रिहाई (भाग 5) – अंजू गुप्ता : Moral Stories in Hindi

देवप्रिया भी अब ज़िंदगी में आगे बढ़ चली थी । आज जब वह घर आई तो उसके पापा उसे एक पत्र पकड़ा कर अपने कमरे में चले गए । लिखावट देख कर ही वह पहचान गयी थी कि यह पत्र राजन ने लिखा है। लगभग दो वर्ष बाद राजन ने उससे सम्पर्क करने की कोशिश की थी। कांपते हाथों से वह पत्र खोलने लगी । खिड़की से आती तेज़ हवाओं से उसके हाथों में पत्र कांपने लगा था, पर उससे कहीं अधिक वेग से खुद उसका मन कांप रहा था । कहते हैं वक्त सब कुछ बदल देता है, सच्चाई यही है कि पर जीवन के कुछ लम्हें ज्यों के त्यों दिल के हिमखंड के नीचे पड़े रह जाते हैं और एक लम्बा वक्त गुजर जाने के बावजूद भी उसे चाह कर भी नहीं मिटाया जा सकता । मन फिर से भटकते हुए उस अतीत में पहुंच गया था, जिसमें आज भी राजन ही था ।

पत्र में राजन ने अपने किए की माफ़ी मांगी थी और बताया था कि दामिनी के साथ एक अनहोनी हो गयी थी और बदनामी से बचने के लिए उसने दामिनी से शादी कर ली थी। पत्र पढ़ के फिर से रो पड़ी देवप्रिया । जिन यादों से वह पीछा छुड़ा रही थी, इस पत्र ने फिर से पुरानी यादों को हरा कर दिया था । अगर जो कुछ भी राजन ने पत्र में लिखा था वो सच था, तो यह सब बातें वह उससे पहले भी बता सकता था । इतना तो यकीन होना चाहिए था उसे अपने प्यार पर । कुछ न कुछ समाधान निकल लेते दोनों मिल कर । कम से कम  वह विरह की अग्नि में तो न तड़पती और अगर उसने अपने गुनाह को जायज़ ठहरने के लिए यह पत्र लिखा है तो भी वह राजन को कभी माफ़ नहीं कर पाएगी । दिल और दिमाग की जंग जारी थी ।

 पत्र के अंत में राजन ने अपना नंबर दिया हुआ था । दो -तीन दिन बाद, कांपते हाथों से उसने राजन का नंबर डायल किया । देवप्रिया की आवाज़ सुनते ही राजन बोला, “मुझे विश्वास था कि मेरा पत्र मिलते ही तुम मुझे फ़ोन करोगी । मैं तुमसे बात करना चाहता था, पर तुमने बिन बताए अपना नंबर बदल दिया था। तुमसे बात करने का और कोई माध्यम न था, इसलिए मुझे तुम्हें पत्र लिखना पड़ा।”

” इतने सालों बाद तुम्हें पत्र लिखने की क्या जरूरत पड़ गयी”, न चाहते हुए भी देवप्रिया गुस्से से पूछ बैठी ।

“तुम्हारा गुस्सा जायज़ है । पर मैं बस एक बार तुमसे बात करके तुम्हें बताना चाहता था कि मैंने बेबफाई नहीं की थी । मैं तुम्हें दिलो जान से चाहता था, पर दामिनी को ज़िल्लत से बचने के लिए मुझे उसे अपना नाम देना पड़ा ।”

 “पर वो तो तुम्हारी बड़ी बहन के समान थी ना? फिर कैसे तुम उसके साथ शादी के लिए तैयार हो गए और तुम्हारी मम्मी,,, वो इस शादी के लिए तैयार हो गयीं ?” , न चाहते हुए भी तल्खी आ गयी देवप्रिया की जबान पर ।

 “वो घरवाले तो नहीं माने, कोर्ट मैरिज की थी मैंने उससे ।”, बुझी आवाज़ में राजन ने जबाब दिया ।

 “मम्मी की मर्जी के बिना शादी?” , कह कर फीकी हंसी हस पड़ी देवप्रिया “पर जब मैंने तुमको ऐसा करने को कहा था तब क्या जबाब था तुम्हारा?”

 “लगता है तुम एक भी बात नहीं भूली हो, बहुत प्यार करती थी न मुझसे? चाहे तुम झूठ समझो, पर मैं आज भी पश्चाताप की अग्नि में जल रहा हूँ। बस एक बार मुझे माफ़ कर दो, तुम जो चाहो मैं वो करने को तैयार हूँ ” , राजन बोला ।

 “क्या मेरा बीता वक्त वापिस कर सकते हो तुम ?  छल… हां छल ही तो किया है राजन तुमने मुझसे । अब तुम्हारे किसी भी पश्चाताप की मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं है। जब तुम्हें मुझसे बात करनी चाहिए थी, तुमने मुझे अपनी जिंदगी से दूर कर दिया।” देवप्रिया बोली । “और रही दामिनी की बात, क्या उसे हमारे प्यार की बारे में नहीं पता था? एक लड़की होकर भी उसने मुझसे मेरा प्यार छीन लिया। खैर, पर जब तुम ही मुझे नहीं समझे, उससे मैं क्या उम्मीद करती“ , तड़प कर बोल उठी वह ।

 अब दोनों तरफ चुप्पी छा गयी थी । “गुडबाय राजन! तुम्हें चाहे बुरा लगे, पर इसके बाद हम दुबारा बात नहीं करेंगे और हाँ! मैं न तुमको और न तुम्हारी दामिनी को कभी माफ़ कर पाऊँगी।” और यह कह कर देवप्रिया ने फ़ोन रख दिया ।

और आज, न जाने कितने सालों बाद अंततः देवप्रिया ने एक मरे हुए रिश्ते की कैद से रिहाई पा ली थी ।

 

रिहाई (भाग 4 )

रिहाई (भाग 4) – अंजू गुप्ता : Moral Stories in Hindi

धन्यवाद

स्वरचित

कल्पनिक कहानी

अंजू गुप्ता

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