैया के लिए भी मैं अभी उनकी अर्धांगिनी कहाॅं हो सकी हूॅं।” अंजना की व्यथा के साथ अपनी व्यथा को मिलाती हुई विनया कहती है।

“भाभी, आपकी इच्छा नहीं होती है कि ऐसे पति को छोड़ दिया जाए।” संपदा विनया की ओर घूम कर पूछती है।

“झूठ नहीं बोलूंगी दीदी, मन करता है दीदी, बहुत इच्छा होती है। आज ही मम्मी से मैं यही कहना चाहती थी कि मैं वापस आ रही हूॅं। लेकिन फिर माॅं को उनके अतीत से निकाल कर वर्तमान में लाने का जो खुद से वादा किया है, वो कैसे पूरा करूंगी, यह एक विचार मेरे कदम रोक लेते हैं।” विनया उसांस लेती हुई कप में चाय उड़ेलती हुई कहती है।

“लीजिए दीदी, पापा जी के लिए चाय”…..ट्रे संपदा के हाथ में देती हुई विनया कहती है।

“पता है दीदी, आज मम्मी ने कहा तुम्हें कृष्ण की तरह सही गलत में फर्क कर सही को जीत दिलवानी है। यदि औरत होकर एक औरत को उसका विश्वास नहीं लौटा सकी, तो विचारवान होने का क्या फायदा। सच में मनीष और पापा जी भी तो विचारवान हैं, क्या उन्हें उचित अनुचित का भान नहीं होता होगा। कभी न कभी सबके मन का तिमिर छॅंट कर भोर की किरण सा खुद को प्रस्फुटित करता है । लेकिन पापा जी ज्यों के त्यों ही कैसे हैं, क्या उन्हें कभी माॅं के चेहरे का सूनापन नजर नहीं आया।” चाय देकर आई संपदा से विनया अंतहीन विचारों के पदचापों को सुनती हुई कहती है। 

आरती झा आद्या

दिल्ली

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