रिश्ते की नई सुबह – संजय मृदुल : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : .. सुबह सुबह आश्रम के कार्यालय में हम बैठे थे, सावित्री मौसी के बारे में पूरी जानकारी देते। मौसी खामोशी से किनारे बैठी हुई है। मैनेजर ने कहा भाई साब काश ऐसे लोग और हो तो इन बुजुर्गों को कभी भीख न मांगना पड़े। बहुत बुरा लगता है हमें भी, मगर क्या करें नियमो से बंधे हैं हम भी। एक सीमा से ज्यादा मदद नही कर सकते। आप इन्हें ले जा रहे हैं इनका बुढापा संवर जाए। आपको भी दुआ लगेगी।

    चार धाम की यात्रा खत्म कर हम हरिद्वार पहुंचे थे, यहां दो दिन रुकना था। पवित्र गंगा के किनारे घाट पर लोगो की भीड़ में जाने कैसे उनपर नजर रुक गयी। मंदिर के बाहर भिखारियों की भीड़ में बैठी वो ऐसा लगा मानो कोई अपनी हैं। मैं भिखारियो को पैसे देना पसन्द नही करता मगर रत्ना ढेर सारे सिक्के लेकर आई थी इनके लिये। मैं सुबह की गंगा आरती के बाद उमड़ती गंगा के साथ लोगो के हुजूम को देख रहा था। कितनी आस्था कितना विश्वास। गंगा माध्यम बन कर सबकी मुराद पूरी करती मानो। मैंने तो कुछ नही मांगा मगर कितना कुछ मिल गया। उन्हें देखकर लगा कि देखूँ तो हैं कौन?

     पुरानी बदरंग साड़ी में लिपटी फटा हुआ स्वेटर पहने वो बुजुर्ग महिला कटोरा सामने रखे आने जाने वालों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से निहार रही थी।

       मैं बहुत कोशिश के बाद भी पहचान नही पा रहा था। मेरी नजर उनके हाथों पर पड़ी सावित्री गुदा हुआ था काली सियाही से। जाने क्यों लगा ये तो देखा हुआ है कहीं पर।

      फिर ख्याल आया, ये कहीं गांव वाली सावित्री मौसी तो नही। 

पास जाकर धीरे से आवाज लगाई सावित्री मौसी! वो अकचका कर मुझे देखने लगी। मैं बोला मैं विश्वास, रमा का बेटा। तुम बहेसर गांव की हो न। 

      वो हाथ थामकर फूट कर रो पड़ी। हमने उन्हें वहां से उठाया और अलग ले जाकर बिठाया। आप यहां कैसे मौसी? उनसे कुछ बोलते नही बन रहा था बस रोये जा रही थी। हमने उनका समान उठाया और अपने साथ लेकर मंदिर से लगे हुए आश्रम आ गए। जरूरी लिखापढ़ी कर मौसी को होटल ले आये,उनको नहला कर खाना खिलाया। अब उनकी हालत पहले से बेहतर लग रही थी। 

तुम कब से गांव नही गए बेटा उन्होंने पूछा, मैं बोला जाते तो साल में एक बार हैं ही। मगर जब से आप लोग गांव छोड़कर गए कोई खबर नही मिली आपकी। 

     ईश्वर का कोप है बेटा। जाने क्या गलत किया, किसके साथ अन्याय किया, किसका दिल दुखाया जो ये दिन देखने पड़ रहे हैं। कहते हैं न जैसा करोगे वैसा भरोगे मगर मैंने तो सारा जीवन ऐसा कुछ नही किया। इनके जाने के बाद बेटे ने गांव की जमीन घर बेच दिया और मुझे लेकर शहर आ गया। मुझे अकेला नही रहने देना चाहता था। मिले हुए पैसों से शहर में उसने घर ले लिया। जैसे तुम आये चारधाम यात्रा में वैसे ही वो मुझे भी लेकर आया था। और भी लोग थे साथ मे। हम केदारनाथ में थे, मन्दिर में दर्शन के लिए लगे हुए थे कि अचानक जैसे सब कुछ तहस नहस हो गया। इतना सारा पानी आया जैसे बाढ़ आ गयी हो नदी में। सारे लोग बहने लगे। और उसी सैलाब में हम सब भी बह गए। मुझे जब होश आया तो मैं एक अस्पताल में थी। पैर की हड्डी टूट गयी थी खूब सारी चोटें आई थी। सरकारी आदमी नाम पता लेकर गए। फिर मुझे ऋषिकेश में एक केम्प में भेज दिए जहां मेरे जैसे और भी लोग थे। धीरे धीरे एक एक कर सब के परिवार वाले आकर ले गए उन्हें।मगर मुझे लेने कोई नही आया।कोई होता तो आता न। बेटे के घर के आसपास कोई जानता नही था कुछ, न ही ऑफिस में गांव का रिकार्ड था।

       साल भर बीत गया ऐसे ही।सरकारी आदमी आते मुझसे पूछते मैंने गांव का पता बताया घर का पता बताया। पर तुम्हे तो मालूम है गांव में कोई ऐसा नही जिसे मेरे होने न होने से फर्क पड़े। जमीन जायजाद भी नही। फिर पता चला कि बेटे के साले ने घर पर कब्जा कर लिया है। और उसने पूछताछ करने गए लोगो से साफ कह दिया कि वो मुझे नही जानते। 

      मैं बुढ़िया क्या करती। फिर सरकार ने मुझे एक वृद्धाश्रम में भेज दिया। वहां थोड़े समय रही पर वहां अच्छा नही लगता था। तो एक दिन भाग निकली और यहां आ गयी।

     लगभग तीन साल हो गए यहां। गंगा मैया की गोद मे रहते। आश्रम वालो ने रहने की जगह दे रखी है हम जैसे लोगो को। दिन भर भीख मांगते हैं रात को आश्रम में सो जाते हैं।

      किसी जनम का कोई पाप बच गया होगा मुन्ना उसी का फल भुगत रही हूँ। बेटा बहू पोते को खोकर, घर से बेघर होकर भीख मांगकर जी रही हूँ। शायद यही प्रायश्चित हो मेरा। मगर आज तुम मिले तो लगा बेटा मिल गया मुझको मेरा।

    उनकी आंख से आंसू बहने लगे, मेरी भी। भले कोई रिश्ता नही था हमारा। पर वो मेरी अम्मा को दीदी बोलती थी इस लिहाज से मैं मौसी बोलने लगा था। पड़ोस में घर था, दिन भर का आना जाना। मैं गोद मे था तब से अपने बेटे सा प्यार पाया। गोद मे खेला उनकी बड़ा हुआ। फिर पढ़ाई और नॉकरी ने गांव छुड़वा दिया। उन्हें हमेशा ही करीब से देखा था मैंने बच्चों और परिवार के पीछे ख़ुद को भूल गई थीं वो। उनकी इच्छाएं, सपने सब उन्होंने अपने संदूक में बंद कर दिए थे।

     बचपन का रिश्ता था उनसे स्नेह का । ऐसे रिश्ते दिल दिमाग से मिट नही पाते, दूर भले हो जाएं। मेरे मन ने एक निश्चय करना शुरू कर दिया। 

    रात में मौसी के सो जाने के बाद रत्ना से मैंने बात की। उन्हें अपने साथ घर ले जाने की। वो भी खुशी खुशी तैयार हो गयी।

हम दोनों कल की सुबह के इंतज़ार में थे। एक नई सुबह के जहां एक रिश्ता हमारा होने वाला था।

संजय मृदुल

रायपुर

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