स्वाभिमान का बदला – गीता वाधवानी 

मन में पश्चाताप और आंखों में आंसू लिए जय, जब 3 महीने से पागल खाने में इलाज करवा रही अपनी पत्नी सुधा से मिलने आया, तब सुधा ने उसे पहचाना ही नहीं। 

सुधा सिर्फ बोलती जा रही थी। मैं हर दिन तिरस्कार सहने वाली कमीनी औरत हूं और खुद को मां बहन की गालियां दे रही थी। बस यही सब सुनकर जय रो रहा था। सुधा की इस हालत का जिम्मेदार वही था। जय वहां से निकलकर एक पेड़ के नीचे जा बैठा और उसके साथ आया उसका बेटा नीरज दो कप चाय ले आया। 

जय चाय पीते पीते पुरानी बातों में खो गया। सुधा आज से 36 वर्ष पहले उसकी पत्नी बन कर आई थी। तब से उसने अपने पति जय की बहुत सेवा की थी। जय ने उसे नौकरी करने से मना कर दिया, तब भी उसने उफ तक न की और उसकी बात मानकर हाउसवाइफ बन गई। 

घर के लोगों की सेवा और घर के कामों  के बीच सुधा ने कभी अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं की। सारा दिन बस कभी यह काम कभी वह काम। सारा दिन कामों में कैसे बीत जाता ,पता भी नहीं चलता। लेकिन जय का स्वभाव ऐसा था कि वह बात-बात में मां बहन की गालियां देता था और कभी-कभी गुस्से से बेकाबू होकर हाथ भी उठाता था। 

    सुधा हमेशा उसे समझाती थी कि गालियां मत दिया करो। बहुत बुरा लगता है और अगर हाथ उठाओगे तो मैं यहां से चली जाऊंगी। मुझे तिरस्कार नहीं, सम्मान चाहिए। जय कभी यह नहीं देखता था कि हम लोग किस जगह पर है। विवाह हो या कोई पार्टी हो या फिर मंदिर हो या बाजार हो, सुधा की गलती हो या ना हो, बस गाली देकर ही बात करता था। 




सुधा ने सोचा कि समय बीतने पर बदल जाएंगे। उम्र बढ़ने के साथ-साथ मन में शांति आ जाएगी, पर दो बच्चे हो जाने के बाद भी जय नहीं बदला। बेटी टीना बहुत समझदार थी। समय पर उसका विवाह भी हो गया था लेकिन बेटा नीरज पिता की देखा देखी मां का तिरस्कार करने लगा था। सुधा अंदर ही अंदर टूट रही थी। 

एक दिन एक छोटी सी बात पर जय ने सुधा को बहुत गंदी गंदी गालियां दी और एक तमाचा भी लगाया। सुधा का दिल छलनी छलनी हो गया और उसने मेज पर पड़ा कांच का गिलास जोर से जमीन पर दे मारा और जोर से चिल्लाई-“हां, मैं कमीनी औरत हूं, मैं किसी काम की नहीं हूं। मेरी वजह से तुम्हारा बहुत नुकसान हो गया। मैंने आज तक जिंदगी में तुम्हारे लिए किया ही क्या है, आओ मारो मुझे गालियां दो, मैं इसी लायक हूं” और ऐसा कहकर वह सारी गालियां जो की जय उसे देता था, वह खुद को देने लगी और कभी हंसने लगी, और थोड़ी देर बाद रोने लगी। 

तब से सुधा का यही हाल है। डॉक्टर ने भी जैसे यही कहा है कि-“लगता है इनके सम्मान को किसी ने बहुत ठेस पहुंचाई है। तिरस्कार से इनका दिल ऐसा टूटा है कि यह ठीक होना ही नहीं चाहती।” 

आज सुधा ने जय को पहचाना नहीं, जबकि वास्तव में सुधा ने जय को आते ही पहचान लिया था और दीवार की तरफ देखते समय उसकी आंखों में आंसू थे और वह मन में सोच रही थी कि”आप मुझे ना तो तब समझ पाए और ना ही अब। मैं तो कभी पागल हुई ही नहीं, यह तो आपसे मेरा अपने”स्वाभिमान का बदला”है। शायद मुझे खोकर आपको कुछ एहसास हो जाए।” 

#तिरस्कार 

स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली

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