अनकहा बंधन (अंतिम भाग ) : Moral Stories in Hindi

सावी अस्पताल से अपने माता-पिता के साथ चली गई। जगन्नाथ जी अस्पताल से सतीश के साथ घर वापस आ ग‌ए।

लता ने उनको देख कर गुस्से से अपना मुंह फेर लिया।

खाने की टेबल पर सतीश चुपचाप सिर झुकाए खाना खा रहा था कि लता ने अपने तानों से से उसे बींध दिया।

अच्छा हुआ अब उस कुलटा की शक्ल रोज नहीं देखनी पड़ेगी।

तुम दोनों पर उसने जाने क्या जादू कर दिया है???

सतीश खाना अधूरा छोड़ कर उठ गया।

जगन्नाथ जी दुःखी होकर बोले। लता तुम सतीश को कोसना कब बंद करोगी???

जब तक वो उस कुलटा का ख्याल अपने दिमाग से नहीं निकालेगा।

जगन्नाथ जी लता की बातों से उब चुके थे। इसलिए बाहर निकल ग‌ए। बाहर निकल कर सतीश को फोन किया सतीश गाड़ी निकालो।

क्या बात है पापा?? सतीश ने जगन्नाथ जी  से कहा उन्होंने कहा कहीं जाना है।

सतीश उन्हें लेकर चल दिया।

सतीश किसी ऐसी जगह ले चलो जहां हम दोनों बात कर सकें। क्योंकि घर पर तुम्हारी मां के रहते कोई भी बात कर पाना असम्भव है।

घर से दूर एक मंदिर में आकर दोनों बैठ ग‌ए।

सतीश उस दिन तुमने जो सावी के बारे में कहा उसका मैं क्या मतलब समझूं??? क्या वो सब सच था??

पापा ! सतीश ने नजरें झुका ली। कुछ देर तक मौन पसर गया। सतीश की आवाज भारी हो गई थी। हां पापा वो मेरा सच था। पर वो मुझसे नफरत करने लगी है। मैंने अपनी बेस्ट फ्रैंड को भी खो दिया। पापा! अब मैं समझ गया हूं कि सच्चा प्रेम उम्मीद नहीं करता। मुझे उससे कोई उम्मीद नहीं है। जहां कुछ पाने की इच्छा हो वहां प्रेम हो ही नहीं सकता।

पापा मैं सावी के साथ जीना चाहता हूं। मेरे भाई की आखिरी निशानी पर अपने हक को नहीं खोना चाहता हूं। एक मासूम बच्चा जब इस दुनिया में आए तो उसके सिर पर माता पिता दोनों का हाथ हो। मैंने सावी को बेसहारा या कमजोर कभी नहीं समझा अगर वो इस बंधन के लिए राजी होती तो मेरी खुशकिस्मती होती।

सतीश वो बहुत बड़े दुःख को झेल रही है। तुम उससे इतनी जल्दी सामान्य होने की उम्मीद कैसे कर सकते हो??

पापा उस दिन मेरी बात ने सब कुछ खत्म कर दिया सतीश की आंखें भीग गई।

जगन्नाथ जी उसे सांत्वना देते हुए बोले मैं खुद चाहता हूं कि सतीश सावी का घर बस जाए। देखते हैं कि मैं क्या कर सकता हूं?? वो सावी के पिता को अस्पताल में ही सब कुछ बता चुके थे।

अगले दिन जगन्नाथ जी ने सतीश को सावी की जरूरत का सामान लेकर उसके मायके भेज दिया। सावी के पिता सतीश के आने की बात से पहले ही वाकिफ थे। इसलिए उसकी मां को ले कर मार्केट चले गए।

सतीश हिम्मत जुटा कर सावी के मायके पहुंच गया। सावी बाहर बरामदे ही बैठी हुई थी। मेन गेट खुलते ही उसकी नजरें सतीश पर पड़ी वह चौंक ग‌ई। उठ कर अंदर चली गईं। सतीश ने बड़ी मुश्किल से अंदर आने की ।इजाजत मांगी। अंदर आ कर ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह काफी देर तक वेट करता रहा पर सावी बाहर ही नहीं आई। आज तो बात करनी ही होगी उसने अपने आप से कहा। वह सीधे उस रूम में पहुंच गया जहां सावी थी।

उसे देख कर सावी क्रोध में जल उठी। उसने मुंह फेर लिया।

मुझे कुछ कहना है।

तुम्हें मेरी बात सुननी ही होगी सतीश ने धीरे से कहा।

मैं तुमसे प्यार करता हूं।

ये बेकार की बकवास मैं नहीं सुन सकती। तुम्हारे मन के पाप को तुम अपने पास रखो।

अपनी भाई की बीवी के लिए ये शब्द कहते हुए तुम्हें जरा सी भी शर्म नहीं आई।

जो तुम चाहते हो वो कभी नहीं हो पाएगा। तुमने मुझे सबकी नजरों में गिरा दिया।

मैं तुम्हें चाहता हूं मैं अपने भाई के बच्चे को पूरे अधिकार के साथ अपनाना चाहता हूं इसमें गलत क्या है??? मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए तुम पूरी जिंदगी मुझसे नफरत करना। मुझे शरीर का रिश्ता नहीं चाहिए। न प्यार की उम्मीद करूंगा। न कोई जिद न जबरदस्ती। मैं जानता हूं प्यार मैंने तुमसे किया है तुमने मुझसे नहीं।

