पुनर्मिलन (भाग 1) – डॉ. पारुल अग्रवाल : Moral stories in hindi

moral stories in hindi : आज सिया ऑफिस से घर पहुंची ही थी तो देखा उसके पतिदेव निशांत उसके आने से पहले ही घर आ चुके थे। हमेशा तो वो उसके आने के बाद ही घर आते थे। सिया को निशांत के घर पर देखकर बहुत अच्छा लगा पर उसके चेहरे पर परेशानी के भाव वो स्पष्ट देख पा रही थी।

उसने एकदम कुछ भी पूछना उचित नहीं समझा फिर सोचा माहौल को हल्का बनाने के लिए चाय बना लाती हूं। फिर मौका देखकर निशांत की चिंता का कारण भी पूछ लूंगी। अपनी योजना अनुसार जब सिया ने निशांत से पूछा कि कोई समस्या है क्या? पहले तो निशांत ने इंकार किया पर सिया के बार बार पूछने पर बताया कि उसके पिताजी और भाई जो बिजनेस साथ में मिलकर चलाते हैं वो पूरी तरह घाटे में आ गया है।

इस वजह से पिताजी का बीपी भी बहुत ज्यादा हो रहा है। लेनदार अलग तकादा कर रहे हैं। भाई के भी छोटे-छोटे बच्चे हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा कैसे ठीक होगा सब? इसके साथ निशांत की चिंता का एक कारण ये भी था कि वो हमेशा नौकरी में रहा है उसको बिजनेस के विषय में ज्यादा जानकारी भी नहीं है। 

निशांत की सारी चिंताएं अपनी जगह सही थी पर सिया बहुत समझदार थी। उसको लगता था कि समस्या है तो समाधान भी जरूर मिलेगा। उसने निशांत को सांत्वना देते हुए कहा कि सब ठीक होगा वो भी कुछ सोचती है। रात को सब लोग तो सो गए पर सिया की आंखों में नींद कोसो दूर थी। उसने कभी अपनी ससुराल और उसके लोगों को पराया नहीं माना।

वो सब कुछ पहले जैसा,कैसे किया जाए वो सोच ही रही थी कि उसका मन अतीत की पुरानी गलियों में भटकने लगा। जब वो शादी करके अपने मायके को छोड़कर ससुराल आई थी। उसके माता-पिता की सीख थी कि उसको अपने ससुराल के लोगों को भी उतना ही प्यार देना है जितना वो मायके के लोगों को देती आई है।

वो तो ये गांठ अपने पल्लू में बांध कर आई थी और अमल भी कर रही थी। पर पता नहीं क्यों सासू मां का व्यवहार उसके लिए उदासीन ही रहता था। उसने आते ही बिना कुछ सोचे-समझे अपने सारे गहने भी उनके सुपुर्द कर दिए थे। घर के कामों में थोड़ी कच्ची थी पर सीखने की पूरी कोशिश करती। दिन बीत रहे थे वो तीज-त्यौहार पर अपने मायके से आए सारे सामान पर भी अपना हक ना दिखाते हुए  सासू मां के सामने रख देती।

अपनी तरफ से सब अच्छा ही सोचती,कभी ये दख़लअंदाज़ी भी ना करती कि सासू मां ननद और बाकी रिश्तेदारों को क्या दे रही हैं बल्कि ननद और उसके बच्चों को तो वो अपनी तरफ से भी काफ़ी कुछ देती रहती। इतना सब के बाद भी सासू मां का व्यवहार उसके लिए रूखा ही रहता और वो उसको शक की नज़रों से देखती रहती।

उनके मन में अभी भी सिया के लिए बेगाने वाले भाव रहते। कई बार तो जब ननद आई होती और सब लोग आपस में बात कर रहे होते तब उसके आने के बाद सब ऐसे चुप हो जाते जैसे कि उसका आना किसी को पसंद ना आया हो।

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डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

#शक

 

 

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