वक्त जितना चाहे उतना ले लो इस बंधन में कोई जबरदस्ती नहीं होगी। पर मेरी जिंदगी में अब तुम्हारे अलावा कोई और नहीं आएगी।

तो ये ज़िद और जबरदस्ती नहीं तो और क्या है??? सावी क्रोध से उबल पड़ी।

ये प्यार है और कुछ नहीं।

मैं अपने बच्चे को अकेले पालूंगी मुझे किसी की आवश्यकता नहीं है।

पर बच्चे को पिता की जरूरत होगी। मैं बच्चे को चाहे जितना भी प्यार दूंगा पर मेरे किसी और से विवाह करने पर दूरियां आ जाएंगी। अगर तुम हां कर दोगी तो जिंदगी आसान हो जाएगी।

मैं तुमसे कभी कुछ नहीं चाहूंगा। कुछ भी नहीं।

सतीश उठ कर जाते हुए बोला।  वक्त आगे बढ़ चुका है।

छह साल बीत चुके हैं।  सावी अब अकेले रहती है उसका एक बेटा है उसका नाम समर्थ है। आज स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग है। मम्मा पापा कब आएंगे??? वो हमारे साथ क्यों नहीं रहते। रोज आते हैं आप उन्हें बोलो न यहीं रहें। गाड़ी की आवाज सुनकर समर्थ बाहर भाग गया। सतीश ने उसे अपने बाजुओं में उठा कर चूम लिया। मेरा बच्चा चलो देर हो गई जल्दी चलते हैं। तीनों स्कूल चले ग‌ए।  वापस लौटते हुए सतीश ने समर्थ को उसकी फेवरेट चॉकलेट आइसक्रीम दिलाई। सावी के लिए केसर कुल्फी ली। समर्थ हमेशा गाड़ी में उसके साथ आगे बैठता है। फिर दोनों बहुत बातें करते हैं सावी पीछे बैठ कर दोनों की बातें सुनती रहती है। सतीश सावी के कुछ भी पूछने संक्षिप्त उत्तर देता है। बातचीत ना के बराबर है।

घर के बाहर पहुंच कर सतीश ने समर्थ को गोद में उठाया।

चलो पापा को बॉय कहो। उसने उसका माथा चूम लिया। समर्थ मचल उठा पापा नहीं आज नहीं जाना।

पापा प्लीज!

मैं कल आऊंगा मेरे बच्चे आज पापा को बहुत जरूरी काम है।आप रोज ऐसे ही कहते हो वो गोद से उतर कर मुंह फुलाकर चला गया। सतीश गाड़ी में बैठ रहा था। सावी पीछे से बोली मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। सतीश रूक गया पर उसकी तरफ पीठ करके।

मेरा सामना नहीं कर सकते और प्यार करने का दावा करते हो।

सतीश खामोश रहा।

कुछ कहते क्यों नहीं??

मांजी ने मुझे कहा है कि मैं तुमसे तुम्हारी शादी के बारे में बात करूं। मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो रही है।

इस गिल्ट से मैं मर जाऊंगी।

सतीश चुपचाप खड़ा रहा।

सावी उसके आगे आ कर खड़ी हो गई। कब तक मेरे लिए रूके रहोगे सतीश मुक्त कर दो मुझे।

मैंने तुम्हें किसी बंधन में नहीं बांधा है। तुम हमेशा आजाद थी हो और रहोगी।

अगर मैं किसी और से शादी कर लूं तो तब तो तुम शादी करोगे न।

मैंने तुमसे कोई उम्मीद नहीं की है सिर्फ प्यार किया है। बिना शर्त। तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी हैं तुम जो चाहे करो।

मैं यहां केवल समर्थ के लिए आता हूं।

और जो मुझे तुम्हारी आंखों में खुद के लिए महसूस होता है। उसे कैसे छिपाओगे??? बोलो सतीश ! सावी का गला भर आया।

मैं जिससे शादी करूंगी समर्थ को वो अपना लेगा तुम समर्थ की चिंता छोड़ दो।

कोई बात नहीं।

समर्थ खुश रहेगा तो मैं भी खुश रहूंगा।

जिंदगी में सब कुछ जीत कर ही पाया नहीं जा सकता। मैं हार कर भी खुश हूं।

अच्छा! मैं चलता हूं देर हो रही है।

सावी रोते हुए दौड़ कर उसके सीने से लग गई।

सतीश मुझे माफ़ कर दो मैंने तुम्हारा दिल बहुत दुखाया है।

प्यार करने वाले बहुत होते हैं पर निस्वार्थ प्यार करने वाला हर किसी की किस्मत में नहीं होता।

सतीश ने उसे अपनी बाहों में समेट कर उसका माथा चूम लिया।

दोनों के बीच का “अनकहा बंधन” आज प्यार के बंधन में तब्दील हो चुका था।

© रचना कंडवाल

मैं आपके विचार जानना चाहूंगी कि कहानी को क्या मोड़ दिया जाए????

 

अनकहा बंधन (भाग–2)

अनकहा बंधन (भाग–2) : Moral Stories in Hindi

© रचना कंडवाल

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